Spirit of a Fighter – Chapter 919
"कौन?"
"नंदकिशोर," उसने कहा। "उसने मेरे हाथ से शीशी का साँचा छीनना चाहा। मैंने मना किया। तो उसने मेरे घर में आग लगा दी। मैं जलते हुए निकला, और मेरी उँगली उस आग में रह गई।"
मैं चुप खड़ा रहा। मेरे अंदर कुछ हिल रहा था — गुस्सा, करुणा, या दोनों। मैं समझ नहीं पा रहा था।
"तू मेरे पापा का शिष्य था," मैंने कहा। "उसने तुझे अपना हाथ बताया था। और तूने उसकी मौत के बाद क्या किया? तूने शीशी बनाई। तूने भैरव को दी। तूने उन पहलवानों को मरने दिया।"
वो उठ खड़ा हुआ। अचानक, तेज़ी से, और उसकी कुर्सी पीछे हटकर गिर गई।
"मैंने किसी को नहीं मारा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा। "मैंने पानी बनाया। पीने वाले ने खुद पिया। तेरे पापा ने खुद पिया। भैरव ने खुद पिलाया। मैं तो सिर्फ़ वो आदमी था जिसने उन्हें बताया कि ताकत कहाँ छुपी है।"
"तो फिर तू क्यों छुपा?" मैंने कहा। "अगर तेरे हाथ साफ़ थे, तो बीस साल तू कुएँ में क्यों बैठा रहा? क्यों तूने मेरी जेब में काग़ज़ रखे? क्यों तूने माँ पर इलज़ाम लगाया?"
वो चुप हो गया। और उसकी चुप्पी मुझे बता रही थी कि मैं सही जगह पर हूँ।
"क्योंकि मैं डरता था," उसने धीरे से कहा। "बीस साल मैं डरता रहा। नंदकिशोर से, भैरव से, उस सच से जो मेरे हाथों से निकल चुका था। और जब तू आया, तो मैंने सोचा — शायद ये लड़का वो कर देगा जो मैं नहीं कर सका।"
"तो तूने मेरी मदद की?" मैंने कहा। "मेरी जेब में काग़ज़ डालकर? मेरी माँ को झूठा बताकर? ये मदद है?"
उसने अपनी जली हुई उँगली उठाई और मेरी तरफ़ की।
"वो काग़ज़ मैंने नहीं डाले," उसने कहा। "वो नंदकिशोर ने डाले। और उन्हें तेरी जेब में डालने वाला मैं नहीं था — मैं तो उन्हें सिर्फ़ लिखता था। डालने वाला कोई और है। कोई ऐसा जो तेरे बहुत करीब है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"कौन?" मैंने कहा।
"वही जिसने मेरे हाथ जलाए," उसने कहा। "नंदकिशोर। पर वो खुद नहीं आता। वो किसी अपने को भेजता है। कोई ऐसा जिसे तू रोज़ देखता है। कोई ऐसा जो तेरे घर में आता-जाता है।"
मीरा ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ा। टिंकू ने धीरे से कहा, "वीर, ये हमें बाँटने की कोशिश कर रहा है।"
"मैं बाँट नहीं रहा," बूढ़े ने कहा, और उसकी आवाज़ में थकान थी। "मैं बचा रहा हूँ। तू जानता है, भवानी के बेटे, कि तेरे घर में कौन है जो रोज़ तेरी थाली में खाना रखता है? कौन है जो तेरे कपड़े धोता है? कौन है जो तेरी जेब के पास से गुज़रता है?"
मैंने उसकी बात काटी, पर मेरी आवाज़ में वो यकीन नहीं था जो होना चाहिए था।
"तू मुझे भड़काने की कोशिश कर रहा है," मैंने कहा। "तेरे पास कुछ नहीं है। तू बस वो आदमी है जो बीस साल कुएँ में बैठा रहा और अब मरने से पहले किसी को अपने साथ ले जाना चाहता है।"
वो हँसा। और वो हँसी भट्ठे की दीवारों से टकराकर लौटी।
"मरने से पहले?" उसने कहा। "मैं मरने नहीं आया, वीर। मैं तुझे वो देने आया हूँ जो तेरे पापा ने छुपाया था। और वो चीज़ मेरे पास है — बीस साल से।"
उसने शीशी खोली। उसमें से एक काग़ज़ निकाला — बहुत पुराना, मुड़ा हुआ, पीला।
"ये तेरे पापा की लिखाई है," उसने कहा। "ये वो ख़त है जो उन्होंने मरने से पहले लिखा था। और जो उन्होंने मुझे दिया था, इसलिए नहीं कि मैं उनका शिष्य था — बल्कि इसलिए कि मैं उनका दोस्त था। और दोस्त वो चीज़ रखता है जो दुश्मन से नहीं छुपती।"
मैंने हाथ बढ़ाया। उसने काग़ज़ दिया। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। काग़ज़ में मिट्टी और गुड़ की गंध थी, और उसके नीचे — कपूर।
मैंने खोला। लिखाई मेरे पापा की थी। मैंने दो लाइनें पढ़ीं, और मेरी आँखें ठंडी हो गईं। फिर मैंने पूरा पढ़ा।
"तेरे पापा जानते थे कि वो मरेंगे," बूढ़े ने कहा। "और उन्होंने लिखा कि उनकी मौत का ज़िम्मेदार सिर्फ़ भैरव नहीं है। ज़िम्मेदार वो आदमी भी है जो उनके पास सबसे पहले आया था — जब वो अभी बीमार भी नहीं थे।"
मैंने काग़ज़ को सीने से लगाया। मेरी आँखों में पानी आ गया, पर मैंने उसे गिरने नहीं दिया।
"कौन?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ रेत जैसी थी।
बूढ़े ने अपनी जली उँगली उठाई और उसने भट्ठे के फाटक की तरफ़ इशारा किया।
मैं पलटा। फाटक पर एक आदमी खड़ा था, मशाल हाथ में। उसका चेहरा रोशनी में आधा था। और मैं उसे पहचानता था।
कालू काका।
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया। मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए।
कालू काका ने मशाल नीचे की, और उनकी आवाज़ वैसी ही धीमी थी — जैसे पुरानी किताब पढ़ रहे हों।
"मैं तुझे बताने वाला था, बेटा," उन्होंने कहा। "पर हर बार डर गया। बीस साल से डरता आया हूँ।"
"आप?" मेरी आवाज़ टूट गई। "आपने मुझे अखाड़े की मिट्टी दी? आपने मुझे कुएँ की सीढ़ियाँ दिखाईं? आपने मुझे पापा की डिबिया दी?"
"और मैंने ही तेरी जेब में काग़ज़ रखे," उन्होंने कहा। "मैंने ही आँगन की मिट्टी पर लिखा। मैंने ही तुझे हवेली भेजा। मैं तुझे तेरे पापा की मौत की तरफ़ भेज रहा था — पर इसलिए नहीं कि मैं तुझे मरवाना चाहता था। इसलिए कि मैं चाहता था तू सच तक पहुँचे। और सच तक पहुँचने के लिए तुझे अकेले चलना पड़ता है।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। मीरा मेरे बगल में आई और उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"काका," उसने कहा, "आपने ये सब क्यों किया? आप चाहते तो हमें सीधे बता सकते थे।"
कालू काका ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ़ बहुत लंबे डर से आती है।
"मैंने तेरे पापा को मरते देखा था, वीर," उन्होंने कहा। "मैं उस रात अखाड़े में था। मैंने देखा कि भैरव ने उन्हें आख़िरी घूँट दिया। और मैं कुछ नहीं बोला। मैं वहीं खड़ा रहा और मैंने अपना मुँह बंद रखा।" उनकी लाठी ज़मीन पर टकराई। "अब तू बताता है — उस आदमी को तेरे पिता का सच बताने का हक़ था या नहीं?"
भट्ठे में सन्नाटा छा गया। मैंने उनकी तरफ़ देखा, और मेरे अंदर गुस्सा था, और दया भी, और कुछ ऐसा जो मैं नाम नहीं दे सकता था।
"आपने मेरी माँ को डराया," मैंने कहा। "आपने गुड़िया की जान के नाम पर उसे चुप कराया। ये भी सही था?"
कालू काका ने सिर झुका लिया। "नहीं," उन्होंने कहा। "वो सही नहीं था। पर उस वक़्त मुझे कोई और रास्ता नहीं दिखा।"
तभी बूढ़े ने — रघु ने — कुर्सी की तरफ़ बढ़कर वो शीशी उठाई और उसे पूरी ताकत से ज़मीन पर पटक दिया। शीशी टूटी, और उसमें से पीला पानी बह गया, और वो पानी मिट्टी में मिलकर सिसकने लगा।
"अब तेरा काम है," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "मेरा काम ख़त्म। मैंने ज़हर बनाया, और मैंने आज उसे तोड़ दिया। तेरे पापा का ख़त तेरे पास है। तेरे पास गवाह हैं। तेरे पास मिट्टी है। अब तू वो कर जो मैं बीस साल नहीं कर सका।"
वो पलटा और छाया की तरफ़ चला गया, और उसकी जली हुई आवाज़ आख़िरी बार लौटी — "और वीर… तेरे पापा ने आख़िरी साँस में तेरा नाम लिया था। उन्होंने कहा था — 'मेरा बेटा मुझसे बड़ा पहलवान बनेगा।'"
वो ग़ायब हो गया। और भट्ठे में सिर्फ़ आग की चटकन रह गई।
मैंने काग़ज़ उठाया और उसे सीने से लगाया। मेरी आँखों से पानी बह रहा था, और मैं उसे रोक नहीं रहा था।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा और उसने कुछ नहीं कहा। टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। कालू काका वहीं खड़े थे, उनकी लाठी अब ज़मीन पर नहीं टकरा रही थी।
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