Spirit of a Fighter87 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 87

7 min read November 5, 2026

और तभी, बहुत दूर, अखाड़े की तरफ़ से एक आवाज़ आई। किसी के हँसने की आवाज़। ज़ोर की हँसी, जो रात के सन्नाटे में चीरती हुई आई, और फिर रुक गई।

मैंने डिब्बी कसकर पकड़ी और घर की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में मैंने सोचा — भैरव ने आज मिठाई भेजी है। कल वो क्या भेजेगा?

॥

भैरव ने आज मिठाई भेजी है। कल वो क्या भेजेगा?

यही सवाल मेरे सिर में घूमता रहा, पूरी रात। घर पहुँचा तो आँगन में चूल्हे की आग बुझी पड़ी थी और माँ दरवाज़े के पास बैठी थीं, उनकी आँखें खुली थीं, पर लग रहा था जैसे सपने में हैं।

"माँ, तुम अभी तक सोई नहीं?"

"सोऊँ कैसे?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तू डिब्बी लेकर गया था। मैं सोच रही थी — कहीं तू उसे खोलकर…" वो रुक गईं।

"मैंने नहीं खोली।"

"फेंक दे उसे। किसी कुएँ में। किसी गड्ढे में। जहाँ कोई न देखे।"

"नहीं माँ। ये सबूत है।"

माँ ने अपनी गोद से मेरी तरफ़ देखा। फिर बहुत धीरे से बोलीं, "तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे। सबूत, सबूत। और सबूत किसी काम का नहीं आया। उन्हें कुएँ में डाल दिया गया।"

मैं उनके पास बैठ गया। मेरे हाथ में डिब्बी थी, और उसकी गर्मी अब भी बनी हुई थी, जैसे कोई अंदर से साँस ले रहा हो।

"इस बार सबूत अकेला नहीं रहेगा, माँ," मैंने कहा। "इस बार गवाह भी हैं। कालू काका हैं, टिंकू है, मीरा है।"

माँ ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने उठकर मेरे लिए पानी का लोटा भरा और मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने पिया। पानी में धुएँ की गंध थी, चूल्हे की, और उसके नीचे कहीं वो कड़वाहट भी थी जो अब मेरी नाक पूरे गाँव में पहचानने लगी थी। पर यह पानी अच्छा था। माँ का पानी।

"सुबह तू दुकान पर जाएगा?" उन्होंने पूछा।

"हाँ। टिंकू के साथ।"

"और अगर भैरव के आदमी आए?"

"तो गाँव देखेगा, माँ। बाज़ार देखेगा।" मैंने लोटा रख दिया। "भैरव चाहता है कि सब कुछ अंधेरे में हो। मैं उसकी मिठाई को दिन की रोशनी में रखूँगा।"

माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था, सूखा, चक्की की तरह चिकना।

"तेरे पापा भी यही करते," वो बोलीं। "रात में सोचते, सुबह करते।" फिर वो मुस्कुराईं — एक ऐसी मुस्कान जो बहुत दिनों बाद आई थी। "जा, सो जा। सुबह जल्दी उठना है।"

मैं लेटा, पर नींद नहीं आई। छत की कड़ियाँ गिनता रहा। और तभी खिड़की के बाहर कुछ हिला। मैं उठकर बैठ गया। मेरी नाक ने कुछ पकड़ा — मिट्टी की गंध, पर वो अखाड़े की मिट्टी नहीं थी। यह किसी औरत के हाथों की थी। तुलसी, अदरक, और कहीं दूर से आती काली मिर्च की एक हल्की झोंक।

मीरा।

मैं दरवाज़े तक गया। बाहर अंधेरा था। कोई नहीं दिखा। पर खिड़की की कुंडी पर एक काग़ज़ दबा था। मैंने खोला — मीरा की लिखाई थी, छोटी, तेज़, जैसे बोलती है वैसे ही लिखती भी हो।

"कल शाम नहर के मोड़ पर मिलो। अकेले। बात है। — मीरा"

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। फिर खिड़की से बाहर देखा। गली खाली थी। पर हवा में वो गंध अब भी तैर रही थी, और मुझे लगा कि मीरा यहाँ खड़ी थी, मेरे घर के सामने, और उसने अंदर झाँका भी नहीं।

वो क्यों नहीं आई अंदर? क्या वो माँ से नहीं मिलना चाहती थी? या उसे भी डर था कि कोई देख रहा है?

सुबह मैं सात बजे से पहले दुकान पर पहुँच गया। टिंकू पहले से वहाँ था, शटर आधा खोलकर खड़ा था, हाथ में झाड़ू। उसने मुझे देखकर झाड़ू गिरा दी।

"तू आ गया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सुबह की हवा थी जो रात की डर से बचकर निकली हो।

"डिब्बी कहाँ है?"

"अंदर, ताले के पीछे।"

हमने शटर पूरा खोला। टिंकू ने अंदर से डिब्बी निकाली और उसे काउंटर पर रखा। फिर मैंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — रात को मैंने खुद लिखा था, गुड़िया की कॉपी के पन्ने पर, बड़े-बड़े अक्षरों में, ताकि दूर से पढ़ा जा सके।

"ये मिठाई भैरव सर की तरफ़ से आई है। जो इसे खाना चाहे, खा ले। पर पहले जान ले — इसमें ज़हर है।"

टिंकू ने उसे पढ़ा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

"भाई, ये लगाने के बाद हम दोनों यहीं खड़े रहेंगे।"

"हाँ।"

"और अगर लोग न मानें? अगर कहें कि तू झूठ बोल रहा है, क्योंकि तू उसी अखाड़े से निकाला गया है? अगर कहें कि तू मिठाई वाले की दुकान को बर्बाद करके अपनी दुकान खोलना चाहता है?"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"तो हम उन्हें खाने देंगे," मैंने कहा। "एक चुटकी। और फिर वो खुद बताएँगे कि स्वाद कैसा है।"

टिंकू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"भाई, ये तो…"

"मज़ाक कर रहा हूँ," मैंने कहा। "मैं किसी को ज़हर नहीं खिलाऊँगा। पर सच यही है — सबूत के बिना कोई नहीं मानेगा। और सबूत तुम्हारे हाथ में है।"

हमने काग़ज़ शटर पर चिपकाया, ठीक बीच में, जहाँ से गुज़रने वाला हर आदमी उसे देख सके। और डिब्बी उसके नीचे, फर्श पर, खुली हुई रखी — ढक्कन हटाकर, ताकि सबको मिठाई दिखे। लड्डू, बर्फ़ी, काजू की बर्फ़ी — चमकदार, सुंदर, महकते हुए।

और उस महक के नीचे वो कड़वाहट।

आठ बजे पहला आदमी आया — रामदीन की बीवी, जो अब भी हर पूर्णिमा को मंदिर जाती है और रामदीन के लिए दीया जलाती है। उसने शटर पर काग़ज़ देखा। पढ़ नहीं पाई, क्योंकि उसे पढ़ना नहीं आता। मुझसे पूछा।

मैंने पढ़कर सुनाया।

उसने मिठाई की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर वापस मिठाई की तरफ़।

"ये सच है?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी।

"सच है, ताई।"

"भैरव की?"

"हाँ।"

वो कुछ देर खड़ी रही। फिर उसने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया और बोली, "मेरा रामदीन भी इसी अखाड़े में गया था। वो भी पानी पीता था।" और वो वहीं, दुकान के सामने, बैठकर रोने लगी। टिंकू दौड़कर अंदर गया और उसके लिए पानी लाया। मैंने उसे पीने को दिया, पर उसने मना कर दिया — "पहले बताओ, मेरे रामदीन को किसने मारा?"

"ताई, अभी मैं कुछ नहीं कह सकता। पर जो कहूँगा, सबूत के साथ कहूँगा।"

वो उठी। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ में वो ताकत थी जो सिर्फ़ दुख से आती है।

"बेटा, मैं तेरे साथ हूँ। कुछ कहना हो, तो बता देना।"

वो गई। और फिर एक-एक करके लोग आने लगे। कुछ देखकर चले गए, कुछ रुके, कुछ ने पूछा, कुछ ने ताना मारा। सुक्खी बुआ आईं तो ज़ोर से चिल्लाईं, "अरे मैंने तो सुना है कि भैरव ने खुद ये मिठाई भेजी है!" और फिर उन्होंने काग़ज़ पढ़ा और उनका मुँह खुला का खुला रह गया।

"ये सच है?" उन्होंने पूछा।

"बुआ, तुम्हीं बताओ। तुम पूरे गाँव की ख़बर रखती हो। भैरव ने पिछले महीने क्या-क्या भेजा, किस-किस को?"

सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा चबाया। फिर उन्होंने बहुत धीरे कहा, "उसने मुझे भी एक डिब्बी भेजी थी। पिछले हफ़्ते। मैंने सोचा… मैंने सोचा भैरव सर ने इज़्ज़त दी है।" उनकी आवाज़ काँप गई। "मैंने आधी खा ली थी।"

मेरे पेट में ठंडी सी लहर दौड़ी।

"बुआ, तुम्हें कुछ हुआ?"

"दो दिन पेट में जलन रही। सोचा, गरमी है।" वो मिठाई की तरफ़ देखने लगीं। "ये वही मिठाई है?"

"हाँ।"

उन्होंने अपना पल्ला मुँह पर रख लिया। फिर वो चुपचाप वहाँ से चली गईं, और उनकी चाल में वो चुगलखोर अंदाज़ नहीं था जो हमेशा रहता था। उनकी कमर झुकी हुई थी।

दस बजे तक दुकान के सामने लगभग बीस लोग जमा हो गए थे। कोई कुछ बोलता, कोई चुप खड़ा रहता। और तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई — मीठी, धीमी, पर हर किसी के कान तक पहुँचने वाली।

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