Spirit of a Fighter – Chapter 940
"उसका भाई," मैंने कहा।
रघुवीर कुछ कहने जा रहा था, पर उसने होंठ बंद कर लिए। फिर वो बोला, "अच्छा। जल्दी चल।"
हम तालाब के किनारे की तरफ़ बढ़े। रघुवीर आगे लाठी टेकता हुआ चल रहा था, पर उसकी चाल तेज़ थी — जल्दी, बिना रुके। मैं माँ को गोद में लिए पीछे था। मीरा गुड़िया का हाथ पकड़े मेरे बगल में चल रही थी, और टिंकू भैरव को धकेलते हुए सबसे पीछे था।
रास्ते में रघुवीर ने बिना मुड़े कहा, "तेरे पिता ने मुझे एक बात कही थी, वीर सिंह। उस रात, जब वो मुझे कुएँ से खींच रहे थे। उन्होंने कहा — रघुवीर, अगर मैं न बचूँ, तो मेरे बेटे को बता देना कि मैंने कभी किसी को ज़हर नहीं दिया। मैंने सिर्फ़ उन लोगों से लड़ा जो मेरी मिट्टी में ज़हर घोलते थे।"
मेरे पैर रुक गए। मीरा ने मेरी कमर पर हाथ रखकर मुझे सँभाला।
"तुमने मुझे ये बात अब तक क्यों नहीं बताई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि अब तक मैं तुझसे मिला ही नहीं था," रघुवीर ने कहा। "और जब मिला, तब भैरव तेरे पीछे था।"
झोपड़ी सामने आई। छोटी सी, घास-फूस की छत, और दरवाज़े पर टाँका लगा हुआ। रघुवीर ने लाठी से दरवाज़ा खटखटाया, और अंदर से एक आवाज़ आई — दुबली, काँपती, पर औरत की।
"कौन है?"
"मैं," रघुवीर ने कहा। "रघुवीर। दरवाज़ा खोलो।"
दरवाज़ा खुला। अंदर एक बूढ़ी औरत थी — साठ के ऊपर, सफ़ेद बाल, हाथ में लोहे का दंडा। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे वो रो रही हो।
"ये कौन हैं?" उसने मेरी तरफ़ दंडा उठाया।
"ये वीर सिंह है," रघुवीर ने कहा। "भवानी का बेटा।"
बूढ़ी औरत का दंडा नीचे गिर गया। वो मेरी तरफ़ देखने लगी और उसका मुँह खुला रह गया।
"माँ कहाँ हैं?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ में सब्र नहीं बचा था।
"अंदर," उसने कहा और हट गई। "बेहोश है। मैंने उसके मुँह में घी डाला है। बच्ची पास बैठी है।"
मैं झोपड़ी में घुसा। अंधेरा था, बस एक लालटेन जल रही थी। फ़र्श पर पुआल बिछी थी और उस पर माँ लेटी थीं। उनका माथा ठंडा था, होंठ सूखे, और गुड़िया उनकी छाती पर सिर रखे बैठी थी।
गुड़िया ने मुझे देखा और वो उठकर मेरी तरफ़ दौड़ी। मैंने माँ को मीरा की गोद में दिया और गुड़िया को उठा लिया। वो मेरे गले में लिपट गई और उसका शरीर काँप रहा था।
"भैया," वो रोई, "माँ ने मुझे कहा था कि तू आएगा। और मैंने कहा — मुझे पता है।"
मैंने उसका सिर सहलाया। उसके बालों में धूल थी और उसके हाथों में रस्सी के निशान।
मीरा ने माँ की नाड़ी पकड़ी और रघुवीर की तरफ़ देखा।
"उन्होंने कुछ और दिया है?"
रघुवीर ने अपनी कमर से एक पीली शीशी निकाली। छोटी, धुँधली, और उसके मुँह पर मोम की सील।
"ये मैंने उनके होंठों पर लगाया था," उसने कहा। "सिर्फ़ बूँद भर। नहीं तो वो इस वक़्त तक मर चुकी होती।"
मीरा ने शीशी खोलकर सूँघा और उसका चेहरा बदल गया।
"इसमें अफीम है। और कुछ जो मैं नहीं पहचानती।"
"काली मिर्च का तेल," रघुवीर ने कहा। "और सूखी नागफनी। ये उनके दर्द को रोकता है, पर शरीर को ठंडा करता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे डराती थी — हिसाब।
"इसे बंद करो," उसने कहा। "इसका असर उतर जाएगा। उन्हें सिर्फ़ आराम चाहिए।"
मैंने गुड़िया को नीचे उतारा और माँ के पास बैठ गया। उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ पतली थीं, नाखूनों के नीचे मिट्टी भरी थी।
तभी बाहर से आवाज़ आई — किसी के भागने की। और टिंकू ने चिल्लाकर कहा, "रुक! रुक!"
मैं बाहर भागा। भैरव भाग रहा था — हाथ बंधे हुए, फिर भी दौड़ रहा था, तालाब के किनारे की तरफ़। टिंकू उसके पीछे दौड़ रहा था।
मैंने अपनी पूरी ताकत से दौड़ लगाई। पैर मिट्टी में धँसते और मैं खींचता हुआ आगे बढ़ता गया। भैरव तालाब के किनारे पहुँचा और वो रुक गया।
पानी सामने था। वो पलटा। उसका चेहरा पसीने से भीगा था और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा।
"तू मुझे मारेगा?" उसने कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मार दे। मार दे, वीर सिंह। पर मुझे पुलिस के हवाले मत कर। मैं जेल में नहीं रह सकता।"
"क्यों?" मैंने कहा। "जेल में तेरे जैसे बहुत हैं। तेरे पापा की परछाई वहाँ नहीं होगी।"
उसका चेहरा बिगड़ा। वो मेरी तरफ़ बढ़ा, पर उसके हाथ बंधे थे और उसके पैर तालाब की कीचड़ में फिसले। वो घुटनों के बल गिर गया।
"भैरव," मैंने कहा और उसके सामने झुका। "मैं तुझे नहीं मारूँगा। मैं तुझे वहीं भेजूंगा जहाँ तेरे जैसे लोगों की जगह है। और वहाँ तू बोलेगा। अपनी मर्ज़ी से नहीं — सच बोलेगा। क्योंकि वहाँ तेरे पापा की परछाई नहीं होगी, और तेरी मिट्टी भी नहीं।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। उसका मुँह खुला रह गया। कुछ देर के लिए लगा कि वो कुछ कहेगा, पर उसने कुछ नहीं कहा।
टिंकू पीछे आ पहुँचा। उसने भैरव की बाँह पकड़ी और खींचकर उठाया।
"चल," टिंकू ने कहा। "और अब भागने की कोशिश की, तो मैं तुझे तालाब में गिरा दूँगा।"
हम झोपड़ी की तरफ़ लौटे। रघुवीर दरवाज़े पर खड़ा हमारा इंतज़ार कर रहा था। जब वो भैरव को देखकर उसके सामने आया, तो भैरव ने नज़र नीची कर ली।
"बेटा," रघुवीर ने कहा — और वो शब्द उसके मुँह से ऐसे निकले जैसे कोई ज़हर उगल रहा हो। "तूने मेरा काम किया। अच्छा किया। पर तूने मुझे धोखा भी दिया। तूने मेरी शीशी का ज़हर बेचा — उन लोगों को जिन्हें मैंने कभी नहीं चुना था।"
भैरव ने कुछ नहीं कहा।
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर सिंह, अब मैं तुझे वो देना चाहता हूँ जो मेरे पास बीस साल से है।"
वो झोपड़ी के अंदर गया और एक टीन का बक्सा खींचकर बाहर लाया। बक्से पर जंग लगी थी। उसने उसे खोला — अंदर काग़ज़ों के बंडल थे, और एक लोहे का छोटा डिब्बा।
"ये सब काग़ज़ नहीं हैं," रघुवीर ने कहा। "ये भैरव की आवाज़ है।"
मैंने काग़ज़ उठाया। ऊपर वाले पन्ने पर भैरव की लिखाई थी — मैं उसकी लिखाई पहचानता था, वो मोटी स्याही जो अखाड़े के रजिस्टर में थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मैंने बीस साल तक भैरव से हर हफ़्ते एक काग़ज़ पर लिखवाया," रघुवीर ने कहा। "हर मौत का हिसाब। हर शीशी का हिसाब। हर पैसे का हिसाब। और उसके नीचे उसका अँगूठा। मैंने उसे कहा था — अगर तू मेरी बात मानेगा, तो तेरी माँ की इज़्ज़त बची रहेगी। और वो मानता रहा। बीस साल।"
मैंने काग़ज़ पलटे। दस, बीस, पचास पन्ने। हर पन्ने पर एक नाम, एक तारीख़, और एक लाइन — "मरने से पहले तीन शीशी पी।" या "दो महीने में हड्डियाँ सूख गईं।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मेरे सामने वो लोग थे जो मेरे गाँव के थे। जो मेरे साथ अखाड़े में उतरे थे। जिनके चेहरे मैंने देखे थे।
मीरा मेरे पास आई और उसने एक काग़ज़ उठाया।
"इसमें तारीख़ें हैं," उसने कहा। "और यहाँ — ये क्या है? ये किसका नाम है?"
वो उँगली रखकर एक लाइन पर रुकी। मैंने देखा।
"भवानी सिंह — पहली शीशी, छोटी खुराक।"
मेरी साँस रुक गई।
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा को भी दी गई थी," उसने कहा। "पर उन्होंने पी नहीं। उन्होंने शीशी उलट दी और भैरव से कहा — मैं अपनी मिट्टी से लड़ूँगा, तेरे ज़हर से नहीं।"
"तो वो कैसे मरे?" मेरी आवाज़ फट गई।
रघुवीर ने अपना जला हुआ चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखों में वो दर्द था जो सिर्फ़ उस आदमी में होता है जिसने अपने सामने किसी को मरते देखा हो।
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