Spirit of a Fighter958 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 958

6 min read November 5, 2026

मैंने फ़ाइल नहीं ली। मैंने उसकी आँखों में देखा।

"तुम्हारा बेटा गोलू?" मैंने पूछा। "वो कहाँ है?"

हरनाम का चेहरा बिगड़ गया। उसने फ़ाइल अपनी छाती से लगा ली, जैसे वोी उसका बच्चा हो।

"भैरव ने कहा था," वो बोला, आवाज़ काँप रही थी, "कि अगर मैं मुँह खोलूँगा, तो गोलू स्कूल की छत से नीचे मिलेगा। इसीलिए मैं डरता था। पर आज सुबह…" उसकी आवाज़ रुकी। "आज सुबह मुझे पता चला कि भैरव तो कोठे में है, तुम्हारे हाथ में। तो मैंने सोचा, अगर वो पकड़ा गया है, तो गोलू को कौन छुएगा? तो मैं बैलगाड़ी लेकर चल पड़ा। तुम्हारे पास। क्योंकि तुम्हारे सिवा कोई नहीं है जो उसे बचा सके।"

वो मेरे सामने झुका। घुटनों के बल नहीं, पर इतना झुका कि उसका सिर मेरी छाती के बराबर आ गया।

"वीर," उसने कहा, "मैं जानता हूँ मैंने बहुत बुरा किया। पर मेरा बेटा मासूम है। उसका कोई कसूर नहीं।"

मैंने उसे उठाया। उसका शरीर पतला था, और उसकी कमर में मेरी उँगलियाँ हड्डियों तक पहुँच गईं।

"उठो," मैंने कहा। "मैं तुम्हें माफ़ नहीं कर रहा। माफ़ करना मेरे हाथ में नहीं है। पर तुम्हारा बेटा…" मैंने फ़ाइल उसके हाथ से ली। "तुम्हारा बेटा हमारा काम है अब।"

हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखें भर आईं। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।

मीरा आगे आई। उसने फ़ाइल खोली और पन्ने पलटने लगी। उसकी उँगलियाँ तेज़ थीं, और उसकी आँखें एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति तक दौड़ रही थीं।

"ये…" उसने कहा, और उसकी आवाज़ रुकी। "ये तो पूरा हिसाब है। तारीख़ें, नाम, रकम।" उसने एक पन्ना उठाया। "यहाँ तो लिखा है — भवानी सिंह, अंतिम भुगतान, सात हज़ार।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने उस पन्ने को देखा।

"सात हज़ार?" मैंने पूछा।

"हाँ," हरनाम ने धीरे से कहा। "भैरव ने भवानी को मारने के बाद मुझे बुलाया था। कहा था — 'हरनाम, इसे हिसाब में डाल दे, चंदन के इलाज का खर्चा है।' मैंने पूछा नहीं। मैंने बस लिख दिया।"

मैंने फ़ाइल अपने हाथ में ली। मेरे पिता की मौत सात हज़ार रुपये के खाने में दर्ज थी, एक लाइन में, एक तारीख़ के साथ। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मैंने उन्हें कस लिया।

"अब क्या?" टिंकू ने पूछा। "भैया, अब क्या?"

मैंने फ़ाइल बंद की।

"अब हम बस से नहीं जाएँगे," मैंने कहा। "बैलगाड़ी से जाएँगे। और सीधे उस जगह जाएँगे जहाँ भैरव का बेटा है।"

हरनाम ने सिर उठाया।

"तुम्हें पता है?" उसने पूछा।

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर तुम्हें पता है। और तुम हमें बताओगे।"

हरनाम ने अपना चश्मा पहना। उसके हाथ अब काँप नहीं रहे थे।

"शहर के पुराने स्कूल के पीछे," वो बोला। "एक घर है, बंद, टूटी छत वाला। वहाँ भैरव का बेटा रहता है। उसका नाम…" वो रुका, "उसका नाम भी विक्रम है। बाप के नाम पर।"

हम बैलगाड़ी पर बैठे। चिमन भाई आगे बैल के पास बैठे, और हरनाम ने रस्सी पकड़ी। बैल चला, और घंटी बजी।

मीरा मेरे पास बैठी थी। उसका कंधा मेरे कंधे से टकरा रहा था, गाड़ी के हर झटके पर। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा, पर उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर आ गईं। हल्की। बस इतनी कि मुझे पता चले वो वहाँ है।

टिंकू पीछे बैठा था, और वो लगातार अपनी टोपी ठीक कर रहा था।

"बहन," वो बोला, "एक बात पूछूँ?"

मीरा पलटी। "पूछ।"

"अगर आज सब ठीक हो जाए… तो क्या मैं तुम्हें मिठाई खिला सकता हूँ? अपने हाथ की। कीड़ों वाली नहीं।"

मीरा हँसी। और उसकी हँसी में वो सब था जो पिछले कुछ घंटों में हमने खोया था।

"खिला," उसने कहा। "पर बहुत मीठी मत बनाना।"

हरनाम ने रस्सी खींची और बैल थोड़ा तेज़ चला। धूल हमारे पीछे उड़ती गई, और नहर का पानी दूर रह गया।

तभी हरनाम ने पीछे मुड़कर देखा, और उसका चेहरा बदल गया।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "पीछे देखो।"

मैं पलटा।

दूर, पगडंडी के मोड़ पर, धूल में कुछ चमक रहा था। दो मशालें। और उनके नीचे, अंधेरे में, कुछ काले साये चल रहे थे। बहुत से। उनकी चाल में वो जल्दी थी जो पीछा करने वालों की होती है।

हरनाम ने रस्सी और ज़ोर से खींची।

"वो भैरव के आदमी हैं," वो बोला, आवाज़ में डर था। "और उनके साथ…" उसका गला रुका। "उनके साथ वो आदमी भी है जिसे तुमने बस स्टॉप पर भगाया था। उसने उन्हें बुला लिया।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ मीरा का चाँदी का टुकड़ा था, ठंडा और छोटा। मैंने उसे दबाया।

"टिंकू," मैंने कहा, बिना पलटे, "तू डिब्बी संभाल। मीरा, फ़ाइल अपने बैग में रख। और हरनाम भाई, बैल को मत रोको।"

"पर वो आ रहे हैं," हरनाम ने कहा।

"आने दो," मैंने कहा। "अब बस एक ही रास्ता है — आगे।"

और तभी, उसी पल, सामने की तरफ़ से भी आवाज़ आई।

नहीं, आवाज़ नहीं। घंटियाँ। मंदिर की घंटियाँ, बहुत सी, एक साथ बज रही थीं। और उनके नीचे, धूल में, एक लंबा साया खड़ा था। उसके हाथ में लाठी थी, और उसके पीछे गाँव के लोग थे — मशालें लिए, लाठियाँ लिए, और सबसे आगे, पीले दुपट्टे में, मेरी माँ।

मैं उठ खड़ा हुआ। बैलगाड़ी के हिलते पहिये पर मेरा पैर फिसला, पर मैंने खुद को संभाला।

"माँ?" मेरी आवाज़ फट गई।

हरनाम ने बैल रोक दिया। और मैं गाड़ी से कूदकर दौड़ा।

॥

मैं गाड़ी से कूदा और दौड़ा। पैर धूल में धँस रहे थे, और मेरी आँखें सिर्फ़ उस पीले दुपट्टे पर टिकी थीं।

माँ आगे आईं। उनके हाथ में लाठी थी, जो कभी चक्की की लकड़ी थी। उनके पीछे गाँव के बीस-पच्चीस लोग थे — हरनाम की बीवी, बंसी नाई, चिमन भाई के दो लड़के, और सबसे पीछे, लाठी पर टेक लगाए, सुक्खी बुआ। सुक्खी बुआ के हाथ में पान का बीड़ा नहीं था, एक लोहे का डंडा था।

"माँ!" मैंने उनके आगे घुटने टेक दिए। "आप कैसे—"

"उठ।" उन्होंने मेरा कंधा पकड़कर खींचा। उनकी हथेली में ज़ोर नहीं था, पर उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने बचपन में सुनी थी, जब वो मुझे रात को बुख़ार में पानी पिलाती थीं। "मैं तेरे पीछे-पीछे नहीं आई, बेटा। मैं तेरे आगे आई हूँ।"

मैंने पलटकर देखा। पीछे धूल में वो मशालें अब भी थीं, पर रुक गई थीं। गाँव वालों की भीड़ देखकर।

माँ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया। उनके हाथों में चक्की का आटा नहीं, मिट्टी थी। और उनकी आँखों में वो पानी था जो वो कभी नहीं दिखातीं।

"गुड़िया कहाँ है?" उन्होंने पूछा।

मेरा गला सूख गया।

"मैंने सोचा—" मेरी आवाज़ निकली ही नहीं।

"तूने सोचा गुड़िया मेरे पास है," माँ ने कहा। "और मैंने सोचा गुड़िया तेरे पास है।"

हम दोनों एक पल चुप खड़े रहे। और उस चुप्पी में मेरी छाती में जो हुआ, वो मैं शब्दों में नहीं कह सकता।

तभी पीछे से पैरों की आवाज़ आई। हरनाम भागता हुआ आया, हाँफते हुए। उसके हाथ में बस्ता था, वही बस्ता जो कल तक उसके पास था।

"वीर!" वो चिल्लाया। "वीर, रुक!"

वो आया और मेरे सामने घुटनों पर बैठ गया। उसका चश्मा टूटा हुआ था, एक काँच गायब था। उसकी आँख के नीचे खरोंच थी, ताज़ी।

"तुम्हारे आदमी ने रास्ते में रोका," उसने हाँफते हुए कहा। "वही सफ़ेद कुर्ता वाला, टूटे दाँत वाला। उसने मेरी गाड़ी रोकी और बस्ता माँगा।"

"तूने दे दिया?" मैंने पूछा।

"दे दिया।" हरनाम ने सिर उठाया, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और था, डर नहीं। "क्योंकि वो नकली बस्ता था, वीर। तुमने खुद कहा था। असली काग़ज़ पंचायत के ताले में हैं।"

मेरी साँस रुकी, फिर चली।

"तो फिर ठीक है," मैंने कहा।

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