Spirit of a Fighter – Chapter 918
वो जली हुई आवाज़ हवा में रह गई, और हमारी गाड़ी नदी की तरफ़ मुड़ गई। पर मेरे कानों में वो लाइन बजती रही — "तेरे पापा मेरे पास ही हैं।" मैंने मीरा का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसने कुछ नहीं कहा, बस उसकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँस गईं।
रास्ते में मैंने पीछे मुड़कर देखा। शेराज़ वहीं खड़ा था, अपने बीमार आदमी के पास झुका हुआ। उसने हमारी तरफ़ नहीं देखा। उसका एक हाथ अपने साथी के माथे पर था, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने सोचा — ये आदमी भी किसी का बेटा होगा। किसी का भाई। और ये ज़हर सबको एक जैसा खाता है। फिर मैंने नज़र हटा ली, क्योंकि मेरे अंदर भी ज़हर भर रहा था — और वो ज़हर सिर्फ़ एक नाम से धीमा होता था। नंदकिशोर।
गाड़ी नहर के पुल पर पहुँची तो माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू उसकी बात सुनकर नहीं गया ना?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं जा रहा हूँ, पर उसकी बात सुनने नहीं।"
माँ ने आँखें बंद कर लीं, और उनके होठ हिले — कोई दुआ, जो मैं सुन नहीं सका। गुड़िया मेरे बगल में बैठी थी, उसकी कटोरी अब खाली थी, पर उसके हाथ अब भी उसे पकड़े हुए थे, जैसे उस कटोरी में कोई जान हो। सुक्खी बुआ गाड़ी के पीछे बैठी थीं और लगातार बोल रही थीं — "अरे मैंने तो सुना है कि भट्ठे वाला रास्ता रात में बंद हो जाता है, वहाँ कुत्ते भी नहीं भौंकते, वहाँ तो…"
"बुआ," मैंने कहा, "चुप रहिए। प्लीज।"
वो चुप हो गईं। और उनका चुप होना ही बता रहा था कि बात बहुत बिगड़ी हुई है।
भट्ठा गाँव से करीब दो कोस दूर था, नहर के उस पार, जहाँ मिट्टी का रंग लाल से काला हो जाता है। रास्ते में टिंकू गाड़ी के आगे-आगे चल रहा था, हर मोड़ पर लालटेन उठाकर देखता। एक जगह उसने रुककर कहा, "वीर, यहाँ मिट्टी गीली है। किसी ने अभी-अभी पानी डाला है।"
मैं गाड़ी से उतरा। मिट्टी पर पैरों के निशान थे — एक लंगड़े का निशान, और एक के जूते का, जो गहरे थे, जैसे कोई भारी आदमी हो। और तीसरा निशान — छोटा, हल्का, दबा हुआ। मैं झुका और मिट्टी को हथेली पर लिया।
"ये माँ के पैरों के निशान नहीं हैं," मैंने कहा।
मैंने उसे सूँघा। मिट्टी में तंबाकू था, और उसके नीचे कुछ और — मीठा, भारी, सड़ा हुआ। गुड़। जला हुआ गुड़।
"ये तो…" टिंकू ने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "वो बूढ़ा यहाँ से गुज़रा है।"
हम फिर चले। दूर से भट्ठे की चिमनी दिख रही थी, ऊँची, काली, आसमान में एक उँगली की तरह। उसके नीचे आग की लाल रोशनी थी, और उस रोशनी में धुआँ उठता दिख रहा था। एक-एक करके, हम सब उस आग की तरफ़ खिंचते जा रहे थे, जैसे कोई रस्सी खींच रही हो।
भट्ठे का फाटक खुला था। कोई पहरा नहीं। यही सबसे डरावना था — जब दुश्मन तुम्हें रोकता नहीं, तो समझ लो वो तुम्हें अंदर ही चाहता है।
मैंने गाड़ी रोकी। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो काँप था जो मैंने एक बार सुना था — जब पापा मरे थे। "तू अंदर मत जा। मैं जाती हूँ। वो मुझे ही बुला रहा है।"
"माँ," मैंने कहा, "आप गाड़ी पर बैठी रहिए। अगर मैं अंदर गया और आधे घंटे तक नहीं लौटा, तो टिंकू आपको लेकर सीधे रणवीर सिंह के पास जाएगा। वो पंचायत बुला लेंगे।"
"और तू?" गुड़िया ने कहा। उसकी आवाज़ छोटी थी, बच्चों वाली नहीं — उससे बड़ी।
"मैं वापस आऊँगा," मैंने कहा। "मैंने पापा से वादा किया है।"
मैंने गुड़िया की थैली से अखाड़े की मिट्टी निकाली और माथे पर लगाई। मीरा मेरे पीछे आई। उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया।
"तू रुक," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहले दिन सुनी थी, जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था। "मैं तब नहीं रुकी जब तू मुझे बाहर वाला कहता था। अब क्यों रुकूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
हम अंदर गए — मैं, मीरा, टिंकू और कालू काका। कालू काका की लाठी ज़मीन पर टक-टक कर रही थी, और वो टक-टक मेरे दिल की धड़कन से तेज़ थी।
भट्ठे के अंदर गर्मी ऐसी थी कि साँस लेने में तकलीफ़ हो। ईंटों की दीवारें लाल दिख रही थीं, और हवा में जली मिट्टी की गंध थी — वो गंध जो मैंने हवेली में पकड़ी थी, वो गंध जो मेरे पापा की हड्डियों के साथ जली थी। मेरे पेट में कुछ उलटा।
अंदर एक बड़ा खुला मैदान था, जहाँ ईंटें सुखने के लिए रखी थीं। बीच में एक कुर्सी थी। उस पर कोई नहीं बैठा था। और उसके चारों तरफ़, ज़मीन पर, कटोरियाँ रखी थीं — पीली कटोरियाँ, जिनमें कुछ काला था।
मैं रुक गया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये ज़हर के दाने हैं। इतने सारे…"
"मैं देख रहा हूँ," मैंने कहा।
और तभी उस जली हुई आवाज़ ने कहा — "बैठ, भवानी के बेटे। ये सब तेरे लिए है।"
वो छाया से निकला। बूढ़ा, झुका हुआ, सिर पर मैला सफ़ेद कपड़ा, शरीर पर जला हुआ कुर्ता। उसका एक हाथ सामान्य था, पर दूसरे हाथ में उँगलियाँ नहीं थीं — सिर्फ़ जला हुआ माँस, जो अब भी ताज़ा दिख रहा था, जैसे आग कल लगी हो।
उसके हाथ में पीली शीशी थी। वही शीशी।
"मैं तुझे नहीं जानता," मैंने कहा।
"मैं जानता हूँ तुझे," उसने कहा। "तू भवानी की आँखें लेकर आया है। वो आँखें मैंने बहुत बार देखी हैं — जब वो मुझे अपना हाथ बताता था। जब वो मुझे शीशी भरना सिखाता था। जब वो मेरे काम को देखकर हँसता था।"
वो कुर्सी की तरफ़ बढ़ा, और जैसे-जैसे बढ़ा, उसकी आवाज़ बदलती गई — जली हुई आवाज़ के नीचे से एक और आवाज़ निकलने लगी, साफ़, तेज़, जवान।
"मेरा नाम रघु है," उसने कहा। "रघुवीर का छोटा भाई। वो वैद्य जो तुझसे मिला। वो जो तेरे पापा को बेच गया।"
मेरे हाथ कस गए।
"तो तू वही है," मैंने कहा। "जो ज़हर बनाता है।"
"मैं वही हूँ जो ज़हर से बचाता है," उसने कहा। "तेरे पापा ने मुझे शीशी बनाना सिखाया था — ताकत बढ़ाने का पानी। पर उन्होंने कभी नहीं बताया कि पानी के साथ एक और चीज़ मिलती है। वो चीज़ मैंने खुद ढूँढी। और जिस दिन ढूँढी, उसी दिन मैं जल गया।"
उसने अपना जला हाथ उठाया। "इस आग ने मुझे बचा लिया, वीर। मैं मर गया — सबने मान लिया। पर मैं ज़िंदा रहा, और मैंने देखा कि मेरे ज़हर से कौन-कौन मरता है। भैरव, नंदकिशोर, रघुवीर — सब मेरे ज़हर के पैरों के नीचे थे। और मैं बैठा रहा, और देखता रहा।"
"तूने मेरे पापा को क्यों नहीं बचाया?" मेरी आवाज़ फट गई। "तू जानता था कि भैरव उन्हें ज़हर देगा। तू वहाँ था। तूने देखा।"
वो रुका। उसका चेहरा नहीं बदला, पर उसकी साँस बदली — धीमी, भारी।
"मैं उस रात वहाँ नहीं था," उसने कहा। "मैं उस रात से पहले जल चुका था। मेरे हाथ जल चुके थे। मैं कुछ नहीं कर सकता था।"
"झूठ," मैंने कहा। "तू वहाँ था। मैंने तेरी गंध पकड़ी है — जली मिट्टी और गुड़। वो गंध मेरे पापा की मौत वाली रात मौजूद थी। माँ ने बताया।"
वो पहली बार चौंका। उसकी एक आँख सिकुड़ी।
"तेरी माँ ने कहा?"
"हाँ," मैंने कहा। "और मेरी माँ झूठ नहीं बोलती।"
उसने कुछ देर मुझे देखा। फिर उसने कुर्सी पर बैठकर शीशी अपनी गोद में रखी, और उसकी जली उँगली उस शीशी पर ऐसे फिरी जैसे कोई बच्चे के सिर पर हाथ फेर रहा हो।
"तेरी माँ सच बोलती है," उसने कहा। "पर इस बार वो आधा सच बोली। मैं उस रात गाँव में था। पर मैं तेरे पापा के घर नहीं गया था। मैं उस आदमी के पास गया था जिसने मुझे जलाया था।"
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