Spirit of a Fighter930 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 930

7 min read November 5, 2026

मैंने झुककर ज़मीन देखी। पुल की मिट्टी पर पहियों के निशान थे। और उन निशानों के बीच, मिट्टी पर गिरी हुई, एक छोटी-सी पीली पंखुड़ी थी। मैंने उसे उठाया। वो सूखी थी, पर उससे अभी भी वही गंध आ रही थी। मैंने उसे अपनी जेब में रखा।

"वो इसी रास्ते से गए हैं," मैंने कहा। "और वो जल्दी में थे। उन्होंने पंखुड़ी गिरा दी।"

टिंकू ने कहा, "कौन पंखुड़ी? कहाँ से?"

मैंने सिर हिलाया। "पता नहीं। पर ये किसी डिब्बे से गिरी है। कोई बहुत पुराना डिब्बा।"

मीरा मेरे पास आई और उसने पंखुड़ी देखी। "ये… ये कनेर की पंखुड़ी है," उसने कहा। "पीली कनेर। ये शहर में नहीं उगती। ये बाहर, पहाड़ों की तरफ़ उगती है।" वो रुकी। "मेरे पापा के कमरे में एक किताब है — आयुर्वेद की पुरानी किताब। उसमें लिखा है कि पीली कनेर का बीज ज़हर में मिलाया जाता है।"

मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी रीढ़ की हड्डी पर किसी ने बर्फ़ रख दी हो।

"तो ये पंखुड़ी…" मैंने कहा।

"हो सकता है वो इसी से शीशियाँ बनाता है," मीरा ने कहा। "और अगर वो कनेर का इस्तेमाल करता है, तो उसके पास एक बाग़ है। कहीं। जहाँ वो ये उगाता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "शहर के बाहर एक बाग़।"

"हाँ।"

"और अगर वो बाग़ उस घर के पीछे है," मैंने कहा, "तो हमें घर के अंदर जाने से पहले उस बाग़ को देखना होगा।"

मैंने बैलगाड़ी की तरफ़ देखा। टिंकू बैठा था, उसका चेहरा फीका था। "भाई," उसने कहा, "मुझे लगता है हमें रास्ते में एक और आदमी की ज़रूरत है।"

"कौन?"

"जग्गा।" टिंकू ने कहा। "वो उस घर के आस-पास का है। वो जानता है वहाँ क्या-क्या है। और… और वो हमारा गवाह है। अगर वो हमारे साथ है, तो कम-से-कम एक आदमी तो ऐसा है जो उस रघुवीर की शक्ल पहचानता है।"

मैंने सोचा। टिंकू की बात सही थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "जग्गा को रास्ते से उठा लेंगे।"

हम फिर चले। अंधेरा गहरा हो रहा था और हवा में बारिश की गंध आने लगी थी। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और मैंने कालू काका का काग़ज़ छुआ। और फिर मैंने वो पंखुड़ी छुई।

और मैंने सोचा — वो आदमी बीस साल से ज़िंदा है। बीस साल से वो शीशियाँ बना रहा है। बीस साल से वो अपनी गंध बदल रहा है। और बीस साल से मेरे गाँव के नौजवान मर रहे हैं, और उनकी मौत को "कुदरत का सितम" कहा जा रहा है।

मेरी मुट्ठी कस गई।

"वीर," मीरा ने कहा, "एक बात कहूँ?"

"कहो।"

"जब हम उस घर में जाएँ," उसने कहा, "तो तुम्हें अपनी नाक पर भरोसा करना है, पर हमें तुम्हारी नाक पर भरोसा करना है। अगर तुम्हें कुछ अजीब लगे — कुछ भी — तुम हमें बताओ। छुपाओ मत।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं।

"मैं वादा करता हूँ," मैंने कहा।

उसने मेरा हाथ दबाया।

बैलगाड़ी शहर के बाहर की तरफ़ मुड़ी और फिर हम पुराने कुएँ वाली गली में पहुँचे। वही गली। वही ईंटों की दीवार। और वही पीली दीवार वाला घर।

पर इस बार घर अलग लग रहा था।

इस बार घर की खिड़कियों से रोशनी आ रही थी। हल्की, पीली रोशनी। और घर के दरवाज़े पर एक लालटेन लटकी हुई थी जो हवा में धीरे-धीरे हिल रही थी।

मैं गाड़ी से उतरा। मेरे पैर ज़मीन पर पड़े और मैंने एक लंबी साँस ली। हवा में वो पीली कनेर की गंध थी — अब और तेज़। और उसके नीचे एक और गंध थी। धुएँ की। चूल्हे के धुएँ की।

किसी के यहाँ खाना बन रहा था।

"टिंकू," मैंने फुसफुसाकर कहा, "तुम यहीं रुको। इंस्पेक्टर सर के साथ। मीरा, कालू काका, तुम भी।"

"तुम अकेले क्यों?" मीरा ने कहा।

"मैं अकेला नहीं जा रहा," मैंने कहा। "मैं पहले सूंघने जा रहा हूँ। अंदर कितने लोग हैं, कहाँ हैं — ये मुझे पता चलेगा। अगर मैं ठीक से लौटा, तो हम सब साथ जाएँगे।"

वो कुछ कहने वाली थी, फिर रुक गई। उसने सिर हिलाया।

मैं दीवार के सहारे आगे बढ़ा। मैंने दरवाज़े को छुआ — लकड़ी का पुराना दरवाज़ा था, जिस पर लोहे की कीलें जड़ी थीं। मैंने अपनी आँख दरवाज़े की दरार पर रखी।

अंदर एक कमरा था जिसमें एक लालटेन जल रही थी। और एक बूढ़ा आदमी बैठा था — सफ़ेद टोपी में, पीठ मुड़ी हुई। उसके सामने एक मेज़ थी जिस पर कई पीली शीशियाँ रखी थीं। और वो अपने हाथों से कुछ मिला रहा था।

और उसके पीछे, अंधेरे कोने में, एक चारपाई थी। उस पर एक औरत लेटी थी। और उसके पास एक छोटी लड़की बैठी थी, जिसकी दो चोटियाँ थीं।

मेरी साँस रुक गई।

माँ। गुड़िया।

मैंने अपने आप को सँभाला। मैंने पलटकर इशारा किया — इंस्पेक्टर शर्मा की तरफ़। उन्होंने अपने आदमियों को इशारा किया और सब आगे बढ़े।

और तभी अंदर से आवाज़ आई।

"आ जा, वीर सिंह। दरवाज़े पर खड़ा क्यों है? अंदर आ। तेरी माँ तुझसे मिलना चाहती है।"

वो आवाज़ मीठी थी। बहुत मीठी। मिश्री जैसी। पर उसमें कुछ ऐसा था जो मेरी रीढ़ को ठंडा कर गया।

मैंने दरवाज़ा धकेला। वो खुल गया।

मैं अंदर गया।

और मैंने देखा — बूढ़ा आदमी उठा। सफ़ेद टोपी, सफ़ेद दाढ़ी, ऊँचा कद। उसकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो चमक थी जो किसी चीज़ को जलाती है। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मुस्कुराया।

"तू तो बिल्कुल भवानी जैसा है," उसने कहा। "बिल्कुल। वही कद, वही आँखें। पर तेरी नाक…" उसने मेरी तरफ़ देखा, "तेरी नाक तेरी माँ की है।"

मेरे हाथ कस गए।

"तूने मेरी माँ को क्यों उठाया?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ सपाट थी।

"मैंने नहीं उठाया," उसने कहा।

"मैंने नहीं उठाया," उसने दोहराया, और अपनी उँगली मेरी माँ की तरफ़ उठाई। "उसने खुद कहा था कि मुझे तेरे पास ले चलो। पर रास्ते में उसकी साँस फूल गई। सो मैं उसे यहाँ ले आया। तेरी बहन रो रही थी, तो वो भी साथ आ गई।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखें बंद थीं, पर उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई दुआ पढ़ रही हों।

"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट गई।

उन्होंने आँखें खोलीं। और मुझे देखकर उनके चेहरे पर वो डर आया जो मैंने कभी नहीं देखा था। "वीर, भाग जा," उन्होंने फुसफुसाया। "ये आदमी…"

"चुप कर, बहू," बूढ़े ने कहा। गुस्से से नहीं, लगभग प्यार से। "मैं तेरा कुछ नहीं बिगाड़ूँगा। मुझे तो बस इसका इंतज़ार था।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बीस साल। बीस साल मैंने सोचा कि भवानी का कोई बेटा होगा या नहीं। और आज वो खुद मेरे दरवाज़े पर आया।"

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। "भैया," वो फुसफुसाई, "ये डरावना है।"

"कुछ नहीं होगा," मैंने कहा। "मैं यहाँ हूँ।"

बाहर से आवाज़ आई — इंस्पेक्टर शर्मा की। "वीर! सब ठीक है?"

बूढ़े ने सिर हिलाया। "अपने दोस्तों को बुला ले। सबको। मुझे छुपाना नहीं है।"

मैंने दरवाज़ा खोला और सब अंदर आए। इंस्पेक्टर ने अपनी बंदूक तान दी।

"ये हथियार रख दीजिए, इंस्पेक्टर साहब," बूढ़े ने कहा, और मुस्कुराया। "मैं बूढ़ा हूँ। मेरे पास डंडा भी नहीं है। मैं तो बस शीशियाँ बनाता हूँ।"

कालू काका पीछे खड़े थे। और जैसे ही उन्होंने बूढ़े की आवाज़ सुनी, उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उनके हाथ काँपने लगे और उन्होंने दीवार का सहारा लिया।

"कालू?" बूढ़े ने कहा। "कालू कुम्हार? तू ज़िंदा है?"

कालू काका की आँखों से आँसू बह निकले। "गुरुजी," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ टूट गई। "मैंने सोचा था आप बीस साल पहले जलकर मर गए। मैंने आपकी लाश की गवाही दी थी। मैंने आपका चेहरा देखा था — जला हुआ।"

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