Spirit of a Fighter – Chapter 938
"बीस साल पहले भी वो बूढ़ा था," कालू काका ने कहा। "और आज भी उतना ही है। मैंने सोचा था मर गया। भैरव ने कहा था मर गया। पर वो…"
तभी उस बूढ़े आदमी ने गाना बंद कर दिया। उसने अपना सिर उठाया और सीधे हमारी तरफ़ देखा — जैसे वो घंटों से जानता हो कि हम यहाँ छुपे हैं।
"अंदर आ जाओ," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, कोई जल्दी नहीं थी। "बाहर खड़े रहने से मिट्टी सूख जाती है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। मैंने अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ाया, और सुरंग से बाहर कदम रखा।
"वीर," मीरा ने कहा, पर मैं रुका नहीं।
मेरी माँ वहाँ लेटी थी। मेरी बहन वहाँ रो रही थी। मैं बाहर नहीं रुक सकता था।
मैं कमरे में घुसा। मेरे पैरों के नीचे मिट्टी थी — वही लाल मिट्टी, जो एक बार मुझे ताकत देती थी, और आज मुझे ज़मीन से बाँध रही थी।
गुड़िया ने मेरी आवाज़ सुनी। उसने सिर उठाया। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, गालों पर मिट्टी और आँसुओं से लीक बने थे।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी, "तू आ गया। मैंने कहा था न मत आना।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। बूढ़े आदमी ने शीशी उठाई और उसे हवा में हिलाया। शीशी में पीला पानी था, और उस पानी में कुछ तैर रहा था — छोटे, काले, चमकते दाने।
"एक कदम और," उसने कहा, "और ये तेरी बहन के मुँह में चला जाएगा।"
मैं रुक गया।
"तू कौन है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़ी थी, पर मेरे हाथ काँप रहे थे।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे तेरे पापा ने बीस साल पहले मारा था। पर मैं मरा नहीं। मैं सिर्फ़ मिट्टी में बैठ गया, और मिट्टी ने मुझे ज़िंदा रखा।"
उसने अपनी आस्तीन ऊपर की। उसकी बाँह पर जले हुए निशान थे — पुराने, गहरे, जैसे किसी ने आग से छुआ हो। और उन निशानों के बीच एक टैटू था, जो अब भी साफ़ था — एक शीशी का निशान।
"मेरा नाम रघुवीर था," उसने कहा। "पर उस नाम को मिट्टी ने खा लिया। अब लोग मुझे उस्ताद कहते हैं।"
कालू काका पीछे खड़े थे। उनकी साँस फूल रही थी।
"तू…" उन्होंने कहा, "तूने मेरे बेटे को…"
"मैंने तेरे बेटे को नहीं जलाया," रघुवीर ने कहा। उसकी आवाज़ में कोई भाव नहीं था, जैसे वो पुरानी किताब पढ़ रहा हो। "नंदकिशोर ने जलाया। मैंने बस पानी दिया।"
"कौन सा पानी?" मीरा ने कहा। वो मेरे पीछे आ गई थी। उसकी आवाज़ में वो ठंडक लौट आई थी।
रघुवीर ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में दाँत कम थे और मसूड़े ज़्यादा।
"तू रणवीर की बेटी है," उसने कहा। "तेरी आँखें वैसी ही हैं — जो सबूत के बिना कुछ नहीं मानतीं।"
"तू जवाब दे," मीरा ने कहा।
"वो पानी," रघुवीर ने कहा, और उसने शीशी को अपनी आँखों के सामने उठाया, "जो ताकत देता है, पर उम्र खा जाता है। मैंने इसे बनाया था। पर मैंने इसे पीया नहीं। जो पीते हैं, वो मर जाते हैं। जो नहीं पीते, वो इसे बेचते हैं। मैं बेचता था।"
"तूने मेरे पापा को मारा," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "तेरे पापा ने खुद को मारा। उसने मेरा पानी पीना बंद कर दिया था, और फिर उसने मुझे मारने की कोशिश की। उसने सोचा कि मैं आसान शिकार हूँ। पर मिट्टी मेरे साथ थी।"
मेरे हाथ में माँ का कंगन था। मैंने उसे जेब में महसूस किया। और गुड़िया की चप्पल भी।
"तो तूने माँ को क्यों उठाया?" मैंने कहा।
"क्योंकि तेरी माँ," रघुवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ बदला — जैसे पुरानी चोट हिली हो, "वो आख़िरी औरत है जिसने मेरा पानी पीया और मरी नहीं। उसने इसे पीया और फिर भी ज़िंदा रही। मुझे जानना है कैसे।"
उसने शीशी को मेरी माँ की तरफ़ झुकाया।
"एक घूँट," उसने कहा, "और वो जाग जाएगी। पर फिर वो वैसी नहीं रहेगी। और अगर तू आगे आया, तो ये बच्ची के मुँह में चला जाएगा।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर डर नहीं था।
"भैया," उसने कहा, "मत आ। मैं डर नहीं रही।"
मेरा दिल फट गया।
तभी मीरा ने अपना बैग खोला। उसने वो छोटी हरी शीशी निकाली — अदरक और तुलसी वाली। और फिर उसने कुछ ऐसा किया जो मैंने नहीं सोचा था।
उसने शीशी खोली और उसका ढक्कन ज़मीन पर गिरा दिया। तेज़ गंध फैल गई — तीखी, ताज़ी, अदरक की।
रघुवीर ने एक पल के लिए अपना सिर उसकी तरफ़ घुमाया।
बस एक पल।
मैंने उस पल का इस्तेमाल किया।
मैं दौड़ा — दो कदम, तीन कदम — और गुड़िया के सामने गिरकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। मैंने अपना हाथ उसके सिर पर रखा। वो मेरी गोद में आ गई, छोटी, काँपती हुई।
और तभी मैंने एक और आवाज़ सुनी।
मशालों के पीछे, अंधेरे से, एक आवाज़ आई — मीठी, जैसे गुड़।
"अच्छा खेल, वीर सिंह।"
भैरव बाहर आया।
उसने अपनी लाल धोती पहनी थी, और उसके गले में वो सोने की चेन थी जो अब भी चमक रही थी। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था। पर उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो कुएँ के पानी में होती है।
"तूने सोचा," उसने कहा, "कि मैं भाग गया। नहीं। मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।"
मैंने गुड़िया को अपने पीछे किया और खड़ा हो गया।
"तो अब इंतज़ार ख़त्म," मैंने कहा।
"हाँ," भैरव ने कहा। उसने रघुवीर की तरफ़ देखा। "उस्ताद, शीशी दो।"
रघुवीर ने शीशी उसकी तरफ़ बढ़ाई, और भैरव ने उसे अपने हाथ में ले लिया। फिर भैरव ने उसे कमरे के बीचोंबीच फ़र्श पर पटक दिया।
शीशी टूटी। पीला पानी फैल गया। काले दाने फ़र्श पर बिखर गए, और उनमें से धुआँ उठा — पतला, पीला, और उसमें वो गंध थी जो मैं जानता था।
"अब कोई ज़हर नहीं," भैरव ने कहा। "बस मैं और तू।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे पीछे मेरी बहन थी। मेरे बगल में मेरी माँ लेटी थी। और मेरे सामने वो आदमी था जिसने मेरे पापा की हड्डियाँ मिट्टी में मिला दी थीं।
"चल," मैंने कहा।
भैरव आगे बढ़ा।
तभी, अंधेरे से, एक और आवाज़ आई — इस बार मीरा की।
"भैरव," उसने कहा, "तेरी धोती पर आज लाल मिट्टी नहीं है। सफ़ेद है। चूने की। तू ऊपर से आया है। तू बाहर से आया है।"
भैरव रुका।
"मतलब," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो कोर्ट में सवाल पूछते वक़्त आती है, "तू यहाँ नहीं रह रहा था। तू बाहर कहीं छुपा था। और अभी-अभी आया है। क्यों?"
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "मैं तुम्हें यहाँ नहीं, ऊपर इंतज़ार कर रहा था। पर तुम यहाँ आ गए। इसलिए…"
उसने अपनी जेब से कुछ निकाला। एक छोटी सी थैली। उसने उसे खोला और फ़र्श पर फेंका।
थैली से पीले रंग का पाउडर निकला और हवा में फैल गया।
"भागो!" मीरा चिल्लाई।
पाउडर मेरी आँखों में गया। जलन हुई, पानी बहा। मैंने अपनी आस्तीन से आँखें पोंछीं, पर जलन बढ़ती गई।
और उसी पल, भैरव मेरी तरफ़ बढ़ा।
मैंने उसकी आवाज़ सुनी — पैरों की, मिट्टी पर। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और उसकी गंध पकड़ी — पसीना, इत्र, और धोती पर लगा हुआ चूना।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया। मेरी उँगलियाँ उसके गले पर लगीं। मैंने पकड़ा।
उसने मेरा हाथ खींचा। मैं लड़खड़ाया, पर नहीं छोड़ा। मेरी आँखों में पानी भर रहा था, पर मैंने अपना दूसरा हाथ बढ़ाकर उसकी धोती पकड़ी और उसे खींचा।
भैरव गिरा। उसका घुटना मेरे पेट पर लगा। मेरी साँस रुक गई।
तभी मीरा ने अपना पैर आगे बढ़ाया और भैरव की कलाई पर मारा। उसकी पकड़ ढीली हुई। मैंने मौक़ा देखकर उसे उलट दिया।
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