Spirit of a Fighter95 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 95

6 min read November 5, 2026

"भाई, जब तू जीतेगा, तो मैं तेरे मुँह में खीर नहीं, पूरी की पूरी हांडी डालूँगा।"

"बातें मत बना। काका, उठिए।"

हम चले। कालू काका मेरे कंधे पर हाथ रखकर। टिंकू पीछे। कमरे के उस कोने में, जहाँ मोमबत्ती बुझ चुकी थी और सिर्फ़ धुआँ बचा था, वहाँ नाली थी।

कालू काका ने पत्थर की तरफ़ इशारा किया। "मैं इसे ढीला करता हूँ। तू नीचे देख।"

उन्होंने अपने सूखे हाथों से पत्थर को खींचा। एक तरफ़ हिला। फिर दूसरी। पत्थर सरका।

नाली से हवा आई। साफ़ हवा। ठंडी।

मैंने हाथ अंदर डाला। नाली छोटी थी। एक आदमी ही जा सकता था। पर जाने की ज़रूरत नहीं थी। मिट्टी पास में ही थी। बस हाथ भर अंदर।

"मिल गई," मैंने कहा। मेरी उँगलियों में मिट्टी आई। नरम। गरम। जैसे चूल्हे पर से अभी उतारी हो।

मैंने मुट्ठी भरी और बाहर निकाली।

टिंकू ने देखा। "ये तो… ये तो बिलकुल अलग है।"

"हाँ।" मैंने मिट्टी को सूँघा। और मेरी आँखें भर आईं। "इसमें कोई गंध नहीं है। कोई ज़हर नहीं। बस… बस मिट्टी है।"

कालू काका ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रखा। "यही है, बेटा। यही वो मिट्टी है जिसके लिए भैरव बीस साल से तरस रहा है। जिसे वो अपना हथियार बनाना चाहता था। पर वो इसे छू भी नहीं सकता। क्योंकि वो लालची है। और लालची आदमी के लिए ये सिर्फ़ मिट्टी है।"

मैंने मिट्टी को अपनी जेब में रखा। मेरी जेब पहले से भारी थी — सांचा, काग़ज़, मीरा का कंगन, और अब ये।

"काका, अब ऊपर चलिए।"

"नहीं।" कालू काका ने सिर हिलाया। "मैं अभी नहीं जाऊँगा।"

"काका—"

"सुन।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "जब भैरव को पता चलेगा कि तू यहाँ आया, तो वो पागल हो जाएगा। वो कल पंचायत में कुछ ऐसा करेगा जिससे सब डर जाएँ। और अगर मैं ऊपर गया, तो वो मुझे फिर उठवा लेगा। मुझे यहीं रहने दे। मैं इस मिट्टी पर बैठूँगा और तेरे पापा की तरह मरूँगा — अगर मरना ही हो, तो।"

मेरा गला भर गया।

"काका, आप मेरे साथ चलिए। मैं आपको अपने घर ले जाऊँगा। माँ है। गुड़िया है।"

कालू काका हँसे। उनकी हँसी में बीस साल की थकान थी।

"बेटा, मेरा घर यही है। मैंने बीस साल इस मिट्टी को सींचा है। ये मेरी माँ है। अब मैं इसे छोड़कर कहाँ जाऊँगा?"

टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। "भाई, वो ठीक कह रहे हैं। अगर हम उन्हें ऊपर ले गए, तो भैरव का आदमी उन्हें फिर पकड़ेगा। और तब हम नहीं होंगे पास में।"

मैंने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।

"काका, एक शर्त है।"

"बोल।"

"आप यहाँ अकेले नहीं रहेंगे। मैं टिंकू को आपके पास छोड़ जाऊँगा।"

"भाई!" टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं भैरव के आदमी से क्या लड़ूँगा?"

"तू नहीं लड़ेगा," मैंने कहा। "तू सिर्फ़ आवाज़ देगा। अगर कोई आए, तो तू चिल्लाएगा। मैं ऊपर दीवार के छेद पर रहूँगा। मैं सुन लूँगा।"

टिंकू ने निगल लिया। फिर उसने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई।

"भाई, एक बात।"

"कह।"

"अगर मैं चिल्लाऊँ, तो तू देर मत करियो। क्योंकि मैं एक ही बार चिल्ला पाऊँगा। फिर भैरव का आदमी मेरा गला दबा देगा।"

मैंने उसका कंधा थामा। "तू चिल्ला। मैं आऊँगा।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था, पर उसके होंठ हिल रहे थे — जैसे कोई गिनती कर रहा हो।

"पर भाई, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"जब तू जीतेगा, तो मैं तेरे मुँह में खीर डालूँगा। पर तू उसे खाएगा?"

मैं हँसा। "खाऊँगा। और अगर तूने उसमें नमक डाल दिया, तो भी।"

टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की। "तो फिर ठीक है। जा।"

मैंने मुड़कर देखा। कालू काका दीवार से टिककर बैठे थे। उनका सिर झुका हुआ था, पर उनके होंठ हिल रहे थे — जैसे कोई प्रार्थना कर रहे हों।

मैंने खूँटियाँ पकड़ीं और ऊपर चढ़ा।

ऊपर पहुँचकर मैंने सुरंग का ईंट वापस रखा। फिर दीवार के छेद की तरफ़ चला।

रास्ते में, अचानक, मेरी नाक में कुछ आया। ताज़ा। जला हुआ काग़ज़।

मैं दीवार के मोड़ पर रुका। ज़मीन पर, पत्थर के नीचे, एक जली हुई मोमबत्ती पड़ी थी। और उसके पास एक काग़ज़ का टुकड़ा। आधा जला हुआ।

मैंने उठाया।

उसके किनारे पर लिखाई थी — वही लिखाई जो मैंने पीले काग़ज़ पर देखी थी। रघुवीर की लिखाई।

"…परत नीचे, जड़ में…"

और फिर नीचे, किसी और के हाथ से, मोटे अक्षरों में, जो जलने से बच गए थे:

"…रघुवीर का नाम ज़िंदा है।"

मेरे हाथ काँपे।

मैंने काग़ज़ करीब से देखा। उसके कोने पर एक छोटा सा निशान था — अंगूठे का। जले हुए काग़ज़ पर भी वो निशान साफ़ था।

मैंने अपना अंगूठा उस पर रखा। मेल खा गया।

मेरा ही निशान था। मैंने ही ये काग़ज़ जलाया था। कब? कैसे?

मैं सोचने लगा। मेरे हाथ में तो कभी ये काग़ज़ नहीं आया…

फिर मेरा दिमाग़ ठंडा हुआ। ये मेरा निशान नहीं था। ये उसी आदमी का निशान था जिसके हाथ मेरे जैसे हैं।

पापा के हाथ।

मेरी आँखें भर आईं। मैंने काग़ज़ सीने से लगाया।

और तभी, मेरे पीछे, किसी के पैर की आहट आई।

धीमी। जानी-पहचानी। एक पैर सूखी मिट्टी पर, एक पैर नरम पर। जैसे कोई लंगड़ा कर रहा हो।

मैं पलटा।

अंधेरे में एक आकृति खड़ी थी। लालटेन उसके हाथ में थी, पर बुझी हुई।

वो धीरे से बोला, "तूने मिट्टी ले ली।"

मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा।

"अब वो तेरी नहीं रही," वो बोला। "अब वो मेरी है।"

"कौन है तू?"

वो हँसा। और उसकी हँसी में वो कड़वाहट थी जो मैंने हरनाम की साँस में सुनी थी, मुंशीजी की साँस में सुनी थी, और उस रात उस अनजान आदमी की साँस में सुनी थी।

"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे तेरे पापा ने मिट्टी में गाड़ दिया था। और जिसे भैरव ने बाहर निकाला।"

मेरी मुट्ठी कस गई। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी गरम थी। और मेरी जेब में सांचा टूटा पड़ा था, काग़ज़ मुड़े पड़े थे, और साफ़ मिट्टी की मुट्ठी मेरी हथेली को जला रही थी।

वो एक कदम आगे आया। उसकी बुझी लालटेन से धुआँ उठ रहा था।

"कल पंचायत में," उसने कहा, "तेरे पास ये मिट्टी होगी। और मेरे पास वो सच होगा जो तेरे पापा ने तुझसे छिपाया।"

"कौन सा सच?"

वो रुका। फिर बोला, "वो सच कि तेरे पापा मरे नहीं थे। उन्हें मारा गया था। और मारने वाला…"

उसने अपनी लालटेन उठाई।

"…मारने वाला तेरे पापा का अपना दोस्त था।"

और वो पलटा। इस बार वो भागा नहीं। वो धीरे-धीरे चला। जैसे जानता हो कि मैं उसका पीछा नहीं करूँगा।

मैं करता भी तो कैसे? मेरे पैर जम गए थे। मेरे हाथ में जला हुआ काग़ज़ था, जेब में साफ़ मिट्टी, और दिल में एक ही सवाल धक-धक कर रहा था —

पापा का दोस्त?

कौन?

कालू काका? जो अभी नीचे बैठे हैं? या वो आदमी जो कुएँ में बंद है? या कोई और, जिसे मैं अब तक नहीं जानता?

और मेरे पीछे, दूर, तहखाने से, टिंकू की आवाज़ आई — पहली बार डर में नहीं, ज़ोर से —

"भाई! काका कह रहे हैं — भैरव ने कल पंचायत में तेरी माँ को बुलाया है!"

॥

टिंकू की आवाज़ दूर से आई थी, पर मेरे कानों तक पहुँचने में देर लगी। जैसे कोई पानी के नीचे से चिल्ला रहा हो।

"भाई! सुनाई दे रहा है? भैरव ने कल पंचायत में तेरी माँ को बुलाया है!"

मैंने जले काग़ज़ को जेब में खोंसा। मेरे पैर अभी भी जमे हुए थे। सामने वो आदमी चला गया था, पर उसकी बातें मेरे सिर के अंदर घूम रही थीं — पापा का दोस्त। पापा का अपना दोस्त।

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