Spirit of a Fighter – Chapter 89
"तुम्हें ये सब कहाँ से आता है?"
"गरीबी से," मैंने कहा। "जिसके पास एक ही कपड़ा हो, वो उसे तीन जगह छुपाकर रखना सीख जाता है।"
वो हँसी, और फिर चुप हो गई। कुछ देर हम दोनों नहर को देखते रहे। पानी में शाम की रोशनी गिर रही थी, सुनहरी और थोड़ी लाल।
और तभी मीरा ने वो सवाल पूछा जिसके लिए वो आई थी।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "तुम अखाड़े के पानी के बारे में क्या जानते हो?"
मैं चौंका। मेरी नाक में अचानक वो कड़वाहट भर गई जो हमेशा भैरव की बोतलों से आती थी।
"कौन सा पानी?"
"वही जो पहलवानों को पिलाया जाता है। सुबह-सुबह। भैरव के हाथ से।"
मैं चुप हो गया। मेरे दिमाग़ में कई बातें एक साथ चलीं — कि मैं क्या बताऊँ, कितना बताऊँ, और क्या छुपाऊँ। मेरी नाक मुझसे कह रही थी कि वो सच बोलूँ। पर मेरा डर कह रहा था कि अगर मैंने अपनी सूंघने की शक्ति बताई, तो मीरा वही समझेगी जो गाँव के बच्चे समझते थे। कुत्ता।
"मैं…" मैंने शुरू किया, फिर रुक गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सीधी थीं।
"तुम जानते हो," उसने कहा। "तुम कुछ जानते हो। तभी तो तुमने उस दिन अखाड़े में भैरव का पानी पीने से मना किया। तभी तो तुमने कहा कि ग्यारह पहलवान मरे।"
"मैंने कहा था —"
"तुमने कहा था कि उनकी गंध बदल गई थी।" मीरा ने मेरी तरफ़ झुककर कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी, गंभीर। "ये तुमने कैसे जाना?"
मेरे हाथ से पानी का लोटा छूट गया जो मैंने उठाया था। लोटा पत्थर पर गिरा और उसकी आवाज़ नहर के सन्नाटे में गूँज गई। पानी फैल गया, और मेरी चप्पल भीग गई। मैंने उसे उठाने की कोशिश की, पर मेरे हाथ काँप रहे थे।
मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो बस देखती रही। और उसकी चुप्पी में वो सवाल था जो मैं बीस साल से किसी से नहीं पूछा गया था।
"मेरे पापा के पैर इसी शहर में गए थे," उसने अचानक कहा। "इसी अखाड़े में। इसी मिट्टी में।" उसकी आवाज़ में अब वो ज़िद नहीं थी जो बहस में होती थी। यह कुछ और था। "मैं जब छोटी थी, तब वो मुझे कंधे पर बिठाकर घुमाते थे। फिर एक दिन वो गिरे। और कभी नहीं उठे। उस दिन से मैं यही सोचती हूँ — कैसे गिरे? कुश्ती में कोई ऐसा दाँव नहीं जो पैर सून्न कर दे। कोई ऐसा दाँव नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी। बस उसका एक किनारा भीग रहा था, जैसे नदी किनारे से थोड़ा सा बहती हो।
"मुझे शक है," उसने कहा, "कि उन्होंने कुछ पिया था। वही पानी। वही जो सब पीते हैं। और मुझे शक है कि तुम जानते हो कि उसमें क्या है।"
मैंने अपना लोटा उठाया। उसे अपने घुटनों के बीच रखा। मेरी माँ मुझे याद आई — उनका चेहरा, जब उन्होंने शीशी चूल्हे में जलाई थी। उनका काँपता हाथ।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं तुम्हें कुछ बताऊँ, तो तुम मुझ पर हँसोगी?"
"क्यों हँसूँगी?"
"क्योंकि जब मैं छोटा था, तब मैंने एक बार बताया था। और गाँव के लड़कों ने मुझे साल भर 'कुत्ता' कहकर चिढ़ाया।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा नहीं बदला।
"मैं तुम्हारे ऊपर नहीं हँसूँगी," उसने कहा। "तुम्हें मेरे ऊपर हँसने का मौका मत दो।"
मैंने एक लंबी साँस ली। नहर की हवा में अब ठंडक आ गई थी। मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
"मैं सूँघ सकता हूँ," मैंने कहा। "बहुत ज़्यादा। जितना आम आदमी नहीं सूँघ सकता। मैं किसी के पसीने से बता सकता हूँ कि वो कल कितना थका। किसी की साँस से बता सकता हूँ कि उसके पेट में क्या है। और भैरव के पानी में…" मैंने आँखें खोलीं और उसकी तरफ़ देखा। "उसमें वो कड़वाहट है जो ज़हर की होती है। मैंने उसे पहले दिन पहचाना था। जिस दिन मैं पहली बार अखाड़े में गया।"
मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने बहुत धीरे कहा, "मुझे पता था।"
"कैसे?"
"क्योंकि तुम्हारी नाक तुम्हारी आँखों से ज़्यादा बोलती है।" उसने अपना बैग उठाया। उसमें से एक काग़ज़ निकाला — मुड़ा हुआ, जिस पर लैब की मुहर थी। "ये रिपोर्ट है। इसमें साफ़ लिखा है कि पानी में एक ऐसा तत्व है जो ताकत तो बढ़ाता है, पर शरीर के अंदर की उम्र खा जाता है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "मेरे पापा ने भी यही पिया था। और मुझे लगता है कि तुम्हारे पापा ने भी।"
मैंने काग़ज़ लिया। उसे पढ़ा तो नहीं, क्योंकि उसमें अंग्रेज़ी थी, पर मैंने उसे सीने से लगा लिया। काग़ज़ में मीरा के हाथों की गंध थी — तुलसी, अदरक, और कहीं दूर एक हल्की सी काली मिर्च।
"सबूत के बिना आरोप नहीं," मीरा ने कहा।
"और आरोप के बिना चुप्पी नहीं," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगी। कुछ देर। फिर उसने सिर हिलाया, जैसे कोई हिसाब बराबर हो गया हो।
"कल पंचायत में," मैंने कहा, "ये रिपोर्ट सबके सामने रखनी होगी।"
"रखूँगी।"
"और भैरव कहेगा कि ये रिपोर्ट झूठी है।"
"तो मैं लैब वाले को बुलाऊँगी।"
"और अगर वो न आए?"
मीरा ने अपने बैग की तरफ़ देखा। फिर उसने वो किया जो मैंने उससे उम्मीद नहीं की थी। उसने अपनी कलाई से एक कंगन निकाला — चाँदी का, पुराना, जिस पर छोटे-छोटे नक्काशी थे — और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये मेरी माँ का था," उसने कहा। "वो मरने से पहले मुझे दे गईं थीं। मैं इसे कभी नहीं उतारती। पर अब तुम रखो।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर कल कुछ हो जाए, तो ये गवाही देगा कि मैं तुम्हारे साथ थी। और तुम्हारे पास जो भी है, वो मेरे बिना अधूरा है।"
मैंने कंगन लिया। वो ठंडा था, पर मेरी हथेली पर रखते ही गरम होने लगा।
"मीरा," मैंने कहा, "मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।"
वो उठी। उसने अपना बैग कंधे पर टाँगा। फिर वो मुड़ी और जाने लगी। कुछ कदम चली। और फिर रुकी।
वो पलटी। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं, और उनमें वो बात थी जो उसने अभी तक कभी नहीं कही थी।
"तुम्हारी नाक जो भी सूँघती है," उसने धीरे से कहा, "उससे कहना कि उस पानी में ज़हर है।"
और वो चली गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया। नहर का पानी बहता रहा। हवा चलती रही। और मेरे हाथ में मीरा का कंगन था, जो अब गरम था, और उसका गरम होना किसी और चीज़ का इशारा था, किसी और बात का। वो कैसे जानती थी? मैंने तो कभी किसी को नहीं बताया था। माँ को छोड़कर। और कालू काका को। और अब मीरा को।
पर उसने कहा — "तुम्हारी नाक जो भी सूँघती है, उससे कहना।" जैसे उसे पहले से पता हो। जैसे उसे किसी ने बताया हो। जैसे वो सिर्फ़ अंदाज़ा नहीं लगा रही थी, बल्कि जानती थी।
मेरे दिमाग़ में एक नाम उभरा, और मेरे पेट में ठंडी सी लहर दौड़ गई।
क्या मीरा को किसी ने बताया था? और अगर हाँ, तो किसने? क्या कोई और भी जानता है कि मैं सूँघ सकता हूँ?
कालू काका। मेरे मुँह से आवाज़ नहीं निकली, पर दिमाग़ में नाम गूँजता रहा। कालू काका ही थे जिन्होंने मुझे पहली बार कहा था — "बेटा, तेरी नाक में जो है, वो किसी को मत बताना। लोग इसे बीमारी समझेंगे।" वो खुद मेरे पापा के साथ अखाड़े में लड़े थे। जब पापा के पैर गए, तो कालू काका रोज़ हमारे घर आते थे — चुपचाप बैठते, माँ की चाय पीते, और जाते वक़्त मेरे सिर पर हाथ रख देते। एक बार भी नहीं बोले कि अखाड़े के पानी में क्या था। एक बार भी नहीं।
तो मीरा तक ये बात कैसे पहुँची?
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