Spirit of a Fighter92 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 92

7 min read November 5, 2026

मैंने एक गहरी साँस ली। छेद छोटा था, पर मैं दुबला था। मैंने पहले अपना सिर डाला, फिर कंधे। मिट्टी मेरे कपड़ों को नोच रही थी, पर मैं अंदर खिसक गया।

अंदर उतरते ही मुझे वो गंध मिली — अखाड़े की लाल मिट्टी, पसीना, और तेल। वही तेल जो सुक्खी बुआ ने कहा था कि भैरव ने शहर से मँगवाया था। तेल की गंध मुझे सीधे नीम के पेड़ की तरफ़ ले चली।

मैं दीवार से चिपका हुआ चल रहा था। मेरे पैर नंगे थे, और मिट्टी गीली थी — किसी ने अभी-अभी पानी डाला था। जब मैं गड्ढे के पास पहुँचा तो रुका। गड्ढे में मिट्टी का ताज़ा ढेर था, और उस पर एक कपड़ा पड़ा था। मैंने वो कपड़ा उठाया।

वो अखाड़े की पुरानी धोती थी। लाल रंग की। और उस पर खून के धब्बे थे — पुराने, सूखे।

मेरा दिल धक-धक करने लगा।

मैंने कपड़ा वापस रखा और आगे बढ़ा। नीम का पेड़ अब सामने था। उसकी पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं, और उनकी खुशबू मुझे बचपन में ले गई — जब माँ नीम की पत्तियाँ पीसकर घाव पर लगाती थीं। पर आज वो खुशबू कड़वी लग रही थी। क्योंकि उसके नीचे से दूसरी गंध आ रही थी। ज़हर की।

लालटेन अब पेड़ के ठीक नीचे थी। मैंने देखा — कोई बैठा हुआ था। घुटनों के बल। ज़मीन खोद रहा था। उसके हाथ तेज़ी से चल रहे थे, और पास में एक बोरी पड़ी थी।

मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। एक सूखी टहनी मेरे पैर के नीचे आई और चटक गई।

आवाज़ हुई।

वो रुक गया। उसका सिर उठा। लालटेन की रोशनी में मैंने उसका चेहरा देखा।

हरनाम।

वो अपनी कमीज़ की बाँह से अपना मुँह पोंछ रहा था। उसके चश्मे पर मिट्टी लगी थी। और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने उसके चेहरे पर कभी नहीं देखा था। जब वो मेरे सामने हिसाब माँगता था, तब उसकी आँखें ठंडी थीं। अब नहीं। अब वो काँप रहा था।

"तू?" उसकी आवाज़ फटी। "तू यहाँ कैसे?"

मैंने चप्पल उसकी तरफ़ फेंकी। वो उसके पैरों के पास गिरी।

"ये तेरे आदमी की है," मैंने कहा। "जो मेरे घर के पीछे से गुज़रा। वो कहाँ है?"

हरनाम ने चप्पल देखी। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसका चेहरा बदल गया। जैसे किसी ने उसका नकाब खींच लिया हो।

"मेरा आदमी?" वो धीरे से हँसा। पर वो हँसी रोने जैसी थी। "वीर सिंह, तू अभी तक यही सोचता है? कि भैरव के सारे आदमी भैरव के हैं?"

मैं ठिठक गया।

"ये चप्पल उस आदमी की है," हरनाम ने कहा, "जो दो महीने पहले मेरे पास आया था और बोला था — 'मुझे भैरव के हर काम की खबर चाहिए।' और मैंने उसे काम पर रख लिया। क्योंकि मुझे भी भैरव से डर लगता है। और मैंने सोचा — शायद कोई ऐसा मिल जाए जो मुझे उससे बचा सके।"

मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया। "वो आदमी कौन है?"

हरनाम ने ज़मीन खोदनी बंद कर दी। उसने अपनी बोरी उठाई और उसके अंदर से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। वो लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये मैंने आज शाम तैयार किया था," उसने कहा। "कल पंचायत में देना था। पर मैं अब तक डर रहा था। अब नहीं।"

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर कागज़ थे। बहुत सारे। बीस साल के हिसाब। हर पहलवान का नाम, तारीख, कितना पानी दिया गया, कितनी जीत का पैसा भैरव ने लिया, कितनी मौत को "बीमारी" लिखा गया।

और सबसे नीचे एक अलग कागज़ था। पीला। जिस पर रघुवीर की लिखाई थी।

मेरी आँखें जलने लगीं।

"तू इतना सब जानता था," मैंने कहा, "और चुप रहा?"

हरनाम ने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा। उसके हाथ काँप रहे थे।

"मैं डरपोक हूँ, वीर," उसने कहा। "मैं हमेशा से रहा हूँ। मैंने हिसाब इसलिए रखा कि कभी काम आएगा। पर मुँह खोलने की हिम्मत नहीं जुटाई। तेरे पापा मरे, और मैंने उनकी मौत का कागज़ भर दिया। जगदीश मरे, और मैंने उसका कागज़ भी भर दिया। हर मौत पर मैंने सिर्फ़ ये सोचा — 'अच्छा, मैं बच गया।'"

उसकी आवाज़ टूट गई।

"और कल जब तूने मेरे दफ़्तर में आकर हिसाब माँगा," उसने कहा, "मुझे पहली बार लगा कि शायद कोई है जो भैरव से नहीं डरता। और मैंने सोचा — अगर ये लड़का लड़ेगा, तो मैं भी इसके साथ खड़ा रहूँगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, और उसका चेहरा उस आदमी का नहीं था जो मुझे धमकाता था। ये कोई और आदमी था। एक टूटा हुआ, थका हुआ आदमी जो बीस साल से अपनी ही चुप्पी में जल रहा था।

"तो तूने मेरी मदद क्यों नहीं की?" मेरी आवाज़ भारी थी। "तूने पहले क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि मैं कायर हूँ," उसने सीधा कहा। "और कायर को हिम्मत तभी आती है जब वो देखता है कि कोई और भी लड़ रहा है। तू लड़ रहा था। इसलिए मैं आज रात यहाँ आया। इस डर से कि भैरव तहखाने की मिट्टी उठा ले जाएगा। अगर वो मिट्टी उसके पास चली गई, तो सबूत मिट जाएगा।"

उसने अपनी बोरी से एक छोटा-सा सांचा निकाला। उसने मिट्टी उसमें भरी और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये असली मिट्टी है," उसने कहा। "तहखाने की। जो गड्ढे में नहीं मिली। मैंने इसे अलग रखा था।"

मैंने सांचा लिया। मिट्टी गरम थी। और उसकी गंध में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा — मीठी, गीली, जैसे माँ के हाथ। जैसे चक्की के नीचे पड़ी आटे की परत। जैसे बारिश के बाद खेत।

"इसे सीने से लगा," हरनाम ने कहा। "और सुन। भैरव कल पंचायत में तेरे खिलाफ़ एक गवाह लाएगा। कोई ऐसा जो कहेगा कि तूने ही अखाड़े में ज़हर मिलाया।"

मैंने सांचा कसकर पकड़ा। "कौन?"

हरनाम ने कुछ कहना चाहा, पर तभी दूर से आवाज़ आई। नीम के पेड़ के पीछे से। किसी के चलने की आवाज़। और लालटेन की रोशनी हिल गई।

हरनाम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"वो आ गया," उसने फुसफुसाया। "जल्दी। तू जा। और ये कागज़ ले जा।"

मैंने कागज़ अपनी कमीज़ के अंदर खोंसे। "तू?"

"मैं रुकूँगा नहीं।" उसने अपनी बोरी उठाई और सांचा उसमें डाला। "पर वीर — अगर कल तक मैं न मिलूँ, तो समझ लेना कि भैरव ने मुझे पकड़ लिया। और फिर तू मेरी तलाश मत करना। बस पंचायत में ये कागज़ दिखा देना। बिना मेरे भी काम हो जाएगा।"

वो जाने लगा। फिर रुका। और पलटकर मेरी तरफ़ देखा।

"वीर, एक बात। तेरे पापा ने उस रात मुझे भी बचाया था। भैरव ने मुझे भी पानी दिया था, और तेरे पापा ने वो गिलास मेरे हाथ से छीनकर ज़मीन पर गिरा दिया था। मैं तभी से ज़िंदा हूँ।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "इसलिए मैं आज तक चुप नहीं रह सका। तेरे पापा का एहसान मुझ पर है। और मैं उसे आज चुका रहा हूँ।"

वो भाग गया। उसकी लालटेन की रोशनी पेड़ के पीछे गायब हो गई।

मैं वहीं खड़ा रहा। दीवार से चिपका। मेरे हाथ में सांचा था, कमीज़ के अंदर कागज़ थे, और मेरी जेब में मीरा का कंगन गरम था।

और मेरे सामने, नीम के पेड़ के नीचे, एक आदमी खड़ा था। जिसका चेहरा मैं देख नहीं पा रहा था। वो मेरी तरफ़ देख रहा था। और उसकी साँस में वो कड़वाहट थी जो मुझे पहचानी थी।

वो धीरे से बोला, "तो तू आ गया।"

मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। "तू कौन है?"

वो हँसा। उसकी हँसी में कुछ था जो सुक्खी बुआ की हँसी जैसा था। या शायद मैं सुनना चाह रहा था।

"कल पंचायत में पता चल जाएगा," उसने कहा। और पलटकर गायब हो गया।

मैं साँस लेने के लिए रुका। मेरी छाती धक-धक कर रही थी। मैंने कागज़ निकाले और एक कागज़, जो पीला था, उस पर नज़र डाली। रघुवीर की लिखाई। और उसके नीचे एक लाइन जो किसी और ने जोड़ी थी, काँपते हाथ से — "अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।"

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