Spirit of a Fighter – Chapter 941
"उन्हें ज़हर नहीं दिया गया," उसने कहा। "उन्हें जलाया गया। उस रात, जब नंदकिशोर ने तहखाने में आग लगाई, तो भवानी उसमें घुसे — मुझे बचाने के लिए। और वो अंदर ही रह गए।"
मैंने रघुवीर की तरफ़ देखा। मेरे हाथ काँप रहे थे और मेरी आँखें जल रही थीं।
"तो मेरे पापा की मौत का ज़िम्मेदार कौन है?" मैंने पूछा। "भैरव? नंदकिशोर? या तू?"
रघुवीर ने मेरी आँखों में देखा। और उसकी आवाज़ बहुत धीमी हो गई।
"सब," उसने कहा। "भैरव ने शीशी बनाई। नंदकिशोर ने आग लगाई। और मैंने उन्हें रोका नहीं। मैं उस रात कुएँ में गिरा था, और जब होश आया, तब तक सब खत्म हो चुका था। पर मैं उस रात से पहले भी भाग सकता था। मैं पंचायत जा सकता था। मैंने नहीं किया।"
उसने अपना सिर झुका लिया।
"इसलिए मैं तेरे पिता का कर्ज़ नहीं चुका पाया। मैं सिर्फ़ इतना कर सका — मैंने ये काग़ज़ जमा किए, और मैं इंतज़ार करता रहा कि कोई आए जो इन्हें पढ़ सके।"
मैंने काग़ज़ों का बंडल अपनी छाती से लगा लिया। मैं रोना चाहता था, पर आँसू नहीं आए। सिर्फ़ एक ठंडक थी — मेरी छाती में, मेरे हाथों में, मेरे गले में।
तभी मीरा ने कहा, "वीर, ये देख।"
वो एक काग़ज़ उठाए हुए थी, जो बाक़ी सबसे अलग था। उस पर लिखाई नहीं थी — बस एक नक्शा था।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
रघुवीर ने देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"ये वो जगह है," उसने कहा। "जहाँ तेरे पिता की हड्डियाँ हैं।"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
"माँ ने कहा था कि नंदकिशोर ने हड्डियाँ कहीं भेज दी हैं," मैंने कहा। "कहाँ?"
रघुवीर ने नक्शे पर उँगली रखी। एक जगह थी — गाँव के बाहर, पुराने कुएँ से आगे, झाड़ियों के पीछे।
"वहाँ एक पुराना शिव मंदिर है," उसने कहा। "बीस साल से बंद है। नंदकिशोर ने उसे अपना गोदाम बना लिया है। तेरे पिता की हड्डियाँ वहीं हैं — मूर्ति के नीचे।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"अभी?" उसने पूछा।
"अभी," मैंने कहा। "पर पहले माँ को घर भेजना है।"
हम वापस गाँव की तरफ़ चले। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। भैरव बंधा हुआ चल रहा था, और रघुवीर उसके पीछे लाठी टेकता हुआ आ रहा था।
जब हम गाँव पहुँचे, तो सुबह की पहली किरण नीम के पेड़ों पर पड़ रही थी। सुक्खी बुआ चबूतरे पर बैठी थीं, और उन्होंने हमें देखकर ऐसी चीख मारी कि आधा गाँव जाग गया।
"अरे! अरे! वीर आ गया! माँ आ गई! और वो देखो — भैरव बंधा हुआ है!"
लोग दौड़कर आए। कुछ औरतें माँ को देखकर रोने लगीं। एक बूढ़ी माँ ने मेरा माथा चूमा।
मैंने माँ को घर के अंदर लिटाया। गुड़िया उनके पास बैठ गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
सरस्वती ने आँखें खोलीं। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"वीर," उन्होंने कहा। "तू आ गया।"
"हाँ, माँ," मैंने कहा। "और अब तुझे कोई नहीं ले जाएगा।"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"तेरे पापा," उन्होंने कहा। "उनकी हड्डियाँ… वो मंदिर में हैं। नंदकिशोर ने…"
"मुझे पता है, माँ," मैंने कहा। "मैं ले आऊँगा।"
उनकी आँखों में पानी आ गया। "तू अकेला मत जा।"
"मैं अकेला नहीं जा रहा," मैंने कहा और मीरा की तरफ़ देखा।
मीरा ने सिर हिलाया।
हम तैयार होने लगे। टिंकू ने अपनी दुकान से दो लड्डू लाए और मेरी जेब में डाल दिए। "रास्ते के लिए," उसने कहा।
कालू काका ने अपनी लाठी उठाई और कहा, "मैं भी चलूँगा।"
रघुवीर दरवाज़े पर खड़ा था। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू चलेगा?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला।
"मैं बीस साल से इस रास्ते से डरता रहा," उसने कहा। "अब नहीं डरूँगा।"
हम निकल पड़े। भैरव को कालू काका की निगरानी में पीछे छोड़ दिया गया, और दो पहलवानों ने उसे पकड़ रखा था। मैं, मीरा, टिंकू और रघुवीर आगे चल रहे थे।
रास्ते में रघुवीर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"वीर सिंह," उसने कहा, "मंदिर में एक और चीज़ है। नंदकिशोर ने वहाँ भी शीशियाँ रखी हैं। सैकड़ों। और वो उन्हें जलाने वाला है।"
मैं रुक गया।
"कब?"
"आज सुबह। सूरज निकलने के बाद।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। सूरज क्षितिज पर था, आधा ऊपर।
"तो हमें दौड़ना होगा," मैंने कहा।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और हम भागे।
पुराने कुएँ से आगे झाड़ियाँ शुरू हुईं। और उनके पीछे, एक टूटी दीवार वाला मंदिर। उसका दरवाज़ा खुला था और अंदर से धुआँ उठ रहा था — पतला, पीला, और उसमें वो गंध थी जो मैं अब भूल नहीं सकता था।
मंदिर के आँगन में, एक जली हुई लकड़ी के ढेर के पास, नंदकिशोर खड़ा था। उसके हाथ में मशाल थी और उसके पीछे दो आदमी थे।
"देर कर दी, वीर सिंह," उसने कहा। "अब ये सब राख हो जाएगा। और तेरे पापा की हड्डियाँ भी।"
उसने मशाल नीचे की।
और फिर मैंने वो किया जो मैंने कभी नहीं किया था — मैंने अपनी आँखें बंद कीं, और मैंने सूँघा।
धुएँ के बीच, जलती लकड़ी के बीच, मुझे वो गंध मिली — गीली मिट्टी, हल्दी, और माँ के हाथों की।
मैंने आँखें खोलीं और मीरा की तरफ़ देखा।
"वो हड्डियाँ जला नहीं रहा," मैंने कहा। "वो हमें रोक रहा है। हड्डियाँ कहीं और हैं।"
नंदकिशोर का हाथ रुक गया। उसका चेहरा बदला।
"तू झूठ बोल रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा, और मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। "मैं सूँघ सकता हूँ। और मैं तुझे बता सकता हूँ कि तेरे पीछे खड़े तेरे दोनों आदमियों ने आज सुबह क्या खाया — प्याज़ पराठा और गुड़। और उनमें से एक ने तेरी शीशी भी पी रखी है। उसकी गंध बदल गई है।"
नंदकिशोर पलटा। उसके पीछे खड़े एक आदमी का चेहरा पीला पड़ गया था और उसके हाथ काँप रहे थे।
"तूने पी?" नंदकिशोर ने कहा।
"सर, मैंने नहीं…"
"उसकी आँखें देख," मैंने कहा। "पीली हो रही हैं।"
आदमी काँपने लगा।
और उसी पल, मीरा ने अपनी शीशी निकाली और उसे आदमी के चेहरे पर फेंक दिया। हरी शीशी का पानी उसकी आँखों में गया। वो चीखा और अपने घुटनों पर गिर गया।
मैंने मौक़ा देखकर मशाल नंदकिशोर के हाथ से छीन ली और ज़मीन पर पटक दी। टिंकू दौड़कर आया और उसने दूसरे आदमी के हाथ पकड़ लिए।
नंदकिशोर भागने लगा, पर रघुवीर ने अपनी लाठी उसके पैरों के बीच फेंक दी। वो गिरा। उसका सिर पत्थर से टकराया और उसके माथे से खून बहने लगा।
मैं उसके पास गया और उसके कॉलर से पकड़कर उठाया।
"कहाँ हैं मेरे पापा की हड्डियाँ?" मैंने कहा।
वो हाँफ रहा था। उसके मुँह से खून की गंध आ रही थी।
"मूर्ति के नीचे," उसने कहा। "पत्थर के नीचे। कुंड है।"
मैंने उसे छोड़ दिया और मंदिर के अंदर भागा। मूर्ति के नीचे पत्थर की सीढ़ियाँ थीं। मीरा और टिंकू ने पत्थर उठाने में मदद की। और उसके नीचे, एक छोटे कुंड में, एक पीतल का कलश था।
मैंने उसे खोला। उसके अंदर हड्डियाँ थीं — सफ़ेद, टूटी, और एक चाँदी की अंगूठी जो उनमें उलझी हुई थी।
मैंने उसे अपनी छाती से लगाया। और इस बार आँसू आए। वो गरम थे और उनमें मिट्टी की गंध थी।
मीरा मेरे पास बैठ गई और उसने मेरी पीठ पर हाथ रखा। कुछ नहीं बोली।
टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और रघुवीर दरवाज़े पर खड़ा रहा, अपना जला चेहरा ऊपर उठाए।
तभी बाहर से आवाज़ आई — घोड़ों की टापें। और फिर इंस्पेक्टर शर्मा की आवाज़।
"वीर सिंह! अंदर हो?"
मैंने कलश को अपनी बाँहों में लिया और बाहर आया। इंस्पेक्टर शर्मा ने मुझे देखा, और फिर मेरे हाथों में कलश देखा। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस सिर हिलाया।
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