Spirit of a Fighter – Chapter 939
वो मिट्टी पर गिरा। मैं उसके ऊपर चढ़ गया।
"वीर!" टिंकू चिल्लाया। उसने मेरी तरफ़ एक रस्सी फेंकी — पुरानी, मोटी, जो कमरे के कोने में पड़ी थी।
मैंने भैरव के हाथ पकड़े और रस्सी से बाँध दिए। वो छटपटाया, पर मैंने अपना घुटना उसकी छाती पर रख दिया।
"बीस साल," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी हुई थी। "बीस साल तूने इस मिट्टी में ज़हर घोला। मेरे पापा की हड्डियाँ मिटाईं। मेरी माँ को ज़िंदा जलाया। मेरी बहन को उठाया।"
मैंने उसकी तरफ़ झुककर देखा। उसके चेहरे पर वो मिठास नहीं थी। अब वहाँ सिर्फ़ थकान थी — पुरानी, गहरी।
"अब बोल," मैंने कहा। "क्यों?"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले।
"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "मैं तेरे पापा की परछाई में जीना नहीं चाहता था।"
वो हँसा। हँसी सूखी थी, जैसे पुरानी लकड़ी चटके।
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ। न गुस्सा, न दया। बस थकान।
"उठा इसे," मैंने टिंकू से कहा। "और ऊपर ले चल।"
टिंकू और कालू काका ने भैरव को उठाया। रघुवीर वहीं बैठा रहा, अपनी टूटी शीशी की तरफ़ देखता हुआ।
मैं माँ के पास गया। उनके माथे पर हाथ रखा। ठंडा था।
"मीरा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ टूट गई।
मीरा दौड़कर आई। उसने अपनी शीशी निकाली — अदरक और तुलसी वाली। उसने माँ के होंठ खोले और एक-दो बूँद उनके मुँह में डालीं।
फिर उसने माँ की कलाई पकड़ी और उँगली से नाड़ी टटोली।
"साँस चल रही है," उसने कहा। "धीमी है, पर चल रही है।"
मैंने गुड़िया को अपनी गोद में उठाया। वो मेरे गले से चिपक गई। उसकी साँसें मेरी गर्दन पर गरम थीं।
"भैया," उसने फुसफुसाया, "माँ ने बहुत रोका। उन्होंने कहा — मत जाओ, वो तुम्हें मार डालेगा। पर मैंने कहा — मेरा भैया आएगा।"
उसकी आवाज़ रुक गई। मेरी आँखें भर आईं।
"तू आ गया," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "मैं आ गया।"
कालू काका ने लालटेन उठाई और रास्ता दिखाया। हम सुरंग से बाहर निकले — टिंकू आगे, भैरव बीच में, मैं माँ को गोद में लिए, और मीरा मेरे पीछे, गुड़िया का हाथ पकड़े।
बाहर आते ही हवा ने मुझे थप्पड़ मारा। ठंडी हवा, ताज़ी। मैंने आँखें बंद कर लीं।
तभी टिंकू ने कहा, "भाई, वो देख।"
मैंने आँखें खोलीं। तालाब के किनारे, जहाँ से हम आए थे, वहाँ कुछ खड़ा था।
एक बूढ़ा आदमी। उसने सफ़ेद धोती पहनी थी और उसके हाथ में लाठी थी। वो हमारी तरफ़ देख रहा था, और उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
"कौन है?" मीरा ने कहा।
मैंने उसकी गंध पकड़नी चाही। हवा मेरी तरफ़ थी।
नहीं। हवा उसकी तरफ़ थी।
मुझे सिर्फ़ मिट्टी की गंध आई — सूखी, बासी, बहुत पुरानी। और उस मिट्टी में कुछ और था। कुछ जो मैंने पहले कभी नहीं सूँघा था।
काग़ज़। जला हुआ काग़ज़।
वो बूढ़ा आदमी मुस्कुराया। और उसकी मुस्कान में वो सब था जो भैरव की मुस्कान में नहीं था।
"वो कौन है?" टिंकू ने फिर पूछा।
मैंने अपनी माँ को कसकर पकड़ा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर वो यहीं इंतज़ार कर रहा है।"
फिर वो बूढ़ा आदमी बोला, और उसकी आवाज़ दूर से आई — बैलगाड़ी के पहिये की तरह धीमी, और उसमें वो नाम था जिसे सुनकर मेरी रगों में खून जम गया।
"वीर सिंह," उसने कहा, "तेरे पिता ने तुझे बचाया था। अब तू उनकी मिट्टी को बचा।"
और मैं चलता रहा, उसकी तरफ़, मेरी माँ की गरम साँसें मेरी छाती पर, मेरी बहन का हाथ मेरी बाँह पर, और मेरे सामने वो सच जो अभी खुलने बाक़ी था।
॥
वो बूढ़ा आदमी मेरी तरफ़ बढ़ा, और हवा ने उसकी गंध मेरी नाक से टकरा दी।
सूखी मिट्टी। जला हुआ काग़ज़। और उसके पीछे कुछ जो मैं पकड़ नहीं पा रहा था — कोई तेल, कोई फूल, कुछ ऐसा जो पहले कभी मेरी नाक में नहीं गया।
उसने लाठी ज़मीन पर टेक दी और सिर के पास रखा हुआ पीला कपड़ा धीरे से उलझा गया।
आधा चेहरा जला हुआ था। मांस सिकुड़ा हुआ, चमड़ी खिंची हुई, और पलकें जहाँ थीं वहाँ सिर्फ़ सफ़ेद निशान रह गए थे। पर आँखें — आँखें दोनों ज़िंदा थीं, चमकदार, और उनमें कुछ भी ऐसा नहीं था जो मुझसे कहता कि ये आदमी टूटा हुआ है।
कालू काका पीछे हट गए। उनका पैर सुरंग के मुँह पर लुढ़का, और वो मेरी बाँह पकड़कर रुके।
"ये वही है," उन्होंने फुसफुसाया। उनकी आवाज़ में वो काँप था जो मैंने आज तक उनमें नहीं सुना था। "शीशी वाला। बीस साल पहले… ये वही था जो तहखाने में खड़ा था।"
बूढ़े ने कालू काका की तरफ़ देखा और हँसा।
"कालू," उसने कहा। "तू बूढ़ा हो गया। पर डर वही है। अच्छा है — डर वाला आदमी झूठ नहीं बोलता।"
"मैंने तुझे मरा हुआ देखा था," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ रुक रुक कर आ रही थी। "आग में। तेरे कपड़े जल रहे थे। तू चिल्ला रहा था।"
"मैं चिल्ला रहा था," बूढ़े ने कहा। वो रुका। "क्योंकि जलना दर्द देता है, कालू। मरने से भी ज़्यादा।"
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
"मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था, वीर सिंह। बहुत दिनों से। जब से ये खबर आई कि भवानी का बेटा अखाड़े में उतरा है, मैं सो नहीं पाया।"
मैंने माँ को अपनी बाँहों में कस लिया। उनकी साँसें अब भी वैसी ही धीमी थीं, पर मेरी छाती पर गरम थीं।
"तेरे पिता ने मुझे बीस साल पहले जलाया था," बूढ़े ने कहा। "पर मैं मरा नहीं। मैंने अपने ही हाथों से अपनी शीशी का साँचा तोड़ा, और उसी साँचे का ज़हर भैरव को दे दिया।"
मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से देखा। उसका हाथ धीरे से मेरी कमर पर आ गया।
"तू कौन है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे दूर से आती सुनाई दी।
बूढ़े ने अपनी लाठी पकड़कर थोड़ा सीधा खड़ा होने की कोशिश की। उसकी एक टाँग का घुटना सूजा हुआ था।
"रघुवीर," उसने कहा। और फिर वो मेरे सामने झुका।
नहीं — वो झुका नहीं। वो मेरे पैरों में गिरा। उसका घुटना मिट्टी में धँसा और उसका सिर झुक गया।
"तेरे पिता ने मुझे मारा नहीं था," उसने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "उन्होंने मुझे बचाया था। जब नंदकिशोर ने तहखाने में आग लगाई, तो भवानी ने मेरी जली हुई देह को उठाया और कुएँ तक खींचकर लाए। उन्होंने अपने कपड़े मेरे शरीर पर लपेटे। कहा — तू ज़िंदा रह, रघुवीर। तू गवाह है।"
उसने अपना बचा हुआ हाथ ज़मीन पर रखा।
"पर मैं उन्हें नहीं बचा पाया। मैं उस रात कुएँ में गिरा और बेहोश हो गया। जब होश आया, तब तक भवानी की लाश जल चुकी थी। मैंने सिर्फ़ इतना किया — मैं भाग गया। डर के मारे।"
मैंने उसे उठाया। उसका शरीर हड्डियों का था, बस खाल ओढ़े हुए।
"अब बचा," मैंने कहा। "मेरी माँ और बहन कहाँ हैं?"
उसने मेरी आँखों में देखा। और उसकी आँखों में वो पानी आया जो जले हुए चेहरे पर और भी डरावना लगता है।
"तालाब के किनारे झोपड़ी है। लालटेन वाली। वहाँ बंधी हैं। पर भैरव उनके पास नहीं है।"
"कहाँ है भैरव?"
"भाग गया।" रघुवीर ने अपनी आस्तीन से मुँह पोंछा। "जब मैंने उससे कहा कि अब वो मेरा काम नहीं करेगा, तो वो पागलों की तरह भागा। उसने मुझसे कहा — तू मेरी जान के पीछे है, रघुवीर। और मैंने कहा — नहीं, भैरव। तेरी जान के पीछे वो है जिसका तू बीस साल से खून पी रहा है।"
टिंकू ने मेरी दूसरी बाँह पकड़ी। उसका हाथ काँप रहा था, पर उसकी आवाज़ साफ़ थी।
"भाई," उसने कहा, "माँ और गुड़िया पहले। बातें बाद में।"
रघुवीर ने टिंकू की तरफ़ देखा और उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"तू कौन है?"
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