Spirit of a Fighter – Chapter 90
मैंने कंगन को जेब में रखा और तेज़ कदमों से नहर के किनारे-किनारे चल पड़ा। मेरे अंदर एक ही सवाल घूम रहा था — कालू काका ने मीरा को बताया? या मीरा के पापा के ज़माने में कोई और था जो जानता था? और अगर कालू काका ने बताया, तो इतने साल चुप क्यों रहे? मेरे पापा के पैर गए, माँ ने चक्की चलाई, मैंने ईंटें ढोईं — और वो सब जानते हुए भी चुप बैठे रहे?
नहर के मोड़ पर एक चाय की दुकान थी। कालू काका वहीं बैठते थे, हर शाम, एक गिलास आधी चाय छोड़कर। आज भी बैठे थे। मैंने उनके सामने जाकर खड़े होकर सीधा पूछा, "काका, आपने मीरा को मेरे बारे में बताया?"
कालू काका का हाथ रुका। चाय का गिलास मुँह तक जाते-जाते रुक गया। उन्होंने गिलास नीचे रखा, और बहुत धीरे बोले, "तू उस लड़की से मिला?"
"आपने पूछा नहीं कि मैं क्यों पूछ रहा हूँ।"
"क्योंकि मुझे पता है क्यों।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में वो पुराना डर था जो पापा के जाने के बाद कभी नहीं गया। "बेटा, मीरा के पापा मेरे साथ अखाड़े में लड़े थे। हम तीन थे — मैं, तेरा पापा, और वो। और जो पानी हमें दिया गया था, वो हम तीनों ने पिया। मैं बच गया क्योंकि मैंने आधा ही पिया। तेरे पापा ने पूरा पिया। और मीरा के पापा ने…" उनकी आवाज़ रुक गई।
"क्या?"
"मीरा के पापा ने पिया और पहचान लिया। उन्होंने भैरव को चेताया। और उसके बाद वो अखाड़े से गायब हो गए। किसी ने उन्हें फिर नहीं देखा।" कालू काका ने अपना गिलास उठाया, पर पिया नहीं। "मीरा तब छोटी थी। उसने अपने पापा को जाते देखा, वापस आते नहीं देखा। और मैं… मैं उससे कभी ये बात कह नहीं पाया कि उसके पापा किस वजह से गए थे।"
मेरे पेट में ठंड फैल गई। "तो उसे कैसे पता कि मैं सूँघ सकता हूँ?"
कालू काका ने एक लंबी साँस ली। "क्योंकि मीरा के पापा भी सूँघ सकते थे। वो पानी की कड़वाहट पहचानने वाले पहले आदमी थे। और उन्होंने मरने से पहले अपनी बेटी को यही सिखाया था — 'बेटा, जिस आदमी की नाक पानी की कड़वाहट पहचान ले, वो अकेला नहीं है। उसे ढूँढना।' मीरा सालों से ऐसे आदमी को ढूँढ रही थी। और आज उसने तुझे ढूँढ लिया।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। नहर कल-कल बहती रही। चाय की भाप उठती रही। और मुझे पहली बार लगा कि मेरी नाक सिर्फ़ मेरी नहीं है — वो मीरा के पापा की देन है, कालू काका की चुप्पी की गवाह है, और उस पानी का सच है जिसने हमारे घरों को खोखला कर दिया।
"काका," मैंने कहा, "कल पंचायत में मीरा रिपोर्ट लगाएगी। आप गवाही देंगे?"
कालू काका ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो किया जो मैंने उनसे कभी उम्मीद नहीं की थी। उन्होंने अपनी कमीज़ की जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली — फटी, मुड़ी, जिसमें तीन आदमी अखाड़े में खड़े हँस रहे थे। उन्होंने तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये तेरे पापा हैं," उन्होंने बीच वाले आदमी पर उँगली रखी। "और ये मीरा के पापा। और ये मैं।" उनकी आवाज़ भर्रा गई। "बीस साल से मैं इस तस्वीर को जेब में रखे घूम रहा हूँ, पर मुँह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। कल…" उन्होंने तस्वीर वापस जेब में रखी और गिलास से आख़िरी घूँट लिया। "कल मैं मुँह खोलूँगा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनका हाथ काँप रहा था। मेरा भी।
घर लौटते वक़्त रास्ते में मीरा का कंगन मेरी जेब में गरम था, और मैं सोच रहा था कि कल पंचायत में क्या होगा। भैरव क्या करेगा। और उस पानी का सच कितने घरों तक फैला है। मैंने सोचा कि सुबह मीरा से मिलकर ये बात बतानी होगी — कि कालू काका गवाही देंगे, कि मीरा के पापा की कहानी मेरे पापा की कहानी से जुड़ी है।
तभी मेरी जेब में मोबाइल काँपा। मीरा का मैसेज था, एक ही लाइन — "तुम जिस कालू काका के बारे में सोच रहे हो, उनसे आज रात मत मिलना। भैरव के आदमी उनके घर के बाहर बैठे हैं।"
मैं रुक गया। सड़क के बीच, अंधेरे में। मैंने पीछे मुड़कर देखा। कोई नहीं था। पर मेरी नाक ने कुछ पकड़ा — दूर से आती हुई एक गंध, पसीने की, जो मेरी जानी-पहचानी थी। अखाड़े की मिट्टी और उस कड़वे पानी की।
मीरा को कैसे पता कि कालू काका के बाहर आदमी बैठे हैं? जब तक मैं उनसे मिला, तब तक वो कहाँ थी?
मैंने मोबाइल जेब में रखा और सड़क के किनारे खड़े होकर एक गहरी साँस ली। हवा में वो कड़वाहट अब और साफ़ थी।
॥
हवा में वो कड़वाहट अब और साफ़ थी। मैं सड़क के किनारे खड़ा था, और मेरी नाक बता रही थी कि जो गंध दूर से आ रही है, वो मेरे पीछे से नहीं, मेरे आगे से आ रही है। सामने वाले मोड़ से। जहाँ से अभी-अभी कोई गुज़रा है।
मैंने कदम तेज़ किए।
घर पहुँचा तो आँगन में चूल्हे की आग बुझ चुकी थी, पर माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। मुझे देखकर उनकी साँस रुकी हुई सी लौटी।
"कहाँ था?" उन्होंने पूछा। सिर्फ़ इतना। पर उनकी आवाज़ में वो सवाल छुपा था जो वो पूछना नहीं चाहती थीं।
"कालू काका से मिला," मैंने कहा, और अंदर आकर चारपाई पर बैठ गया। "माँ, आपने किसी को बताया था? मेरी नाक के बारे में?"
माँ मेरे सामने बैठीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं, बेटा। मैंने तेरे पापा से भी कभी नहीं कहा। जब तू छोटा था, मैंने देखा था — तू दाल की गंध से बता देता था कि नमक कम है। मैंने उसे चुपचाप ठीक कर दिया, ताकि कोई पूछे नहीं। मैं जानती थी लोग क्या कहेंगे। बच्चे क्या कहेंगे।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके हाथ सूखे थे, चक्की चलाने से फटे हुए। और मुझे पहली बार लगा — माँ ने बीस साल मेरी नाक को छुपाकर रखा। जैसे कोई कीमती चीज़ को पुराने कपड़े में लपेटकर रखता है।
"तो फिर मीरा को कैसे पता?" मैंने कहा। "उसने साफ़ कहा — 'तुम्हारी नाक सिर्फ़ तुम्हारी नहीं है।' माँ, वो जानती है।"
माँ ने कुछ कहा नहीं।
तभी गुड़िया दरवाज़े के पीछे से निकली। उसकी आँखें बड़ी थीं, और उसकी कॉपी उसके हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई। वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही, फिर उसका चेहरा उतर गया। जैसे बारिश से पहले आसमान।
"भैया…" उसकी आवाज़ फटी। "भैया, एक बार… स्कूल में…"
मैं उसकी तरफ़ मुड़ा।
"एक दिन मैं गुड़िया और मैं…" वो हकलाने लगी। "उस दिन हम सब क्लास में बैठे थे। मास्टर जी बीमार थे, और कोई पूछ रहा था कि कैसे पता चलेगा। तो मैंने कहा — मेरा भैया गंध से बता देता है कौन बीमार है।"
मेरा दिल धक से रह गया।
"मैंने बस ऐसे ही कहा था, भैया," वो रोने लगी। "मुझे नहीं पता था कि कोई सुन रहा है। मुझे नहीं पता था।"
"कब?" मेरी आवाज़ सूखी निकली। "कब कहा था तूने?"
गुड़िया ने अपनी आँखें मलीं। "पिछले… पिछले महीने। जब स्कूल में सब बच्चे बीमार पड़ रहे थे।"
मैं वहीं बैठ गया। एक महीना। और मैं सोचने लगा — उस दिन। उस दिन मीरा स्कूल के पास से गुज़री थी। मैंने उसे देखा था। वो किताबों का बैग लिए जा रही थी, और मैंने सोचा था कि कोई शहर की लड़की अपने रास्ते जा रही है, मुझसे क्या लेना। पर वो रुकी थी। खिड़की के पास। मैंने उसे देखा नहीं था, पर अब याद आ रहा है — उस दिन स्कूल के बाहर उसका बैग झुका हुआ था, जैसे कोई सुन रहा हो।
"भैया, मुझे माफ़ कर दो," गुड़िया ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने तुम्हारा राज़ बता दिया। अब भैरव को भी पता चल जाएगा, और वो तुम्हें—"
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