Spirit of a Fighter942 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 942

6 min read November 5, 2026

"भैरव बाहर बंधा है," उन्होंने कहा। "और नंदकिशोर?"

"अंदर है," मैंने कहा। "उसके आदमी भी हैं।"

उन्होंने अपने सिपाहियों को इशारा किया और वो अंदर गए।

मैं मंदिर के आँगन में खड़ा रहा, पिता की हड्डियाँ अपनी छाती से लगाए। सूरज पूरा ऊपर आ चुका था और उसकी किरणें टूटी दीवारों से छनकर मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं।

रघुवीर मेरे पास आया और उसने कलश की तरफ़ देखा।

"उन्हें अब आराम मिलेगा," उसने कहा। "अब उन्हें मिट्टी में सुला दें।"

मैंने सिर हिलाया।

तभी टिंकू ने कहा, "भाई, वो देख।"

उसने मंदिर की दीवार की तरफ़ इशारा किया। वहाँ एक पुरानी तस्वीर टँगी थी — धूल से ढकी हुई। मैंने उसे साफ़ किया।

तस्वीर में तीन आदमी थे। एक भवानी सिंह — मेरे पापा, जवान, मुस्कुराते हुए। दूसरा रणवीर सिंह — उनसे भी जवान, और वो भी मुस्कुरा रहे थे। और तीसरा — तीसरा आदमी मैंने पहले कभी नहीं देखा था। चौड़ा शरीर, बड़ी मूँछें, और उसकी गर्दन में एक पीली शीशी लटकी हुई थी।

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

"ये तीसरा कौन है?" मैंने पूछा।

रघुवीर ने तस्वीर देखी। और उसका चेहरा फिर बदल गया।

"ये…" उसकी आवाज़ रुक गई। "ये मैं हूँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका जला चेहरा, उसकी टाँग, उसकी लाठी।

"ये तो पहले की तस्वीर है," मैंने कहा। "तुम जले नहीं थे।"

"नहीं," रघुवीर ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "ये वो तस्वीर है जो तेरे पापा ने खींची थी। उस दिन, जब हम तीनों ने शपथ ली थी — हम रामपुर की मिट्टी को कभी नहीं बेचेंगे।"

उसने तस्वीर को छुआ।

"और फिर…" उसने कहा, "मैंने ही सबसे पहले अपनी शपथ तोड़ी।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।

"क्या मतलब?" मैंने कहा।

रघुवीर ने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला — पुराना, पीला, मुड़ा हुआ। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये वो शपथ है," उसने कहा। "और इसके पीछे, तेरे पापा ने अपने हाथ से लिखा है — 'अगर मैं मरूँ, तो मेरे बेटे को बता देना कि रघुवीर ने मुझे धोखा दिया।'

मैंने वो काग़ज़ पढ़ा। पापा की लिखाई थी — मैं उसे पहचानता था। रसीदों पर, दुकान के बही-खाते पर वही अक्षर चलते थे, थोड़े तिरछे, जल्दी में लिखे हुए।

"तुमने क्यों तोड़ी शपथ?" मेरी आवाज़ फट गई।

रघुवीर ने लाठी पर अपना पूरा भार डाला। उसके घुटने काँप रहे थे।

"भैरव ने मेरे बेटे को उठा लिया था," उसने कहा। "चार साल का था। मैंने मंदिर में आकर उसके पैर पकड़े। उसने कहा — ज़मीन के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर कर दे, और हरी शीशी का पानी बनाना सिखा दे, तो बच्चा ज़िंदा मिलेगा।"

उसकी आवाज़ रुकी।

"मैंने सोचा, काग़ज़ तो है, ज़मीन तो रहेगी। पर बच्चा नहीं रहेगा। मैंने… मैंने सब कुछ दे दिया। काग़ज़ भी, शीशी का भेद भी।"

"तो पापा ने तुम्हें मारा क्यों?" मैंने पूछा। "अगर तुमने धोखा दिया, तो उन्होंने तुम्हें जलाया क्यों?"

रघुवीर ने अपना जला चेहरा उठाया। उसकी बिना पलकों वाली आँखों में पानी चमका।

"उन्होंने मुझे जलाया नहीं था। उस रात भैरव का आदमी मेरे घर आया था — मुझे ख़त्म करने। तेरे पापा पहले पहुँच गए थे। जब मैं जल रहा था, तेरे पापा मुझे खींचकर बाहर लाए, अपनी चादर में लपेटा।"

वो मेरे पैरों पर गिर पड़ा। उसके हाथों ने मेरे घुटने पकड़ लिए। उसकी गर्दन का जला हिस्सा चमड़ी की तरह सिकुड़ा हुआ था।

"तेरे पापा ने मुझे मारा नहीं था," वो रोया। "उसने मुझे बचाया था। पर मैं उन्हें नहीं बचा पाया। भैरव ने उसी रात उनकी हड्डियाँ निकलवा दीं। मैं उस वक़्त जल रहा था, अस्पताल की चारपाई पर पड़ा था। सालों तक मैंने ख़ुद से यही बोला कि वो मेरी वजह से मरे — मैंने उन्हें नहीं बचाया।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए। माँ का चेहरा आँखों के सामने आया — पिछले बीस साल से वो हर दिन पापा की फोटो पर फूल रखती थी, और हर दिन एक रोटी ज़्यादा बनाती थी, जैसे पता न हो कि पापा नहीं हैं।

मीरा ने रघुवीर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखें भरी हुई थीं।

"क्या ये सच्ची बात कर रहे हैं?" उसने धीरे से कहा।

"सच्ची है," टिंकू बोला। उसकी आवाज़ भारी थी। "बूढ़े काका ने मुझे बताया था कि रघुवीर दादा को रातों में बुख़ार आता था, और वो भवानी सिंह का नाम लेकर चीखते थे। उन्हें माफ़ी नहीं मिली थी।"

मैंने रघुवीर को उठाया। उसका शरीर भूसे जैसा हल्का था, जैसे अंदर से खोखला हो चुका हो।

"तो अब बचा," मैंने कहा। "मेरी माँ और बहन को ले चल। तालाब किनारे वाली झोपड़ी से। और वो काग़ज़ भी दे जिस पर भैरव के सब जुर्म लिखे हैं।"

रघुवीर मुस्कुराया। पहली बार उसके जले चेहरे पर कुछ और नज़र आया — कुछ बचा हुआ, कुछ ज़िंदा।

"काग़ज़ नहीं, वीर," उसने कहा। "मेरे पास भैरव की अपनी आवाज़ में कबूलनामा है। उस रात, जब वो नशे में था, उसके अपने आदमी ने टेप चलाया था और मुझे दे दिया। वो टेप उसी तालाब किनारे झोपड़ी के नीचे, उसी जगह गड़ा है जहाँ तुम्हारी माँ बंधी है। भैरव उस टेप को जलाने आ रहा है। और वो आधा घंटे में यहाँ होगा।"

मेरे हाथ में कलश था, और मेरी छाती में आग।

॥

मेरे हाथ में कलश था, और मेरी छाती में आग। पर उस आग को जलने का वक़्त नहीं था।

रघुवीर की बात सुनकर मेरे पैर खुद-ब-खुद पीछे हट गए। टेप। झोपड़ी के नीचे गड़ा टेप। और भैरव आधा घंटे में वहाँ पहुँचने वाला था।

"कितनी दूर है वो झोपड़ी?" मैंने पूछा।

"तालाब के उस किनारे, पुराने पीपल के नीचे," रघुवीर ने कहा। "पर वीर, सुन —"

मैंने उसे सुनने से पहले ही कलश टिंकू के हाथ में पकड़ा दिया।

"इसे लेकर पीछे रहना। कोई इसे छुए नहीं।"

"भाई, ये तो…" टिंकू ने कलश को दोनों हाथों में पकड़ा, जैसे कोई छोटा बच्चा हो। "ये तो बहुत भारी है।"

"भारी है," मैंने कहा। "इसीलिए तुझे दिया।"

मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"अकेले मत जा।"

"तू साथ चल," मैंने कहा। "और रघुवीर भी। बाकी यहीं रुकें — कोई भैरव का आदमी आए तो पकड़ लेना।"

कालू काका ने लाठी उठाई। उनके हाथ में ज़ोर नहीं था, पर आँखों में वो बात थी जो बीस साल से दबी थी।

"मैं रास्ता जानता हूँ," वो बोले। "और मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। भैरव हो या उसका बाप, आज मैं इस डर से नहीं मरूँगा।"

हम चले। रास्ता पत्थरों वाला था, और हर पत्थर पर पैर फिसलता था। आधी रात का अंधेरा, ऊपर आसमान में बादल, एक भी तारा नहीं। रघुवीर आगे-आगे लाठी टेकता चल रहा था, और उसकी साँस की आवाज़ मुझे रास्ते से ज़्यादा सुनाई दे रही थी।

मीरा मेरे बगल में थी। उसने धीरे से कहा, "वो टेप अगर सच में है, तो कल पंचायत में सब ख़त्म हो जाएगा।"

"अगर सच में है," मैंने दोहराया। "यही तो देखना है।"

"तुम्हें उस बूढ़े पर भरोसा नहीं?"

"मुझे किसी पर भरोसा नहीं," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ अपनी नाक पर भरोसा करता हूँ।"

मीरा कुछ नहीं बोली। पर उसका हाथ मेरी बाँह पर और कस गया।

पीपल का पेड़ दूर से ही दिख गया — काला, घना, और उसके नीचे झोपड़ी। झोपड़ी की छत बैठी हुई थी, दीवारें मिट्टी की, और दरवाज़े की जगह सिर्फ़ एक टाट लटक रहा था।

पर मैंने पहले गंध पकड़ी। ताज़ी मिट्टी की गंध। अभी-अभी खोदी गई मिट्टी।

मैं रुक गया।

"रुको।"

"क्या हुआ?" मीरा ने फुसफुसाया।

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