Spirit of a Fighter – Chapter 94
अंधेरे में खड़ा रहा। दस साँस लीं।
नीचे पहली परत — गीली मिट्टी। बारिश वाली। पुरानी। बीस साल पुरानी।
दूसरी परत — सूखी। रेत जैसी। उसमें पसीने की गंध थी, और वो भी पुरानी।
तीसरी परत — और यहाँ मेरी नाक झटके से पीछे हटी।
"भाई?" टिंकू ने मेरी कमर पकड़ी।
"तीसरी में ज़हर है," मैंने कहा। "पूरी परत में। एक जैसा। मिलाया हुआ।"
"और नीचे?"
चौथी परत — मुझे झुकना पड़ा। घुटने टेके। हथेली मिट्टी पर रखी।
और मेरी आँखों में पानी आ गया।
"भाई?"
"नीचे साफ़ है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी। "बिलकुल साफ़। वो मिट्टी… वो मिट्टी दवा जैसी है। जैसे माँ की रसोई में सुबह की भाप।"
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। "तो चल ना। सीधे नीचे।"
"नहीं।" मैंने कहा। "तीसरी परत पार करनी है। और वो परत ज़हरीली है। अगर हम उसे छूकर आगे गए, तो वो हमारी त्वचा पर चढ़ेगी। फिर तहखाने की साफ़ मिट्टी का कोई फ़ायदा नहीं।"
"तो क्या करें?"
"रास्ता है।" मैं उठा। "कालू काका ने एक बार कहा था — तहखाने में जाने का एक ही साफ़ रास्ता है, और वो ज़मीन से नहीं, दीवार से आता है। पुराने ज़माने के साधु कभी नीचे खड़े नहीं उतरते थे। वो दीवार में बनी खूँटियों पर पैर रखकर उतरते थे।"
मैं सुरंग में घुसा।
अंधेरा ऐसा था जैसे आँखों पर कपड़ा बाँध दिया हो। मैंने हाथ आगे किया। दीवार मिली। ठंडी। गीली।
"टिंकू, मेरे पीछे रह। और मेरी कमर पकड़े रह। अगर मैं रुकूँ, तो तू भी रुक। अगर मैं झुकूँ, तो तू भी झुक।"
"और अगर तू गिरे?"
"तो मत पकड़ना। भाग जाना।"
"भाई—"
"मज़ाक कर रहा हूँ। पकड़ लेना।"
वो हँसा। डर में भी हँसा। यही तो टिंकू है।
हम चले। मेरे नंगे पैर मिट्टी पर टटोलते रहे। उँगलियाँ दीवार पर सरकती रहीं। मेरी नाक हवा चाटती रही।
दस कदम। बीस। तीस।
फिर मेरा हाथ रुका।
"क्या?" टिंकू ने फुसफुसाया।
"खूँटी आ गई।" मैंने उँगली से टटोला। लोहे का टुकड़ा दीवार में धँसा हुआ। जंग लगा। "अब ध्यान से। मैं पहले पैर रखूँगा। फिर तू।"
मैंने दाहिना पैर खूँटी पर रखा। पकड़ा। संभाला। फिर बायाँ नीचे टटोला — दूसरी खूँटी मिली।
"टिंकू, अब तेरी बारी। मेरी जगह पर आ। और मेरी कमर पकड़े रह।"
वो आया। उसका पैर काँप रहा था। मैंने महसूस किया।
नीचे उतरते गए। तीन खूँटियाँ। चार। पाँच।
और फिर मेरा कान भर गया।
"रुक," मैंने कहा। "साँस सुन।"
दोनों रुके।
अंधेरे में किसी के साँस लेने की आवाज़ आई। धीमी। भारी। रुक-रुक कर। जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीने में दर्द लिए बैठा हो।
टिंकू ने मेरी कमर और कसकर पकड़ी।
"भाई, ये तो…"
"कालू काका," मैंने धीमे से कहा।
"हम बोलें?"
"नहीं। पहले जानें, वो अकेले हैं या कोई और भी है।"
मैंने सूँघा। और मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।
"भाई?"
"वहाँ मिट्टी का तेल है," मैंने कहा। "बहुत सारा। और मोमबत्ती की गंध। जलती हुई मोमबत्ती।"
"मोमबत्ती?" टिंकू की आवाज़ फटी। "तो कोई है वहाँ!"
"हाँ।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "और वो हमारा इंतज़ार कर रहा है।"
आख़िरी खूँटी। मैं नीचे उतरा। ज़मीन मिली — नरम, ठंडी, साफ़ मिट्टी। मेरे पैरों के नीचे ऐसी लगी जैसे माँ की गोद।
लेकिन मैंने उसे पहचाना। ये वो मिट्टी नहीं थी जो ऊपर थी। ये अलग थी।
टिंकू भी नीचे उतरा। उसने मेरी बाँह पकड़ी।
सामने, कोने में, एक मोमबत्ती जल रही थी। बुझने वाली। उसकी लौ काँप रही थी। और उस लौ की रोशनी में मुझे कालू काका दिखे।
वो दीवार से बँधे थे। रस्सी से नहीं — लोहे की जंज़ीर से। उनका सिर झुका हुआ था। मुँह सूखा। होंठ फटे।
"काका!" मैं दौड़ा।
उन्होंने सिर उठाया। आँखें खोलीं। और उनकी आँखों में पहले डर आया — फिर पहचान।
"बेटा…" उनकी आवाज़ किसी और की थी। फटी। कमज़ोर। "तू आ गया। मैंने सोचा तू नहीं आएगा।"
मैंने जंज़ीर पकड़ी। "चाबी?"
"जंज़ीर की चाबी नहीं है। ताला पीछे दीवार में जड़ा है। तोड़ना पड़ेगा।"
टिंकू ने लाठी आगे की। "भाई, लाठी से?"
"नहीं।" मैंने चारों तरफ़ देखा। "पत्थर चाहिए। बड़ा।"
टिंकू ने पीछे देखा। अंधेरे में। "मैं जाता हूँ।"
"नहीं, तू काका के पास रुक।" मैं उठा। "मैं जानता हूँ कहाँ पत्थर हैं।"
मैंने दीवार के पास जाकर टटोला। हाँ — कालू काका ने एक बार बताया था, तहखाने में पुरानी चक्की का पत्थर पड़ा है। साधु उस पर अनाज पीसते थे।
मिला। भारी। सफ़ेद। मैंने उठाया।
"टिंकू, हट जा।"
मैंने ज़ोर से पत्थर पीछे दीवार पर दे मारा। जहाँ ताला जड़ा था। पहली बार — कुछ नहीं। दूसरी बार — चटकी। तीसरी बार — टूटी।
जंज़ीर ढीली हुई।
कालू काका आगे गिरे। मैंने उन्हें थामा।
"पानी," उन्होंने कहा। "पानी…"
"टिंकू, पानी है?"
"नहीं भाई… पर रुक।" उसने अपनी जेब से एक छोटी सी बोतल निकाली। "मैंने सुबह चाय के लिए भरी थी।"
कालू काका ने पिया। दो घूँट। फिर रुके। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"बेटा, वो काग़ज़… जो दीवार पर लिखा था… वो मैंने लिखा। पर पूरा नहीं लिख पाया। उसके आदमी मेरी गर्दन पकड़कर खींच ले गए।"
"काका, धीरे बोलो।" मैंने उनका सिर सहलाया।
"नहीं, अभी बोलूँगा।" उनकी आँखों में वो पुरानी चमक लौट आई। "बीस साल में मैंने ये बात किसी को नहीं बताई। पर आज…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज तेरे पापा का बेटा सामने बैठा है।"
उन्होंने गहरी साँस ली। "तहखाने की मिट्टी में चार परतें हैं। ऊपर वाली — बेकार। उसके नीचे — थकान खींचने वाली। उसके नीचे — भैरव की ज़हरीली परत। और सबसे नीचे…"
"सबसे नीचे साफ़," मैंने कहा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें बड़ी हुईं।
"तू… तूने सूँघ लिया?"
मैंने सिर हिलाया।
कालू काका की आँखों में पानी आ गया। "बीस साल बाद…" वो फुसफुसाए। "रघुवीर की नाक उसके बेटे में लौट आई।"
मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
"काका, वो परत जो ज़हरीली है — उसे पार कैसे करें? हम दीवार से आए, तो हमारे पैर नहीं लगे। पर साफ़ मिट्टी तक पहुँचने का रास्ता?"
कालू काका ने अपना सिर दीवार पर टिकाया। "दीवार के उस कोने में… एक पुराना नाली है। जो सीधे साफ़ परत तक जाता है। पर नाली सँकरी है। बंद भी है पत्थर से। भैरव ने बंद करवा दिया था। पर…"
"पर?"
"पत्थर ढीला है। मैंने खुद ढीला किया था। ताकि अगर कोई आए तो…" उनकी आवाज़ रुकी। "ताकि अगर तू आए तो।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "भाई, चलें?"
मैंने कालू काका को उठाया। "पहले इन्हें ऊपर भेजेंगे।"
"नहीं।" कालू काका ने मेरा हाथ झटक दिया। "मैं यहीं रहूँगा। मैं ऊपर नहीं जाऊँगा।"
"काका—"
"बेटा, सुन।" उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। उनकी पकड़ में अब भी ताकत थी। "मैं तेरे साथ चलूँगा। नाली तक। मैं जानता हूँ कहाँ है। और मैं जानता हूँ उस मिट्टी को कैसे निकालना है। तेरे पापा ने मुझे सिखाया था — ईमान से निकालो, तो वो तेरी हो जाती है। लालच से निकालो, तो वो सिर्फ़ मिट्टी रह जाती है।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने होंठ सिकोड़े। फिर कहा, "भाई, मैं तो पहले ही डर रहा हूँ। अब तू ये बूढ़े को भी साथ ले रहा है। मेरी तो…"
"चुप कर," मैंने हँसकर कहा। "तू तो खीर लाने वाला था। यहाँ क्या कर रहा है?"
टिंकू रुका। फिर वो हँसा। ज़ोर से। उस अंधेरे में, उस ज़हरीली मिट्टी के बीच, उसकी हँसी किसी घंटी जैसी लगी।
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