Spirit of a Fighter – Chapter 93
मैंने वो कागज़ सीने से लगा लिया।
अचानक मेरी नाक में एक और गंध आई। तेज़। जलती हुई। धुएँ की। और मैं पलटा। नीम के पेड़ के पीछे से धुआँ उठ रहा था। हल्का, पर साफ़। और उसके नीचे आग की लपटें दिख रही थीं।
हरनाम की बोरी जल रही थी। या शायद कुछ और। और उस आग की रोशनी में मुझे दीवार पर कुछ लिखा दिखा। कोयले से। बड़े अक्षरों में।
"कल तेरी माँ का नंबर है।"
मेरा खून ठंडा हो गया। मैं भागा। दीवार के छेद से बाहर निकला। मैदान पार किया। घर की तरफ़ दौड़ा। मेरे नंगे पैर ज़मीन पर पड़ रहे थे, और मेरी साँस फट रही थी।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। मैंने अंदर झाँका।
माँ चारपाई पर बैठी थीं। जाग रही थीं। उनके हाथ में चाकू था। और उनकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं।
मुझे देखकर उन्होंने चाकू नीचे रखा।
"आ गया?" उन्होंने कहा। आवाज़ में डर नहीं था। बस थकान। "मैं जानती थी तू जाएगा।"
मैं उनके पास गया और उनके पैरों पर बैठ गया। उनके हाथ अपने सिर पर रखे। "माँ, कल पंचायत में सब खत्म हो जाएगा। मेरे पास सबूत हैं। हरनाम ने दिए।"
माँ ने मेरे बालों में हाथ फेरा। "और अगर नहीं हुआ?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "तो भी लड़ूँगा।"
माँ मुस्कुराईं। पहली बार उस रात में। "तो सो जा। सुबह लड़ाई है।"
मैं लेटा। पर नींद नहीं आई। मेरे हाथ में सांचा था, और मिट्टी अब भी गरम थी। मैंने उसे अपने सीने पर रखा।
और तभी मेरी जेब में मोबाइल काँपा। मीरा का मैसेज था — "कालू काका गायब हैं। उनका घर खाली है। दरवाज़े पर खून के छींटे हैं।"
मैं उठकर बैठ गया। और मेरे हाथ में सांचा टूट गया।
मिट्टी मेरी हथेली पर बिखर गई। और उस मिट्टी के नीचे, सांचे के अंदर, एक चिट्ठी थी। मुड़ी हुई। पुरानी। जिस पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे —
"अभी आ।"
॥
"अभी आ।"
दो शब्द। बस दो शब्द। और मेरे हाथ से सांचा टूटकर मिट्टी बन गया।
माँ चारपाई पर बैठी थीं। उन्होंने मेरा चेहरा देखा और बिना कुछ पूछे उठकर खड़ी हो गईं।
"माँ, कालू काका—"
"जा," उन्होंने कहा। "पहले भी जाता था तो मैंने रोका। अब नहीं रोकूँगी। पर एक बात सुन ले।"
मैंने जूती पहनी।
"जो आदमी खून के छींटे छोड़कर जाता है, वो आदमी होता ही नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो आँगन की मिट्टी में सुबह होती है। "वो जानवर होता है। जानवर के सामने पीठ मत करना।"
मैं दौड़ा। रास्ते में टिंकू की दुकान के पीछे से आवाज़ आई — "भाई!"
वो टिन के शेड से निकला, हाथ में लाठी, कमर में धोती कसी हुई, सिर पर टोपी तिरछी।
"तू कहाँ जा रहा है?"
"कालू काका का घर।"
"अकेले?"
मैंने देखा उसके हाथ काँप रहे थे। लाठी भी काँप रही थी।
"तू आएगा?" मैंने पूछा।
उसने लंबी साँस ली। "भाई, मैं तो कल से ही कसरत शुरू करने वाला था। पर लगता है आज ही करनी पड़ेगी।" और चल पड़ा।
कालू काका का घर अखाड़े की पिछली दीवार के पीछे था। एक छोटी झोपड़ी, बाहर टूटी चारपाई, और दरवाज़े पर लोहे की कुंडी।
कुंडी टूटी थी। दरवाज़ा आधा खुला था।
मैं रुका। सूँघा।
हवा में लोहे की गंध थी। और उसके नीचे… उसके नीचे कुछ और।
"क्या है?" टिंकू ने फुसफुसाया।
"खून नहीं," मैंने कहा। "ये खून नहीं है।"
"तो?"
"गुड़।" मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "गुड़ और चूने की गंध है। दीवार पर कुछ पोता गया है।"
टिंकू ने लाठी कसकर पकड़ी। "भाई, मुझे तो ये मिठाई वाली बात भी अजीब लग रही है।"
अंदर गया। चूल्हा ठंडा था। चारपाई खाली थी। पर चारपाई के नीचे मिट्टी पर एक चप्पल पड़ी थी — बड़ी, फटी, दाहिनी तरफ़ की।
मैंने उसे उठाया। उल्टा किया। तले पर मिट्टी जमी थी।
और वो मिट्टी… वो मिट्टी लाल थी। अखाड़े वाली लाल।
टिंकू ने मेरा चेहरा देखा। "तहखाने वाली?"
मैंने सिर हिलाया। "ये चप्पल दीवार के उस तरफ़ से आई है। और ये मिट्टी ताज़ी है। एक-दो घंटे पुरानी।"
"मतलब कालू काका को उठाकर ले गए?"
"नहीं।" मैंने चप्पल को करीब से देखा। "देख, एड़ी घिसी है, पर एड़ी पर खून नहीं है। और अगर किसी को घसीटकर ले जाते, तो चप्पल पैर से निकल जाती। ये चप्पल यहाँ पड़ी है क्योंकि किसी ने इसे उतारा है।"
"किसी ने उतारा?"
"कालू काका ने खुद उतारी।" मैंने चप्पल टिंकू की तरफ़ बढ़ाई। "ये निशान देख। कालू काका के पैर में जो अंगूठे के पास हड्डी निकली हुई है, उसका निशान है। उन्होंने खुद चप्पल उतारी। जल्दी में।"
टिंकू ने चप्पल पकड़ी और उसे सूँघा। फिर झटके से दूर कर दी।
"भाई, इसमें तो…"
"हाँ। उसमें भी वही है।" मैंने कहा। "भैरव की बोतल वाली कड़वाहट। कालू काका के पैर में भी अब वो है।"
टिंकू की आँखें भर आईं। "तो वो बूढ़ा आदमी… जो रोज़ सुबह मिट्टी सींचता है…"
"वो आदमी कुछ जानता है जो भैरव नहीं चाहता कि हम जानें।" मैंने चप्पल जेब में रखी। "और इसलिए भैरव ने उसे उठवा लिया।"
टिंकू ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। "पर दीवार पर ज़रा आ।"
मैं गया।
दीवार पर, गुड़ और चूने से, बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था। अधूरा। जैसे लिखने वाले की कलाई काँप रही हो।
"परत तीन नीचे। जड़ में। रघु—"
नाम अधूरा था। आख़िरी अक्षर से एक लकीर नीचे खींची गई थी, जैसे कोई बीच में ही उठा लिया गया हो।
मेरा गला सूख गया।
"उन्होंने मेरे पापा का नाम लिखना शुरू किया था," मैंने कहा। "और बीच में रोक दिया गया।"
टिंकू ने दीवार पर हाथ फेरा। उसकी उँगली पर गुड़ चिपक गया।
"भाई…" उसकी आवाज़ बैठ गई। "अगर ये कालू काका ने लिखा है, तो उन्होंने हमें कुछ बताना चाहा है। और अगर वो बता रहे हैं, तो मतलब वो अभी ज़िंदा होंगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "हो सकता है। पर ज़्यादा देर नहीं। भैरव जिसे उठाता है, उसे दो दिन से ज़्यादा नहीं रखता।"
टिंकू ने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "तो क्या करें?"
"तहखाना," मैंने कहा। "कालू काका ने 'परत तीन नीचे' लिखा है। ये तहखाने की मिट्टी की परतों की बात है। और 'जड़ में' — मतलब उस मिट्टी के नीचे जो जड़ है।"
"भाई, वो जगह मुझे नहीं पता।"
"मुझे पता है। कालू काका ने एक बार दिखाई थी। नीम के पीछे से सुरंग है। पर उसमें जाने के लिए…"
"के लिए?"
"लालटेन नहीं जलानी।"
टिंकू ने निगल लिया। "मतलब अंधेरे में?"
"अंधेरे में। गंध के सहारे। अगर लालटेन जलाई, तो जो भी वहाँ है, उसे हमारा पता चल जाएगा। और आज वहाँ कोई तो है।"
टिंकू ने आसमान देखा। "भाई, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"मैं रसोइया हूँ। मुझे अंधेरे में अचार का बर्तन भी नहीं मिलता। मुझे तेरे पीछे खड़े रहने दे।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन। "चल।"
रात गहरी थी। नीम का पेड़ काला खड़ा था। उसके नीचे वो पुरानी बोरी जलकर राख हो चुकी थी, और राख अब भी गरम थी।
मैंने जूती उतारी। टिंकू ने भी उतारी।
"क्यों?"
"मिट्टी सुन्नी कर देगी। पैर नंगे होंगे तो गंध ज़्यादा पकड़ेगा।"
हम सुरंग के मुँह पर पहुँचे। कालू काका ने पिछली बार एक झाड़ी के नीचे से ईंट हटाकर रास्ता खोला था। ईंट अब भी ढीली थी।
मैं ईंट हटाकर अंदर झुका। हवा बाहर आई।
मेरी नाक में एक साथ कई चीज़ें घुसीं।
"रुक," मैंने टिंकू को रोका। "पहले मैं सूँघ लूँ।"
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