Spirit of a Fighter – Chapter 88
"बेटा, ये क्या तमाशा लगा रखा है?"
भीड़ हटी। भैरव सिंह आ रहे थे। लाल धोती, सोने की चेन, तेल लगी मूँछें। उनके पीछे लुट्टन था, और लुट्टन के पीछे दो और आदमी। भैरव ने शटर पर चिपका काग़ज़ देखा। पढ़ा। और फिर वो हँसे — वैसी हँसी जो अखाड़े में गूँजती थी जब कोई नया लड़का गिरता था।
"टिंकू," वो बोले, "तू मेरी मिठाई बर्बाद कर रहा है। मैंने तुझे क्या कहा था? बाज़ार में नई दुकान खोलनी है तो अपनी मेहनत से खोल। दूसरों पर इल्ज़ाम लगाकर नहीं।"
टिंकू काँप रहा था। पर वो पीछे नहीं हटा। वो काउंटर के पीछे से निकला और सीधा भैरव के सामने आकर खड़ा हो गया।
"सर," वो बोला, "मैंने ये मिठाई नहीं बनाई। ये आपकी भेजी हुई है। मेरी दुकान पर से कोई ले गया था। और उसमें ज़हर है।"
भैरव की हँसी रुक गई। बिलकुल नहीं, धीरे-धीरे, जैसे पानी में पत्थर डालने पर लहरें शांत होती हैं।
"ज़हर?" उन्होंने कहा। "तू मेरे ऊपर इल्ज़ाम लगा रहा है? मैंने तुझे ये मिठाई भेजी? कब? किसके हाथ?"
"कल शाम। आपके आदमी ने दी थी।"
"कौन सा आदमी? नाम बता।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
"नाम नहीं पता, सर। पर उसने कहा था कि भैरव सर की तरफ़ से है।"
"तो बिना नाम के, बिना सबूत के, तू मेरी मिठाई में ज़हर बताकर मेरी इज़्ज़त उतार रहा है?" भैरव ने भीड़ की तरफ़ देखा। "देखो, रामपुर वालो, देखो। ये लड़का, जिसे मैंने अपने अखाड़े में पनाह दी, जिसकी गरीबी पर मैंने रहम किया — ये आज मेरे नाम पर ज़हर का इल्ज़ाम लगा रहा है।"
भीड़ में कुछ लोग सिर हिलाने लगे। कुछ ने टिंकू की तरफ़ देखा, कुछ मेरी तरफ़। मैंने महसूस किया कि हवा पलट रही है।
मैं आगे आया। मैंने डिब्बी उठाई। उसे भैरव की तरफ़ बढ़ाया।
"सर," मैंने कहा, "आप खुद पहले एक मिठाई खा लीजिए।"
भैरव रुके। उनकी आँखें मिठाई पर गईं। एक पल के लिए — बस एक पल के लिए — उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर। छोटा सा, धुँधला, पर था।
फिर वो मुस्कुराए।
"तू मुझे परख रहा है, बेटा?" उन्होंने धीरे से कहा। "तू मुझे अपनी मिठाई खिलाकर ये साबित करना चाहता है कि मैं डरता नहीं? ठीक है।" उन्होंने डिब्बी से एक लड्डू उठाया। "पर मैं तेरे हाथ से नहीं लूँगा।" उन्होंने लड्डू भीड़ की तरफ़ बढ़ाया और एक बूढ़े आदमी को दिया — बूढ़ा मंदिर के पास बैठता था, सब उसे जानते थे। "ये खा। अगर इसमें ज़हर है, तो सब देख लेंगे कि भैरव सिंह अपने मुँह से ज़हर नहीं खिलाता।"
बूढ़े ने लड्डू देखा। फिर भैरव की तरफ़। फिर भीड़ की तरफ़।
"मैं नहीं खाऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर इसमें ज़हर है, तो मैं मर जाऊँगा। और अगर नहीं है, तो भी मैं जानता हूँ — भैरव सिंह की मिठाई खाने के बाद किसी को कुछ अच्छा नहीं होता।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। भैरव के हाथ से लड्डू गिरा और ज़मीन पर लुढ़क गया। उन्होंने उसे देखा, फिर अपने हाथ की तरफ़, जैसे उसी पर शक हो रहा हो।
"तुम सब पागल हो गए हो," उन्होंने कहा। "एक दुकानदार, एक मज़दूर, और एक बूढ़ा — ये तुम्हें भड़का रहे हैं। मैं भैरव सिंह हूँ। बीस साल से इस गाँव का अखाड़ा मेरे हाथ में है। मेरे कारण कितने लड़कों को शहर में नौकरी मिली, कितनों के घर चले। और तुम एक लड्डू के लिए…"
"सर," मैंने कहा, "आपने खुद लड्डू किसी और को दिया। आपने खुद नहीं खाया। क्यों?"
भैरव मेरी तरफ़ मुड़े। उनकी आँखें अब ठंडी नहीं थीं — जल रही थीं। उन्होंने मेरे पास आकर धीरे से कहा, ताकि सिर्फ़ मैं सुनूँ, "तेरे पापा ने भी ऐसा ही किया था। भीड़ जमा की, सवाल पूछे, और फिर…" उन्होंने मुस्कुरा दिया। "और फिर उन्हें मिट्टी में दबा दिया गया।"
मेरी मुट्ठी भिंच गई। पर मैंने खुद को रोका। माँ की बात याद आई — "गुस्सा हाथ की तरह इस्तेमाल कर, दिल की तरह नहीं।"
"सर," मैंने ज़ोर से कहा, ताकि सब सुनें, "ये मिठाई दुकान पर रहेगी। कोई खाएगा नहीं। कल सुबह मैं इसे लेकर पंचायत के सामने जाऊँगा। और वहाँ इस डिब्बी को खोलकर रखूँगा। जो चाहे देखे, जो चाहे सूँघे।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो हँसी लौट आई थी, पर आँखों में नहीं।
"पंचायत," उन्होंने कहा। "ठीक है। कल सुबह पंचायत। और मैं वहाँ होऊँगा — एक चीज़ लेकर जो तेरे पापा के पास भी नहीं थी।" वो पलटे। फिर रुककर बोले, "एक चीज़ जो साबित करेगी कि तू झूठा है।"
वो चले गए। भीड़ धीरे-धीरे छँट गई, पर सब कुछ बोलते हुए, एक-दूसरे से पूछते हुए। टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ काँप रहे थे।
"भाई, उसके पास क्या होगा?"
"पता नहीं।"
"अगर वो कुछ ऐसा लेकर आया जिससे सब उसके साथ हो जाएँ?"
मैंने डिब्बी उठाई। उसे टिंकू के हाथ में दिया।
"इसे अंदर रख। ताला लगा। और अब से तू यहाँ अकेला मत रुकना। मैं जा रहा हूँ मीरा से मिलने। उसके पास एक चीज़ है — लैब रिपोर्ट। वो हमारा सबूत है।"
"और अगर भैरव उस रिपोर्ट को…"
"वो मीरा के पास है," मैंने कहा। "और मीरा अपनी चीज़ें किसी को नहीं देती।"
मैं शाम को नहर के मोड़ पर पहुँचा तो मीरा पहले से वहाँ थी। वो पत्थर पर बैठी थी, कंधे पर बैग, हाथ में एक काग़ज़। वो काग़ज़ देख रही थी, और उसके हाथ काँप रहे थे। या शायद हवा थी। पर हवा इतनी ठंडी नहीं थी।
मैं उसके पास बैठ गया। कुछ देर हम दोनों चुप रहे। नहर का पानी धीरे-धीरे बह रहा था, और उसकी आवाज़ में वो सुकून था जो हमारे बीच नहीं था।
"तुमने मुझे काग़ज़ भेजा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"अंदर क्यों नहीं आई?"
वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो पहले दिन थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था। थकान।
"क्योंकि मैं तुम्हारी माँ से नहीं मिलना चाहती थी," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मैं जानती हूँ कि वो क्या कहेंगी।" मीरा ने अपनी कुर्ती के पल्लू को ठीक किया। "वो कहेंगी — अखाड़े वालों से दूर रहो। वो कहेंगी — मेरे बेटे को मुसीबत में मत डालो। और मैं…" वो रुकी।
"और तुम?"
"और मैं वो सुनना नहीं चाहती थी जो मेरे अपने दिल ने कहा होता।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये देखो।"
मैंने काग़ज़ लिया। वो मैसेज था — छोटी पर्ची पर छपी हुई लाइनें, किसी कंप्यूटर से।
"गिलास वापस रखो। वरना अगला मैसेज तुम्हारे पापा के कमरे से आएगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"ये कब आया?"
"आज सुबह। मेरे कमरे की खिड़की पर रखा था। मेरे पापा के कमरे से मतलब — वो कह रहा है कि उसकी पहुँच मेरे घर तक है।" उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा। "आज रात मैं सो नहीं पाऊँगी।"
"मीरा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "गिलास वापस मत रखो।"
वो चौंकी। "क्या?"
"उसने धमकी दी है। मतलब वो डर रहा है। मतलब वो जानता है कि गिलास में सच है। अगर तुम गिलास वापस रख दोगी, तो उसे लगेगा कि उसकी धमकी काम कर गई। फिर वो और धमकाएगा। फिर वो और माँगेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तो क्या करें?"
"एक और कॉपी बनाओ। एक गिलास तुम रखो। एक मैं रखूँ। एक कालू काका के पास। और जब वो अगली धमकी भेजे, तो उसे जवाब भेजो — 'गिलास तीन जगह है। एक भी मिटाया, तो बाकी दो पंचायत तक पहुँच जाएँगे।'"
मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर वो हँसी — छोटी सी हँसी, जो नाक से निकली।
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