Spirit of a Fighter – Chapter 91
मैं उठा। एक कदम में उसके पास पहुँचा और उसे उठाकर गोद में ले लिया। वो छोटी थी, फिर भी भारी लगी। उसके आँसू मेरी गर्दन पर गिर रहे थे, गरम।
"सुन," मैंने कहा। "तूने कुछ गलत नहीं किया। तूने तो सिर्फ़ अपने भैया पर गर्व किया था। कौन सी बहन अपने भाई पर गर्व नहीं करती?"
उसने मेरी बनियान पकड़ ली। "पर भैरव—"
"भैरव को मेरी नाक के बारे में पता है तो क्या?" मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "उसे पता है, फिर भी मैं यहाँ खड़ा हूँ। और तू जानती है क्यों? क्योंकि तेरी थैली में जो लाल मिट्टी है न, वो मेरी ताकत है। और वो मिट्टी तूने दी है।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, नाक बह रही थी। और उसने वो किया जो सिर्फ़ वो कर सकती थी। उसने मेरी कमीज़ के कोने से अपनी नाक पोंछी और कहा, "फिर ठीक है। पर अब मैं स्कूल में कुछ नहीं बोलूँगी। कभी नहीं। चाहे मास्टर जी पूछें, चाहे कोई।"
माँ चूल्हे के पास गईं और एक गिलास पानी लेकर आईं। उन्होंने गुड़िया को दिया, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अब बता," उन्होंने कहा। "कालू काका ने क्या कहा?"
मैंने बताया। रघुवीर के आख़िरी शब्द। तहखाने की मिट्टी पहले दवा थी। और सबसे बड़ी बात — कि मीरा के पापा भी सूँघ सकते थे। कि मीरा सालों से ऐसे आदमी को ढूँढ रही थी जो पानी की कड़वाहट पहचान सके। कि उसके पापा ने मरने से पहले अपनी बेटी को यही सिखाया था।
माँ ने सब सुना। फिर उन्होंने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया और बहुत धीरे से कहा, "तो वो लड़की सालों से तेरा इंतज़ार कर रही थी। और तू सोचता रहा कि वो तुझे 'बाहर वाला' कहकर चिढ़ाती है।"
मैं चुप हो गया। माँ की बात सीधी दिल में लगी। मैंने सोचा — जिस दिन मैंने पहली बार उसे देखा था, वो मुझे धक्का देकर मिट्टी से बाहर कर रही थी। और मैंने सोचा था कि ये शहर की घमंडी लड़की है। शायद वो उस दिन मुझे पहचान रही थी। शायद वो मेरी आँखों में ढूँढ रही थी कि उसके पापा ने किसके बारे में बताया था।
"माँ," मैंने कहा, "कल पंचायत है। कालू काका गवाही देंगे। पर भैरव के आदमी उनके घर के बाहर बैठे हैं। मीरा ने मैसेज किया।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपना गिलास उठाया और पानी पिया। "तो?"
"तो मुझे अभी जाना होगा।"
"जाएगा तो सुबह।" माँ की आवाज़ में वो बात थी जो बहस नहीं करती। "रात में तू अंधेरे में लड़ेगा, तो हारेगा। कालू काका अकेले नहीं हैं। वो सत्तर साल अखाड़े में खड़े रहे हैं। भैरव के दो आदमी उनका क्या बिगाड़ेंगे?"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर माँ ने हाथ उठाया।
"मैं जानती हूँ तू सोचेगा कि मैं तुझे डरा रही हूँ। पर सुन। मैंने एक बार तेरे पापा को रात में जाने दिया था।" उनकी आवाज़ रुकी। "वो लौटे, पर पूरे नहीं लौटे। अब तू मेरा आख़िरी है। तू रात में नहीं जाएगा।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो बच्चों को रात में अकेले सोने पर आता है। मैंने उसका हाथ पकड़ा और कहा, "ठीक है। सुबह जाऊँगा।"
पर नींद नहीं आई।
चारपाई पर लेटा था, और छत को देख रहा था। आँगन में टूटी घड़ी की सुई टिक-टिक कर रही थी, हालाँकि वो चलती नहीं। या शायद अब चलने लगी थी। मैंने सोचा — मीरा ने मुझसे कहा था, "जिस दिन सच खुलेगा, चलती हुई लौटाना।" और घड़ी चल रही थी। क्या इसका मतलब सच खुलने वाला है? या ये बस मेरा दिमाग़ है जो हर आवाज़ में मतलब ढूँढ रहा है?
मैं उठा। बाहर जाने का मन नहीं था, पर पानी पीने के लिए उठा। माँ सो रही थीं, उनकी साँस धीमी थी। गुड़िया मेरे पास सोई थी, उसका हाथ मेरी बाँह पर था।
और तभी मैंने सुना।
घर के पीछे से। किसी के पैरों की आहट। दबी हुई, जैसे कोई चप्पल घसीटकर चल रहा हो। रात के इस वक़्त कोई क्यों घर के पीछे से जाएगा? पीछे तो बस खाली मैदान है और उसके बाद अखाड़े की दीवार।
मैंने दरवाज़ा धीरे से खोला। बाहर अंधेरा था, पर मेरी आँखों को ज़्यादा देर नहीं लगी। मैंने साँस खींची।
और वही थी। वो कड़वाहट। जो अखाड़े के पानी में है। जो हरनाम के आदमी की साँस में थी। जो भैरव की बोतल से आती है।
मेरी नाक ने मुझे बताया — पीछे कोई है। दस कदम दूर। और वो रुका हुआ है। जैसे कोई दीवार से चिपका खड़ा हो।
मैंने अपनी चप्पल उतारी और नंगे पैर बाहर निकला। ज़मीन ठंडी थी, और मेरे पैरों के नीचे मिट्टी नरम। मैं पीछे की तरफ़ मुड़ा। कोई दिखा नहीं। पर गंध बता रही थी कि वो अभी-अभी वहाँ से गुज़रा है, बाएँ से दाएँ, घर के पीछे से।
मैं उसके पीछे चल पड़ा।
घर के पीछे खाली मैदान था। मैंने उसे देखा नहीं, पर उसकी गंध हवा में तैर रही थी, जैसे कोई धुआँ जो रास्ता दिखा रहा हो। वो तेज़ नहीं चल रहा था। जैसे कोई जान-बूझकर धीरे चले ताकि पीछे आने वाला पकड़ सके। या शायद वो मुझे रास्ता दिखा रहा था।
मैंने कदम रोके। मैंने सोचा — अगर ये जाल है? अगर भैरव ने कहा हो कि वीर को बाहर निकालो, और मैदान में गिरा दो?
पर मेरे पैर नहीं रुके। क्योंकि उस गंध में कुछ और भी था। पसीने की एक और परत — जो भैरव की नहीं, किसी और की थी। कोई और भी वहाँ था। या शायद कोई और भी आ रहा था।
मैं मैदान पार करके अखाड़े की दीवार के पास पहुँचा। दीवार पुरानी थी, मिट्टी की, और उस पर काई उगी थी। मैंने दीवार से हाथ टिकाया। गंध अचानक तेज़ हो गई। जैसे कोई मेरे ठीक सामने से गुज़रा हो।
फिर रुक गई।
मैंने इधर-उधर देखा। मैदान खाली था। और तभी मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी।
दीवार के पास, घास में, एक चप्पल पड़ी थी। पुरानी, टूटी, जिसकी एड़ी घिस गई थी।
मैं झुका। उसे उठाया। और मेरी नाक ने मुझे बता दिया — यही चप्पल हरनाम के उस आदमी की थी जो आज सुबह कालू काका के बाहर बैठा था। यही। मैंने उसकी साँस पहचानी थी, और मैं उसकी चप्पल उठाए खड़ा था।
पर ये चप्पल दीवार के पास क्यों पड़ी थी?
मैंने चारों तरफ़ देखा। अखाड़े का गेट बंद था, ताला लगा था। दीवार ऊँची थी — कोई आसानी से चढ़ नहीं सकता। पर दीवार के बीच में, ज़मीन से थोड़ा ऊपर, एक जगह थी जहाँ की मिट्टी टूटी हुई थी। जैसे कोई पत्थर निकाला गया हो। मैंने उस तरफ़ झाँका।
और मेरी साँस रुक गई।
वहाँ दीवार में एक छेद था — जो सिर्फ़ एक आदमी के निकल सकने जितना बड़ा था। नया छेद। कल का नहीं। शायद आज रात का। और उस छेद के नीचे ज़मीन पर पैरों के निशान थे। जूते के, चप्पल के नहीं। जूतों के निशान सीधे उस छेद से होकर अंदर की तरफ़ गए थे।
मैंने चप्पल को अपनी कमर में खोंसा और छेद की तरफ़ बढ़ा। अंदर झाँका।
अखाड़ा बिलकुल सुनसान था। मैदान बीचोबीच वो बड़ा गड्ढा था जो भैरव ने खुदवाया था। मिट्टी का ढेर पास में पड़ा था। और उस ढेर के पीछे, अंधेरे में, कुछ था।
एक रोशनी। दीये जैसी। दूर — अखाड़े के पीछे, जहाँ पुराना नीम का पेड़ है। मैंने देखा — रोशनी हिल रही थी। जैसे कोई टॉर्च लेकर चल रहा हो, पर टॉर्च नहीं, लालटेन। और वो लालटेन सीधे नीम के पेड़ की तरफ़ जा रही थी।
नीम के पेड़ के नीचे से तहखाने का रास्ता है।
कालू काका ने कहा था — भैरव दिन में अखाड़ा बंद रखेगा, पर रात में कुएँ के पास जाएगा। दूसरे रास्ते से तहखाने तक पहुँचता है।
मेरे हाथ काँपने लगे। पर डर से नहीं। गुस्से से। भैरव या उसके आदमी अभी अंदर थे। और वो तहखाने की तरफ़ जा रहे थे। आज रात। जब सब सो रहे हैं, जब अखाड़ा बंद है।
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