Spirit of a Fighter – Chapter 931
"वो लाश मेरी नहीं थी," बूढ़े ने धीरे से कहा। "वो एक पहलवान की थी। भैरव की शीशी पीने वाले पहले पहलवान की। और मैंने उसे तेरे हाथों से उतारा था, कालू। तुझे याद है? उसके हाथ पकड़कर तूने रोया था।"
कालू काका अपने घुटनों के बल गिर पड़े। "माफ़ कर दीजिए, गुरुजी। मुझे पता नहीं था। मैंने सोचा…"
"मैं जानता हूँ तूने क्या सोचा," बूढ़े ने कहा। "भैरव ने तुझे धमकाया था। बोला था कि अगर तू कुछ बोलेगा तो तेरे बच्चे का वही हाल होगा।"
कालू काका ने सिर हिलाया। और फिर वो बिलखकर रोने लगे — बूढ़े आदमी की तरह नहीं, बच्चे की तरह। मीरा ने उनका कंधा पकड़ा।
"अब रो मत," बूढ़े ने कहा। और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आई। "मैं तुझे माफ़ करता हूँ। पर अब मुझे तेरी ज़रूरत है। भैरव उसी रास्ते से जा रहा है जिससे मैं गया था। और अगर वो पहुँच गया, तो ये गाँव नहीं बचेगा।"
मैंने अपनी जेब से चिट्ठी निकाली। मैंने उसे बूढ़े की तरफ़ बढ़ाया। "ये आपकी है?"
उसने देखा और उसकी आँखें मुस्कुराईं। "मेरी चिट्ठी। मैंने इसे भैरव के लिए छोड़ा था। पर वो भाग गया। कायर।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू उससे डरता नहीं?"
"डरता हूँ," मैंने कहा। "पर मेरी माँ यहाँ है।"
बूढ़े ने देर तक मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने धीरे से कहा, "तेरे बाप भी ऐसे ही बोलते थे।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "आप मेरे बाप को जानते थे?"
"मैंने उसे बनाया था," उसने कहा। "और मैंने ही उसे खोया था।"
बाहर से चिल्लाने की आवाज़ आई। सब चौंक गए। मैं भागकर बाहर गया। अखाड़े की दीवार पर टिंकू का दोस्त बैठा था जो हमेशा छतों पर मिलता था। उसकी साँस फूल रही थी।
"भैया! भैया!" वो चिल्लाया। "तुम्हारी माँ और बहन को कोई उठाकर ले गया — मैंने बैलगाड़ी देखी!"
मैं पलटा। कमरे में माँ की चारपाई खाली थी। गुड़िया नहीं थी। और बूढ़ा आदमी भी नहीं था।
केवल एक पीली शीशी मेज़ पर रखी थी, जिसमें से धुआँ उठ रहा था।
॥
धुआँ उठ रहा था — पतला, पीला, और उसमें वो गंध थी जो मैं अब भूल नहीं सकता था। कपूर, जली मिट्टी, और कुछ कड़वा जो गले में अटक जाए।
मैंने शीशी उठाई। पेंदे में कुछ खड़खड़ाया।
"मत छू," कालू काका ने कहा, पर मैंने नहीं सुना। मैंने शीशी उलटी की। तीन काले दाने मेरी हथेली पर गिरे। वही दाने। वही ज़हर।
इंस्पेक्टर शर्मा ने मेरी कलाई पकड़ी। "वीर, ये सबूत है। इसे थैली में डाल। हाथ से मत छू।"
"माँ कहाँ है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "मैं सबूत नहीं छान रहा। मैं पूछ रहा हूँ — मेरी माँ कहाँ है?"
कमरे में सन्नाटा था। चारपाई खाली पड़ी थी। उसकी चादर अब भी मुड़ी हुई थी, जैसे कोई झटके से उठा हो। तकिये पर माँ के बालों की दो काली लटें चिपकी थीं। और चारपाई के पाये के पास हल्दी का एक टीका ज़मीन पर गिरा था — आधा टूटा।
मैंने उसे उठाया। उसमें अभी भी माँ की उँगली की गंध थी।
तभी बाहर से किसी ने चिल्लाया। मैं दौड़ा।
वो छोटा लड़का था — टिंकू का दोस्त, जो हमेशा अखाड़े की छत पर बैठा मिलता था। उसका नाम बबलू था। उसकी उम्र दस साल से ज़्यादा नहीं थी। उसके हाथ में एक टूटी रस्सी थी और पूरा चेहरा पसीने से भीगा था।
"भैया!" वो हाँफते हुए बोला। "बैलगाड़ी! मैंने देखी! काली बैलगाड़ी!"
मैंने उसके कंधे पकड़े। मेरी उँगलियाँ उसकी हड्डियों में धँस गईं।
"कौन था? कितने थे? किधर गई?"
वो डर गया। मैंने हाथ ढीले किए।
"सॉरी," मैंने कहा। "धीरे बोल। कुछ नहीं होगा। बस बता — क्या देखा?"
उसने साँस ली। "मैं नहर पर मछली पकड़ रहा था। तभी पुल से एक बैलगाड़ी आई। उसमें दो औरतें थीं — एक बुढ़िया, एक छोटी लड़की। बुढ़िया बेहोश थी। लड़की रो रही थी।"
"और गाड़ीवाला?"
"लंगड़ा था, भैया।" बबलू ने अपना दायाँ पैर दिखाया। "ऐसे घसीटकर चलता था। उसने मुझे देखा और लाठी उठाई, तो मैं भाग आया। पर भैया — गाड़ी नहर के उस पार गई। उस तरफ़ जहाँ पुराना रास्ता है।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
लंगड़ा। शेराज़। फिर से।
मैं पलटा। मीरा बाहर आ चुकी थी, उसके हाथ में मेरी धोती थी। टिंकू अपनी मिठाई की डिब्बी उठाए खड़ा था। कालू काका दीवार का सहारा लिए हुए थे, उनकी सफ़ेद दाढ़ी काँप रही थी।
"मैं जा रहा हूँ," मैंने कहा।
"हम जा रहे हैं," मीरा ने कहा। उसने मेरी तरफ़ धोती बढ़ाई। "ये पहन। जूते पहन। और वीर —"
"मत रोक मुझे।"
"मैं नहीं रोक रही," वो बोली। "मैं कह रही हूँ कि गाड़ी का पहिया टूटेगा। उस रास्ते में कीचड़ है। अगर वो फँसा, तो हमें वक़्त मिलेगा। पर हमें सीधे नहीं जाना। हमें नहर के किनारे-किनारे जाना है, जहाँ घास है। पगडंडी से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं। वो भी डरी हुई थी। पर उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो कभी नहीं टूटती।
"ठीक है," मैंने कहा।
टिंकू ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "लड्डू ले ले।"
"अभी नहीं —"
"ले ले, भाई।" उसकी आवाज़ में हँसी थी, पर आँखें गीली। "तेरे हाथ काँप रहे हैं। कम से कम पेट में कुछ तो हो।"
मैंने लड्डू लिया। उसे मुँह में रखा। उसका स्वाद नहीं आया। पर मेरे हाथ थोड़े रुके।
हम चले।
नहर तक पहुँचने में हमें पंद्रह मिनट लगे। रास्ते में कोई नहीं बोला। रात खत्म हो रही थी — पूरब में आसमान हल्का नीला हो रहा था, पर नीचे अब भी अंधेरा था। घास पर ओस थी। मेरी चप्पलें भीग गईं।
नहर के किनारे पहुँचकर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"रुक," उसने कहा।
"मीरा —"
"वीर, रुक।" उसने मेरा हाथ ऊपर उठाया। "देख अपने हाथ।"
मैंने देखा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। हथेली पर पसीना था, और उस पसीने में लड्डू की चीनी चिपकी थी।
"तू ऐसे मत चल," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "तेरे हाथ काँप रहे हैं। इस हालत में तू लड़ेगा तो हारेगा। और अगर तू हारा, तो तेरी माँ —"
वो रुकी। उसने अपनी बात पूरी नहीं की। मुझे पता था क्यों। क्योंकि उसे भी डर था।
मैंने आँखें बंद कीं। साँस खींची। नहर की गंध — कीचड़, घास, और दूर से आती भट्ठे की जली मिट्टी की बू। मैंने उसे अंदर तक खींचा। जैसे माँ सिखाती थी — "जब दिल धक-धक करे, तो साँस गिन। एक। दो। तीन।"
मैंने गिना। मेरे हाथ नहीं रुके। तब मैंने आँखें खोलीं और मीरा की तरफ़ देखा।
और फिर, बिना सोचे, मैंने अपना सिर उसके कंधे पर टिका दिया।
वो हिली नहीं। उसने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा। उसकी हथेली में तुलसी और अदरक की गंध थी। मेरी आँखों से पानी आया — बिना आवाज़, बिना सिसकी। बस पानी। मेरे गले में कुछ अटका था जो बाहर नहीं आ रहा था।
हम वहाँ कुछ पल खड़े रहे। टिंकू ने कुछ नहीं कहा। कालू काका ने कुछ नहीं कहा।
फिर मैंने आँसू पोंछे। पीछे हटा। मीरा की कुर्ता की आस्तीन पर गीला निशान था।
"अब चल," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी थी, पर साफ़। "देर हो रही है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था।
"ठीक है," वो बोली। "पर एक बात। अगर हम वहाँ पहुँचे और शेराज़ वहाँ मिला, तो पहले बात करेगा। पहले मैं बोलूँगी। तू तब तक चुप रहेगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तेरी आँखों में अभी गुस्सा है, और गुस्से में आदमी गलती करता है। शेराज़ को तेरा गुस्सा चाहिए। वो उसी का इंतज़ार कर रहा है।"
मैंने उसकी बात मानी। मुझे बुरा लगा, पर उसने सही कहा था।
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