Spirit of a Fighter916 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 916

7 min read November 5, 2026

उसी वक़्त जग्गा आगे आया। उसका चेहरा अभी भी भीगा था — पसीना या आँसू, मैं नहीं बता सकता। उसने मेरी तरफ़ देखा और फिर अपनी कमर से एक छोटी थैली निकाली।

"ये ले," उसने कहा। "इसमें सुखी हल्दी है और काली मिर्च। मेरी माँ ने दी थी जब मैं पहली बार अखाड़े आया था। कहती थी — घाव पर लगाना।"

"तेरे पास रख," मैंने कहा।

"मेरे पास रखने से क्या होगा?" उसकी आवाज़ टूटी। "मैं तो अब पहलवान नहीं रहा। जिसने ज़हर पिया हो, वो पहलवान नहीं रहता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, और उसके होंठ काँप रहे थे। मुझे याद आया — कुछ देर पहले यही आदमी मेरा गला दबा रहा था।

"पहलवान वो होता है जो गिरकर फिर खड़ा हो," मैंने कहा। "तू अभी खड़ा है। बस।"

और मैंने थैली ले ली।

टिंकू दौड़ता हुआ आया, उसके हाथ में बर्फ़ी की डिब्बी थी और आँखों में वो चमक जो मुसीबत में भी नहीं बुझती।

"भाई, बैलगाड़ी तैयार है। जग्गा की गाड़ी है, उसने कहा ले जाओ। पर एक बात — ड्राइवर नहीं है। बूढ़ा सो गया है।"

"तो तू चला," मैंने कहा।

टिंकू का मुँह खुला रह गया। "मैं? भाई, मैंने आज तक बैलगाड़ी नहीं चलाई। मैं तो मिठाई बनाता हूँ। बैल मेरी तरफ़ देखकर हँसेंगे।"

"तो बैलों को बर्फ़ी खिला दे," मीरा ने कहा। "तू तो यही करता है ना — सबको खिलाता है।"

टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर डिब्बी की तरफ़। और फिर उसने अपनी टोपी ठीक की — जो उसकी सबसे बड़ी हिम्मत का इशारा था।

"ठीक है," उसने कहा। "पर अगर बैल मेरी बर्फ़ी खाकर पागल हो गए, तो मैं ज़िम्मेदार नहीं।"

कालू काका आगे आए। उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा और मेरे कान के पास धीरे से कहा, "बेटा, भट्ठे का रास्ता मैं जानता हूँ। वहाँ एक कुआँ है जिसमें बीस साल पहले एक आदमी गिरा था। उस कुएँ से डरना मत। डर तो उस आदमी से है जो उस कुएँ के पास रात को बैठता है।"

"कौन?" मैंने पूछा।

"पता नहीं," उन्होंने कहा। "पर वो हर बार वहीं बैठता है। और हर बार कोई न कोई उसके पास जाता है। और फिर वो नहीं लौटता।"

मेरे पेट में ठंडी सी चीज़ घूमी। पर मैंने सिर हिलाया।

गुड़िया मेरे पास आई। उसकी आँखें सूजी हुई थीं — माँ को देखकर वो रो पड़ी थी, और उसने अपने आँसू पोंछे नहीं थे। उसने मेरी कमर से अपनी थैली निकाली — वही जिसमें अखाड़े की मिट्टी थी — और मेरी जेब में खोंस दी।

"भैया," उसने कहा, "माँ को लेकर आना। और अगर वो नहीं आएँ, तो कम से कम उन्हें बता देना कि मैंने आज चक्की चला दी। मैंने आज पहली बार चक्की चलाई।"

मेरा गला भर आया। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"तू घर जा," मैंने कहा। "सुक्खी बुआ के साथ।"

"नहीं," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो माँ से आई है। "मैं अखाड़े में रहूँगी। अगर माँ नहीं आई, तो मैं यहीं बैठी रहूँगी। जब तक वो नहीं आतीं।"

मैंने उससे बहस नहीं की। बहस का वक़्त नहीं था।

हम बैलगाड़ी पर चढ़े। बंसी आगे बैलों के पास बैठा, टिंकू लगाम पकड़े हुए। मीरा मेरे पास बैठी। कालू काका पीछे बैठे और जग्गा उनके पास। गुड़िया रुकी — उसने कहा वो सुक्खी बुआ के साथ पीछे से आएगी।

गाड़ी चली। पहिए की चरचराहट, बैलों के गले की घंटी, और रात की ठंडी हवा — यही सब बचा था उस वक़्त।

अखाड़े का फाटक पीछे छूटा। मैंने पीछे मुड़कर देखा — वहाँ भैरव खड़ा था, उसके आदमी उसे घेरे हुए, और भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी। रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर बैठे थे — वो फिर बैठ गए थे — और उनका हाथ ऊपर उठा था। मुझे लगा वो कुछ कह रहे हैं, पर आवाज़ दूर रह गई।

गाड़ी गाँव की सड़क पर मुड़ी। नीम का पेड़ आया — वही पुराना पेड़ जहाँ सुक्खी बुआ से मुलाक़ात हुई थी, जहाँ पहली बार उस पीतल की लालटेन की गंध मिली थी।

और वहीं, पेड़ के नीचे, खड़ा था लंगड़ा शेराज़।

उसकी लाठी ज़मीन पर टिकी थी। वो मुस्कुरा रहा था। और उसने अपना हाथ हिलाया — धीरे से, जैसे कोई पुराना दोस्त विदा कर रहा हो।

टिंकू ने लगाम खींची। बैल रुके।

"भाई," टिंकू ने फुसफुसाया, "ये तो…"

"देखा," मैंने कहा।

मैं गाड़ी से उतरा। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने उसे छुड़ाया — नरमी से, पर छुड़ाया — और आगे बढ़ा।

शेराज़ के पीछे, थोड़ी दूर, एक और बैलगाड़ी खड़ी थी। उस पर एक टाट पड़ा था। और टाट के नीचे…

मेरी साँस रुक गई।

माँ बैठी थीं। हाथ बँधे हुए, सिर थोड़ा झुका, और उनके होंठ हिल रहे थे। मैंने दूर से, उस अंधेरे में भी, उनके होंठ पढ़े।

"मत आना।"

मेरे पैर वहीं जम गए।

शेराज़ ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी मुस्कान थोड़ी और फैली। "बहुत सोचा तूने?" उसने कहा। "आधी रात से सोच रहा है कि भट्ठे कैसे जाऊँ। भाई, भट्ठा तो मेरा ही है।"

"तूने माँ को यहाँ क्यों रोका?" मेरी आवाज़ भारी थी। "भट्ठे ले जाने की क्या ज़रूरत थी?"

"ज़रूरत थी," उसने कहा। "क्योंकि मुझे पता था तू भट्ठे की तरफ़ भागेगा। और मुझे तेरी ज़रूरत थी। यहाँ। रास्ते में।"

उसने लाठी उठाई और उसकी नोक से मेरी तरफ़ इशारा किया। "तूने भैरव को पकड़वा दिया। भैरव मेरा मालिक नहीं था, पर उसके पास जो था, वो मेरे पास नहीं है। अब मुझे वो चाहिए। और उसके लिए मुझे तू चाहिए। ज़िंदा।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब धीमी हो गई, "उस पीली शीशी का साँचा तेरे पास है। तेरी माँ के पास था। तूने कभी नहीं देखा, पर वो उस आदमी का साँचा है जो बीस साल पहले जला था। और जो साँचा जानता है, वो शीशी बना सकता है। और जो शीशी बना सकता है, वो पूरे इलाक़े का मालिक बन सकता है।"

मैं चुप रहा।

"तेरी माँ नहीं बोल रही," शेराज़ ने कहा। "तीन दिन से नहीं बोली। मैंने उससे पूछा — साँचा कहाँ है। वो बस मुस्कुरा दी। अब तुझे बुलाया है, तो तू ही बता दे।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके होंठ फिर हिले, और इस बार मैंने करीब से पढ़ा।

"मत आना।"

पर मैं आ चुका था।

तभी मेरे पीछे से कदमों की आवाज़ आई। मीरा आई — उसके हाथ में कुछ था। एक छोटी शीशी, लाल कपड़े में लिपटी।

"शेराज़," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो कोर्ट में होती है। "तू ये चाहता है ना? ये दवा है। मेरे पास है। पर तू इसे नहीं ले सकता, क्योंकि ये तेरे काम की नहीं। ये उस दर्द की दवा है जो ज़हर बंद करने पर होता है। तेरे आदमी भी पीते हैं ना? तेरे पास भी कोई है जो पीता है?"

शेराज़ रुका। उसकी लाठी थोड़ी ढीली हुई।

"तू झूठ बोल रही है," उसने कहा, पर आवाज़ में यक़ीन नहीं था।

"मैं आयुर्वेद पढ़ती हूँ," मीरा ने कहा। "मैं झूठ नहीं बोलती। और मैं तुझे बता दूँ — तेरे पास जो आदमी ज़हर पीता है, उसकी उम्र तीन महीने है। तीन महीने। उसके बाद वो गले से खून थूकेगा और मरेगा। तूने कभी देखा है किसी को मरते? ज़हर से मरते?"

शेराज़ ने लाठी नीचे की। उसका मुँह खुला रह गया।

"तू झूठ…"

"मैं दिखा सकती हूँ," मीरा ने कहा। "तेरे आदमियों में से किसी को बुला। जो पीता हो। मैं उसकी आँखें देखकर बता दूँगी कि उसके पास कितने दिन हैं।"

शेराज़ ने पीछे देखा — अपने आदमियों की तरफ़। और उस पल मुझे कुछ दिखा जो पहले नहीं दिखा था। उसके पीछे खड़े दो आदमियों में से एक — दुबला, जिसकी आँखें पीली पड़ रही थीं — उसने अपना हाथ पेट पर रखा था। जैसे अंदर कुछ चल रहा हो।

शेराज़ ने वो देखा। उसका चेहरा बदला।

"तू…" उसने उस आदमी की तरफ़ देखा। "तू पीता है?"

आदमी ने नज़र चुराई।

"कब से?"

"दो महीने," आदमी ने धीरे से कहा।

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