Spirit of a Fighter – Chapter 937
"तूने माँ के लिए सोचा," मैंने कहा। "ये पहले से तैयार था।"
उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ ऐसा कह दिया हो जो उसे सुनने की आदत नहीं थी। फिर उसने नज़र हटा ली और शीशी बैग में वापस रख दी।
"मैं डॉक्टर बनने की पढ़ाई कर रही हूँ," उसने कहा। "अगर मैं अपने लोगों के लिए भी कुछ नहीं कर सकती, तो पढ़ाई का क्या फ़ायदा?"
टिंकू ने कुछ देर चुप रहकर फिर पूछा, उसकी आवाज़ बैलगाड़ी के पहिये से भी धीमी थी, "क्या… क्या वहाँ भैरव भी होगा?"
कालू काका ने आगे देखा। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"हो तो अच्छा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़ी थी और वो कड़ी आवाज़ मुझे अच्छी लगी। "आज सब हिसाब चुकता होगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो तब आता है जब कोई अपने दोस्त को बदला हुआ देखे। डर और उम्मीद एक साथ।
"भाई," उसने कहा, "तू बदल गया है।"
"नहीं बदला," मैंने कहा। "बस अब जाग गया हूँ।"
रास्ता छोटा होता जा रहा था, पर मेरे अंदर का डर बड़ा होता जा रहा था। नहर के किनारे-किनारे पगडंडी सूखी थी, पर दूर जहाँ तालाब था, वहाँ की ज़मीन काली पड़ रही थी। मिट्टी में वो गंध आ रही थी जो जली हुई चीज़ों से आती है — तेल, कपूर, और कुछ और… कुछ जो सड़ रहा था।
बैलगाड़ी एक टीले पर रुकी। कालू काका ने लगाम खींची।
"आगे गाड़ी नहीं जाएगी," उन्होंने कहा। "पैदल चलना होगा।"
हम उतरे। मेरे पैर टीले की मिट्टी में धँसे। कालू काका आगे बढ़े, और हम उनके पीछे। टिंकू मेरे बगल में था, उसकी साँस फूल रही थी।
तभी टिंकू ठोकर खाकर गिरा। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और ज़मीन पर कुछ पड़ा देखा।
"ये क्या है?" उसने कहा।
मैंने झुककर देखा। घास में एक चप्पल पड़ी थी — छोटी, टूटी, और उस पर सूखी मिट्टी की तह जमी थी। चप्पल के किनारे पर गुलाबी धागे का एक फूल बना हुआ था। टूटा हुआ, पर पहचाना हुआ।
ये गुड़िया की चप्पल थी।
मेरे हाथ काँपे। मैंने चप्पल उठाई। मिट्टी उस पर जमी थी, सूखी और बारीक। मैंने उसे अपनी जेब में रखा — उसी जेब में जहाँ माँ का कंगन था, जहाँ काग़ज़ थे। मेरी जेब भारी हो रही थी, पर मेरा दिल ज़्यादा भारी था।
"वो यहाँ से गुज़री है," मीरा ने धीरे से कहा। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भरी हुई थीं।
मैंने कुछ नहीं कहा। अगर मैं बोलता, तो आवाज़ टूट जाती।
तभी मुझे एक हाथ ने पकड़ा। मीरा का हाथ। उसने मेरी उँगलियाँ कसकर पकड़ीं, इतनी कसकर कि मेरी हथेली पर उसके नाखून चुभे। उसने कुछ नहीं कहा। बस पकड़ा रही।
और मैं चलता रहा। उसकी उँगलियों की गरमी मेरे हाथ से ऊपर, कलाई से होती हुई, मेरे सीने तक पहुँच रही थी।
टीले के उस पार तालाब शुरू होता था। पानी काला था, स्थिर, और उस पर हरी काई की परत जमी थी। तालाब के किनारे ईंटों का एक ढेर था, और उसके पीछे — ज़मीन में एक गड्ढा।
कालू काका ने वहीं रुककर अपना हाथ उठाया।
"वो," उन्होंने कहा।
गड्ढा बड़ा था, कम से कम दस हाथ गहरा और चौड़ा। उसके चारों तरफ़ जली हुई मिट्टी थी — लाल, काली, फटी हुई। गड्ढे के अंदर एक तरफ़ ईंटों का बना हुआ मुँह था, जो आगे अंधेरे में जाता था। और उस अंधेरे से एक हल्की गरम हवा आ रही थी, जिसमें वो गंध थी — जली मिट्टी, बादाम का तेल, और कपूर।
"ये सुरंग सीधे तहखाने की पीठ पर जाकर खुलती है," कालू काका ने कहा। "बीस साल पहले भैरव ने इसे बनवाया था। उसने कहा था कि अखाड़े की मिट्टी को सुखाने के लिए हवा का रास्ता चाहिए। पर ये हवा का रास्ता नहीं था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "ये भागने का रास्ता था, बेटा। जब नीचे कुछ गलत होता, तो भैरव यहीं से निकल जाता।"
मैंने गड्ढे में झाँका। अंधेरा था, पर हवा चल रही थी — गरम, भारी। और उस हवा में एक और गंध घुली थी। पसीना। इंसानी पसीना। बहुत सारा।
"माँ यहाँ है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।
मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा।
"वीर," उसने कहा, "मैं तेरे साथ हूँ। पर एक बात याद रख — अंदर अंधेरा है, और भैरव को अंधेरे में लड़ने की आदत है। हमें रोशनी चाहिए।"
कालू काका ने अपने कंधे से एक लालटेन उतारी। उसमें तेल भरा था। उन्होंने माचिस निकाली, और लौ जलाई।
लालटेन की पीली रोशनी गड्ढे में पड़ी, और सुरंग का मुँह दिखा — ईंटों का, पुराना, और अंदर की तरफ़ जाता हुआ।
"मैं आगे चलूँगा," मैंने कहा।
"नहीं," कालू काका ने कहा। "मैं जानता हूँ ये रास्ता। मैं आगे चलूँगा।" उन्होंने लालटेन मेरी तरफ़ बढ़ाई। "तू पीछे चल, और मेरी आवाज़ सुनता रह।"
मैं मान गया। कालू काका उतरे — धीरे-धीरे, कुबड़ी पीठ के साथ, एक हाथ से दीवार पकड़ते हुए। फिर टिंकू उतरा, फिर मीरा, और फिर मैं।
सुरंग संकरी थी। दो आदमी बराबर नहीं चल सकते थे। मेरा कंधा दीवार से रगड़ता रहा। दीवारें गरम थीं। ईंटों पर काई जमी थी, और उस काई में पानी की बूँदें चमक रही थीं।
दस कदम चले होंगे कि मुझे एक आवाज़ सुनाई दी। दूर से, बहुत दूर से, पर साफ़।
गुड़िया रो रही थी।
मैं रुक गया। मेरा दिल धड़कने लगा — तेज़, बेकाबू।
"सुनाई दिया?" मीरा ने मेरे कान के पास फुसफुसाया।
"हाँ," मैंने कहा।
"रोना अच्छी बात है," कालू काका ने आगे से कहा, बिना पलटे। "जो रोता है, वो ज़िंदा है।"
हम चलते रहे। सुरंग थोड़ी ढलान पर थी, नीचे की तरफ़। हवा गरम होती जा रही थी। और फिर, अचानक, सुरंग ने एक मोड़ लिया और मुझे रोशनी दिखी।
पीली रोशनी। मशाल की।
कालू काका रुके। उन्होंने लालटेन नीचे रखी और इशारा किया — चुप रहो।
हम दीवार के साथ चिपक गए। सुरंग का मुँह एक बड़े कमरे में खुलता था। मैंने झाँका।
कमरा वही था — तहखाना। वही जगह जहाँ मैंने पापा की हड्डियाँ ढूँढी थीं। वही जगह जहाँ मिट्टी में माथा टेककर मैंने वादा किया था। फ़र्क़ इतना था कि आज यहाँ मशालें जल रही थीं।
और मशालों के बीच, ज़मीन पर बिछी एक चटाई पर, मेरी माँ लेटी थीं।
वो बेहोश थीं। उनका मुँह खुला था, साँस धीमी चल रही थी। उनके बाल बिखरे थे और उनके माथे पर हल्दी का टीका सूखकर पपड़ी बन गया था।
और उनके पास, ज़मीन पर बैठी, अपने घुटनों को छाती से लगाए, मेरी गुड़िया थी।
वो रो रही थी। धीरे-धीरे, जैसे रोते-रोते भी किसी की नींद न टूटे।
मेरी छाती में कुछ टूटा। मैं आगे बढ़ने लगा, पर मीरा ने मेरी बाँह पकड़ ली।
"रुक," उसने फुसफुसाया। "पहले देख, वहाँ और कौन है।"
मैंने आँखें सिकोड़कर देखा। मशालों की रोशनी में कमरे के दूसरी तरफ़ एक साया हिल रहा था।
एक बूढ़ा आदमी, मिट्टी में बैठा, हाथ में पीली शीशी लिए, धीरे-धीरे गा रहा था।
मैंने उसकी गंध पकड़नी चाही। हवा सीधे मेरी तरफ़ आ रही थी — और उस गंध में वो सब था जो मैंने तीसरी शीशी के पेंदे से सूँघा था। बादाम का तेल। कपूर। और कुछ और — धुएँ जैसी, जली हुई, बहुत पुरानी गंध।
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन काँपी। मैंने दीवार को हाथ से पकड़ा।
"काका," मैंने फुसफुसाया, "वो कौन है?"
कालू काका ने आगे झाँका। उनकी आँखें फैल गईं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे पीछे खींचा।
"वो…" उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "वो वही है जो शीशियों में पानी भरता था। वो बाहरी आदमी।"
मैं जम गया।
"पर उसकी उम्र…" मीरा ने धीरे से कहा।
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