Spirit of a Fighter – Chapter 915
"अच्छा?" भैरव ने भौंह उठाई। "तो पूछ अपने कालू काका से। उसके हिसाब में देख। माधो सिंह। बीस साल पहले। 'पानी बंद।'"
कालू काका का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने काग़ज़ों की गड्डी में उँगली घुमाई, फिर रुके, फिर काँपते होंठों से बोले, "माधो… माधो सिंह… हाँ। तीन महीने बीमार। फिर… फिर दंगल में।"
मीरा ने एक कदम पीछे लिया। मैंने उसे सँभाला। उसके होठ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ और था — जैसे किसी ने उसके बचपन का एक तस्वीर फाड़ दिया हो।
भैरव मुस्कुराया। "अब समझी? ये अखाड़ा पानी से चलता है। मिट्टी से नहीं।"
टिंकू अचानक आगे आया। उसने रॉड नीचे की, फिर भैरव के चेहरे के सामने उठाई और बोला, "बोलता बहुत है। हाथ खोल दूँ तो निकल जाएगा?"
"टिंकू," कालू काका ने डाँटा।
"नहीं, काका," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में वो हँसी थी जो डर के ऊपर पहनी जाती है। "मैं तो बस पूछ रहा हूँ। जब इसकी माँ मरी होगी तो इसने कितनी बोतलें बेची होंगी? सौ? दो सौ?"
भैरव का मुँह सिकुड़ा। पहली बार उसकी आँखों में कुछ और दिखा — सिर्फ़ हँसी नहीं।
"तेरी ज़ुबान बहुत चलती है," उसने धीरे से कहा।
"मेरी बहन भी चलती थी," टिंकू ने कहा। और फिर उसकी आवाज़ अचानक फीकी पड़ गई। "जब वो बीमार पड़ी, तो मैंने तेरे आदमी से पानी लिया था। याद है? चाँदी का सिक्का दिया था। तूने वो सिक्का देखा था और हँसा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर उसने रॉड नीचे नहीं की।
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा और फिर वो हँसा। पर इस बार हँसी में कुछ कम था। जैसे कोई बूढ़ा आदमी हँस रहा हो पुरानी आदत से।
"सिक्का," उसने कहा। "हाँ। मुझे याद है। तेरी बहन को पानी दिया गया था, टिंकू। और वो मरी भी। तो पानी से क्या फ़र्क पड़ता है?"
टिंकू का रॉड थोड़ा और ऊपर उठा। मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"मत कर," मैंने कहा। "ये चाहता है कि हम कुछ करें। ताकि वो कहे कि हमने उस पर हाथ उठाया।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके जबड़े कसे हुए थे। फिर उसने रॉड नीचे कर दी, पर अपनी आँखें भैरव से नहीं हटाईं।
मैंने काग़ज़ों की गड्डी फिर खोली। मेरे हाथ अब स्थिर थे। डर अब भी अंदर था, पर उसके ऊपर कुछ और बैठ गया था — वो जो माँ की आवाज़ को पकड़े हुए था।
"इसमें लिखा है," मैंने धीरे-धीरे पढ़ा, "कि पानी बीमार पहलवान को दिया जाता था। जो स्वस्थ था, उसे नहीं। तो मतलब — ये पानी बीमारी नहीं देता। ये बीमारी को… बढ़ाता है? या लंबा खींचता है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "ये बीमारी नहीं है, वीर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, जैसे वो कोई राज़ खोल रहे हों। "ये नशा है। पहले दिन आदमी को ताक़त मिलती है। दूसरे दिन और। फिर वो ताक़त उसके अंदर से खून की तरह निकलती है। और जब नशा उतरता है, तो आदमी ख़ाली हो जाता है। बिलकुल ख़ाली। हड्डी और खाल।"
"और भैरव इसे बेचता है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ लौट आई थी, और उसमें अब वो तल्ख़ी नहीं थी — कुछ ठंडा था, पत्थर जैसा। "बीमार पहलवान को। ताकि वो और लड़े, और जीते, और भैरव कमाए। और जब वो ख़त्म हो जाए, तो 'कुदरती' मौत।"
"और अगर कोई न पिए?" मैंने पूछा।
कालू काका ने काग़ज़ उलटे। "देख। यहाँ लिखा है। 'रामदीन — पानी बंद — तीन दिन।'" उन्होंने अगला पन्ना पलटा। "'जग्गा — पानी बंद — दो दिन।'" फिर रुके। "बंद करने के बाद आदमी ज़्यादा दिन नहीं जीता। जिसका शरीर नशे पर चल रहा हो, उसे अचानक बंद कर दो, तो वो बैठ नहीं सकता।"
मेरा दिमाग़ दौड़ा। "तो माँ को अगर पीना है, तो वो ज़िंदा रहेगी। पर नशे में। और अगर नहीं पिएगी, तो उसका शरीर… शरीर उसका नहीं है। वो कभी नशा नहीं करती थी।"
"तो नहीं पिएगी," मीरा ने कहा। "वो नहीं पिएगी। मैं जानती हूँ।"
"तो वो मरेगी," भैरव ने कहा। वो अब भी वहीं खड़ा था, और उसकी आवाज़ में अब हँसी नहीं थी — थकान थी। "और चूँकि उसने कभी नहीं पिया, तो उसे बंद करने का दर्द भी नहीं होगा। सीधा। दो दिन। तीन दिन। और तुम सब यहीं खड़े रहोगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और उस पल मुझे कुछ दिखा जो पहले नहीं दिखा था। भैरव के हाथ बँधे थे, पर उसकी उँगलियाँ हिल रही थीं — धीरे-धीरे, ताल में। जैसे वो किसी अपने ही गीत की ताल गिन रहा हो।
"तू डरा रहा है," मैंने कहा। "पर तूने ये नहीं सोचा कि हम तुझसे पूछेंगे कि शेराज़ कहाँ है।"
भैरव रुका।
"तू जानता है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मुझे अपनी ही लगी — पर वो काँप नहीं रही थी। "तूने कहा — 'उसी भट्ठे में।' तो तू जानता है। और अगर तू जानता है, तो तेरे आदमी भी जानते हैं। और तेरे आदमी यहाँ खड़े हैं।"
मैंने उन दो आदमियों की तरफ़ देखा जो भैरव के दोनों तरफ़ खड़े थे। दोनों ने नज़र चुराई।
"तुम दोनों," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अब मीठी थी, और वो मिठास अजीब लगी। "तुम्हें पता है, है ना? भट्ठा कहाँ है?"
उनमें से एक — छोटा, काला, जिसकी गर्दन पर पुराना निशान था — उसने होंठ सिल लिए।
"तेरे बच्चे हैं?" मीरा ने पूछा।
वो चुप रहा।
"मेरी माँ तेरे बच्चों की उम्र की नहीं है," मीरा ने कहा। "पर वो किसी की माँ है। तू जानता है माँ क्या होती है?"
आदमी की गर्दन हिली। बहुत ज़रा-सा। पर हिली।
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा और उसकी आँखें सिकुड़ीं।
"तू बोलेगा?" भैरव ने कहा।
आदमी ने उसकी तरफ़ देखा और फिर ज़मीन की तरफ़।
"तू बोलेगा," भैरव ने दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो पहले थी। "तू जानता है, मैं क्या कर सकता हूँ।"
"मैं जानता हूँ," आदमी ने धीरे से कहा। "पर मैं ये भी जानता हूँ कि तेरी बोतलें अब नहीं बिकेंगी। कालू काका ने हिसाब निकाल लिया। पूरा शहर जानेगा।"
भैरव चुप हो गया।
मैंने उस पल का फ़ायदा उठाया। "भट्ठा कहाँ है?" मैंने आदमी से पूछा। "जल्दी बोल।"
"पुराने रास्ते से," उसने कहा। "नदी के उस पार। जहाँ ईंटें पकती हैं। वहीं पीछे एक कुआँ है। उसके पास।"
"कितनी दूर?"
"बैलगाड़ी से… डेढ़ घंटा। पैदल… रात भर।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और उस पल हम दोनों ने एक ही बात सोची, बिना बोले।
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
"हम जाते हैं," मीरा ने कहा।
"तू नहीं," मैंने कहा। "तू यहाँ रुक। काग़ज़ सँभाल। अगर मैं न लौटा—"
"अगर तू न लौटा," मीरा ने कहा, और उसने मेरा हाथ फिर पकड़ा, "तो ये काग़ज़ किसी काम के नहीं। ये काग़ज़ इसलिए हैं कि तेरी माँ बचे। और मैं वहीं रहूँगी जहाँ तू है।"
मैंने उसे देखा।
॥
मैंने उसे देखा। उसका हाथ मेरे हाथ पर था, और उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — उस शख़्स की उँगलियाँ जो कभी मिट्टी में हाथ नहीं डालती, सिर्फ़ किताबों के पन्नों पर डालती है। पर उस पल वो ठंडक मुझे अच्छी लगी। डर के बीच एक सहारा जैसी।
"ठीक है," मैंने कहा। "साथ चल।"
भैरव ने बँधे हाथों से कुछ कहना चाहा, पर मैंने उसकी तरफ़ देखा ही नहीं। मैं उस काले आदमी की तरफ़ मुड़ा जिसने भट्ठे का रास्ता बताया था।
"तेरा नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"बंसी," उसने धीरे से कहा। "बंसी नाई।"
"बंसी, तू मेरे साथ चलेगा। रास्ता दिखाएगा।"
उसकी गर्दन फिर हिली। भैरव ने उसकी तरफ़ थूकने की कोशिश की, पर दूर पड़ी।
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