Spirit of a Fighter – Chapter 96
मैं पलटा और तहखाने की तरफ़ भागा। सीढ़ियाँ उतरते वक़्त मेरा पैर फिसला, पर मैंने दीवार को हाथ से पकड़ लिया। नीचे कालू काका अभी भी ज़ंजीरों में बंधे बैठे थे। टिंकू उनके पास घुटनों के बल बैठा था, उसकी टोपी हाथ में थी।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फटी हुई थी। "बाहर एक आदमी था। बोला कि पापा को उनके ही दोस्त ने मारा।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, दाढ़ी में मिट्टी लगी थी। पर उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था, जो आम दिनों में होता था। आज इसमें कुछ और था।
"कैसा दिखता था वो?" उन्होंने पूछा।
"लंगड़ा कर रहा था। एक पैर सूखी मिट्टी पर, दूसरा नरम पर। हाथ में बुझी लालटेन।"
कालू काका ने अपना सिर नीचे कर लिया। ज़ंजीर हिली।
"वो आया था," वो बोले, बहुत धीरे से। "तो अब वो बाहर घूम रहा है।"
"कौन, काका? कौन है वो?"
"वो मेरा भाई है," कालू काका ने कहा।
मैं रुक गया। टिंकू ने भी मेरी तरफ़ देखा।
"तेरा भाई?" टिंकू की आवाज़ में अचरज था।
कालू काका ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने अपनी गर्दन ऊपर की, जैसे बहुत बोझ उठा रहे हों।
"उसका नाम चंदन है। मुझसे चार साल छोटा। बीस साल पहले वो भी इस अखाड़े में मज़दूरी करता था। तेरे पापा के साथ। तेरे पापा उससे बड़े थे, पर उन दोनों में जान थी। एक ही थाली में खाते थे।"
उन्होंने रुककर साँस ली।
"फिर भैरव आया। उसने चंदन को अपना आदमी बना लिया। कुछ पैसे, कुछ वादे। और चंदन ने वो काम किया जो मैं नहीं कर सका।"
"कौन सा काम?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो आम दिनों में होती थी। बस थकान थी, और उससे भी ज़्यादा — शर्म।
"उस रात," वो बोले, "जब तेरे पापा को ज़हर दिया गया। तेरे पापा ने भैरव को पहचान लिया था। वो चिल्लाने लगे थे — 'भैरव, तू मेरे ही हाथ से बना है, तेरा सच मैं जानता हूँ।' भैरव ने उन्हें चुप कराने के लिए चंदन को भेजा। और चंदन ने…"
उनकी आवाज़ रुक गई।
"क्या किया, काका?"
"उसने अपने भाई के हाथ से अपने दोस्त का मुँह दबा दिया।" कालू काका का गला भर आया। "मैं बाहर खड़ा सब सुन रहा था। सुन रहा था और कुछ नहीं कर पा रहा था।"
तहखाने में चुप्पी छा गई। मिट्टी की गंध, जो अब तक गरम थी, अचानक ठंडी लगने लगी।
टिंकू ने धीरे से कहा, "तो वो आदमी… वो चंदन…"
"अब वो भैरव का आदमी नहीं है," कालू काका ने कहा। "अब वो बस एक जला हुआ आदमी है जो बीस साल से अपने भाई से बात नहीं कर सका। उसे लगता है कि मैंने उसे धोखा दिया। पर सच ये है कि उस रात के बाद मैंने उससे एक शब्द नहीं बोला।"
मैंने अपनी जेब से जला हुआ काग़ज़ निकाला। कालू काका की नज़र उस पर पड़ी और उनका चेहरा बदल गया।
"ये तूने कहाँ से लिया?" उन्होंने पूछा, और उनकी आवाज़ में पहली बार डर आया।
"बाहर पड़ा था। पत्थर के नीचे।"
"दे इसे मुझे।"
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया। पर मेरे हाथ ज़ंजीरों तक पहुँच नहीं सके। टिंकू ने बीच में से लिया और उनकी हथेली पर रख दिया।
कालू काका ने काग़ज़ दोनों हाथों में पकड़ा। उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने उसे अपनी छाती से लगाया और आँखें बंद कर लीं।
"ये मैंने बीस साल छुपाया, बेटा," वो बोले, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "ताकि आज तुझे दे सकूँ।"
मेरी साँस रुक गई।
"ये क्या है, काका?"
उन्होंने आँखें खोलीं। उनकी उँगली काग़ज़ के जले किनारे पर फिरी।
"तेरे पापा ने आख़िरी रात में ये लिखा था। जब उन्हें पता चला कि पानी में ज़हर है, तो वो इसी तहखाने में आए। उन्होंने सबसे नीचे की परत से मिट्टी निकाली, उसे सुखाया, और उसका तरीका लिखा — कैसे ज़हर की काट बनती है।"
"तो ये दवा की पर्ची है?"
"हाँ। पर ये आधी है। बाकी आधा हिस्सा चंदन के पास है। उसने उस रात इसे चुराया और फाड़ दिया। एक टुकड़ा अपने पास रखा, एक यहाँ छोड़ गया। उसे लगा कि मैं इसे भैरव तक पहुँचा दूँगा।"
मैंने अपना सिर झुकाया। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी थी, और उसी मिट्टी में मेरे पापा की लिखाई का आख़िरी हिस्सा छिपा था।
"काका," मैंने कहा, "अब बताओ — तहखाने की सबसे नीचे वाली परत क्या है? असली दवा कहाँ है?"
कालू काका ने काग़ज़ को सावधानी से टिंकू को वापस दिया, और फिर अपनी उँगली ज़मीन की तरफ़ की।
"ये जो तूने अभी उठाई — ये ऊपर की परत है। इसमें दम है, पर ज़हर मिला हुआ है। भैरव ने बीस साल में इस अखाड़े की मिट्टी को तीन हिस्सों में बाँट दिया। ऊपर वाली सबसे ज़्यादा ज़हरीली — वही जो पहलवानों के पैरों पर लगती है, वही जो उनकी साँस में जाती है। बीच वाली में थोड़ी दवा बची है, पर कम। और सबसे नीचे…"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"सबसे नीचे वो परत है जिसे किसी ने आठ सौ साल से नहीं छुआ। वहाँ की मिट्टी में ज़हर नहीं है, क्योंकि वहाँ तक भैरव का हाथ नहीं पहुँचा। पर उस तक पहुँचने के लिए तुझे अपने हाथों से खोदना पड़ेगा। खून निकलेगा। और सबसे ज़रूरी बात —"
वो रुके।
"उस परत तक पहुँचने के लिए तुझे अपना दर्द डालना पड़ेगा। तेरे पापा ने अपना डाला था। इसीलिए उनकी दवा काम करती थी।"
मैंने सोचा। फिर मैंने वो सवाल पूछा जो मेरे अंदर धक-धक कर रहा था।
"तो भैरव ने नीचे की परत क्यों नहीं उठाई? वो तो सब कुछ जानता है। उसके पास आदमी हैं, ताकत है।"
कालू काका ने एक लंबी साँस ली। और फिर वो ऐसे हँसे जैसे बहुत सालों से इंतज़ार कर रहे हों कि कोई ये सवाल पूछे।
"क्योंकि उसके लिए पापा का खून और अपना दर्द चाहिए," उन्होंने कहा। "और भैरव के पास दोनों नहीं है। उसके पास सिर्फ़ दूसरों का खून है, और दूसरों का दर्द। अपना कुछ नहीं।"
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
"वो नीचे तक गया," कालू काका बोले, "बीस साल में कितनी बार गया। पर हर बार उसका हाथ रुक गया। क्योंकि उस मिट्टी से ताकत तभी मिलती है जब मन साफ़ हो। बीस साल से वो उस परत को देख रहा है, उसे छू नहीं पा रहा। इसीलिए तो वो पागल हो रहा है। इसीलिए तो वो तेरे पीछे पड़ा है। उसे लगता है कि वो मिट्टी तेरे हाथ से ले लेगा, तो उसकी भी हो जाएगी। पर वो नहीं जानता कि मिट्टी हाथ से नहीं, दिल से मिलती है।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "तो हमें वो मिट्टी निकालनी है। तीन रात में। भैरव के रहते।"
"हाँ," कालू काका ने कहा। "और उससे पहले — कल की पंचायत।"
मेरा पेट कस गया। मैं तो भूल ही गया था।
"काका, भैरव ने माँ को बुलाया है। माँ को। वो उनसे क्या कहेगा?"
कालू काका ने अपना सिर झटका।
"वो पंचायत में सबके सामने कहेगा कि तेरे पापा ने अखाड़े की मिट्टी में ज़हर घोला था। वो कहेगा कि तेरी माँ जानती थी। वो तेरी माँ को बदनाम करेगा, और उसी बहाने तुझे अखाड़े से बाहर कर देगा।"
"पर ये तो झूठ है।"
"हाँ।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "झूठ है। पर उसके पास सबूत होंगे — काग़ज़, गवाह, और सबसे बड़ी बात — डर। वो सबको डराएगा। और जो डरता है, वो सच नहीं देखता।"
तहखाने में फिर चुप्पी छा गई। मैंने ज़मीन की तरफ़ देखा। मेरे पैरों के नीचे वो मिट्टी थी जिसके लिए मेरे पापा ने अपनी जान दी थी। और मेरे हाथ में उनकी लिखाई थी जो आधी जल चुकी थी।
मैंने काग़ज़ लिया और उसे पलटा।
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