Spirit of a Fighter – Chapter 908
"तुम लोग क्या चाहते हो?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। अब उसमें वो सच था जो इतने सालों में पहली बार बाहर आ रहा था। "तुम लोग क्या समझते हो? कि मैंने ये सब मज़े के लिए किया? कि मुझे पहलवानों को ज़हर देना अच्छा लगता था?"
उसने अपनी छाती पर हाथ रखा। उसकी आँखें लाल हो गई थीं।
"मैं शेर सिंह का बेटा हूँ," वो बोला, और उसकी आवाज़ भर्रा गई। "मेरे पापा इसी अखाड़े में हार गए थे। भवानी ने उन्हें पछाड़ दिया था और मेरे पापा उस दिन के बाद फिर कभी नहीं उठे। वो घर आकर चारपाई पर पड़े रहे और छह महीने में मर गए। और मैं — मैं तेरा शिष्य बना, भवानी। मैंने तेरे पैर छुए। मैंने तेरे साथ मिट्टी में सोया। और तूने मुझे कभी नहीं बताया कि तूने मेरे पापा को कैसे हराया था।"
"मैंने उसे ईमानदारी से हराया था," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ अब भी साफ़ थी। "और तेरे पापा ने मरते वक़्त मुझसे कहा था — 'मेरे बेटे को अखाड़े से दूर रखना, वो बदले की आग में जलता है।' मैंने तुझे दूर रखने की कोशिश की, विक्रम। मैंने तुझे अखाड़े से निकालना चाहा, पर भवानी ने कहा — 'नहीं, ये मेरा बेटा है, इसे मैं सुधारूँगा।' और भवानी ने तुझे सुधारने की कोशिश की। तूने उसकी कोशिश का जवाब ज़हर से दिया।"
भैरव ने अपना सिर हिलाया। धीरे-धीरे, जैसे कोई सपने से जाग रहा हो।
"नहीं," वो बोला। "नहीं, तू झूठ बोल रहा है। भवानी ने मुझे कभी बेटा नहीं कहा। वो हमेशा मुझे शेर सिंह का बेटा कहता था। 'वो तो शेर सिंह का बेटा है,' वो कहता था, 'उसमें अपने बाप की आग है।' और एक दिन…" उसकी आवाज़ रुकी। "एक दिन मैंने उसे पानी पीते देखा। वो बीमार था। और मैंने सोचा — अगर ये मर गया, तो ये अखाड़ा मेरा। बस एक शीशी। बस एक बार।"
अखाड़े में इतनी ख़ामोशी छा गई कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
"तूने अपने गुरु को ज़हर दिया," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में अब सिर्फ़ गुस्सा था, गम नहीं। "अपने गुरु को, विक्रम। जिसने तुझे खाना दिया, कपड़ा दिया, मिट्टी दी।"
"उसने मेरे पापा को मारा था!" भैरव चिल्लाया।
"तेरे पापा कुश्ती में हारे थे," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी थी, थकी हुई। "हार जीत खेल का हिस्सा है। तेरे पापा बीमार थे, वो जानते थे। उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि उनका बेटा उनकी आग लेकर पैदा हुआ है। और तूने उसी आग में अपने गुरु को जला दिया।"
भैरव की आँखों से पानी बह रहा था। पर वो पोंछ नहीं रहा था। वो अपनी कमर से चाबियों का गुच्छा खोल रहा था। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं और तीन बार चाबी फिसली।
"ये लो," उसने कहा, और चाबियाँ मेरी तरफ़ फेंकी। वो मिट्टी में गिरीं और मैंने उन्हें उठाया। "जो देखना है देख लो। पर एक बात याद रखना — जो काग़ज़ उस अलमारी में हैं, वो सिर्फ़ मेरे नहीं हैं। उनमें वो भी है जिसने मुझे शीशियाँ दीं। और वो आदमी मुझसे ज़्यादा ख़तरनाक है। वो तुम सबको नहीं छोड़ेगा।"
मैंने चाबियाँ मुट्ठी में भींचीं। उन पर भी वही गंध थी — कपूर, मिट्टी, और उस पीले पानी की कड़वाहट।
"कौन?" मैंने पूछा। "कौन देता था तुझे शीशियाँ?"
भैरव ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में वो चमक थी जो एक बार फिर मीठी होने की कोशिश कर रही थी।
"अगर मैं बता दूँ," उसने कहा, "तो मेरी क्या कीमत है?"
"तेरी कीमत?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में गुस्सा नहीं था — थकान थी। "तूने बीस साल में जितने बेटे मारे, उनकी माँओं से पूछ ले। तेरी कीमत वही है जो उन्होंने दी — एक ज़िंदा लाश।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। और कुछ पल के लिए — बस एक पल — उसके चेहरे पर वो आदमी दिखा जो कभी मिट्टी में लिपटा हुआ, भवानी के पैरों के पास बैठा, मिट्टी की गंध से खुश था। फिर वो पल गुज़र गया।
"शहर में एक आदमी है," वो धीरे से बोला। "बड़ा अखाड़ा, बड़े पैसे, बड़े आदमी। वो मुझे शीशियाँ देता था और बदले में मुझसे पहलवान लेता था। जो हार जाते, वो उन्हें अपने यहाँ ले जाता। कहता था — 'इनकी ताकत मुझे चाहिए।' और मैं…" उसने साँस ली, "मैं उसे दे देता था।"
मीरा ने अचानक मेरी कलाई पकड़ी। उसकी पकड़ ठंडी थी।
"कहीं वो…" वो फुसफुसाई, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो पहले नहीं था, "कहीं वो वही आदमी नहीं जो शहर से दो बड़े आदमी भेज रहा है? जिन्हें ख़त का पता है?"
भैरव ने मीरा की तरफ़ देखा और उसके होंठ मुड़े। वो मुस्कान नहीं थी — बस एक टेढ़ी लकीर।
"तुम्हारी बेटी समझदार है, रणवीर," वो बोला। "इसीलिए मैंने उसे तुझसे दूर रखना चाहा था।"
"मुझे दूर रखने की कोशिश तूने की," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो ज़िद थी जो मैं जानता था, "पर मैं वहाँ पहुँच गई जहाँ तुझे मेरी ज़रूरत नहीं थी।"
फिर वो रणवीर सिंह के पास गई। इस बार उन्होंने उसे नहीं रोका। उनके पैर अब भी काँप रहे थे और व्हीलचेयर पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही थी। मीरा ने अपना कंधा उनकी बगल में दे दिया, और धीरे से उन्हें बैठा दिया।
रनवीर बैठ गए। उनकी साँस ऐसे चल रही थी जैसे वो मीलों दौड़कर आए हों। पर उनकी आँखें अब भी भैरव पर टिकी थीं।
"वो आदमी," रणवीर ने कहा, और उनकी आवाज़ अब फुसफुसाहट थी, "उसका नाम क्या है?"
भैरव ने अपना सिर झुकाया। उसकी मूँछों के सिरे झुक गए और उसकी गर्दन पर पसीने की एक बूँद दिखी।
"वो अपना नाम कभी नहीं बताता," वो बोला। "सिर्फ़ अपनी शीशी भेजता है। पीली शीशी। और उस पर एक निशान होता है — जले हुए हाथ का।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। मेरी उँगलियों को वो चाँदी की अंगूठी मिली जो कालू काका ने दी थी — वो अंगूठी जिस पर बाहरी पानी वाले आदमी का निशान था। मैंने उसे बाहर निकाला और भैरव की तरफ़ उठाया।
"ये निशान?" मैंने पूछा।
भैरव ने देखा और उसकी आँखें फैल गईं। वो एक पल के लिए चुप हो गया, फिर उसने धीरे से कहा, "तू उस तक पहुँच गया है। तो अब तू जान ले — वो आदमी तेरे पापा को भी जानता था। उसने ही भवानी को इलाज के बहाने पीली शीशी दी थी। और भवानी ने उसे पीने से मना कर दिया था।"
मेरी मुट्ठी अपने आप कस गई। अंगूठी की धार मेरी हथेली में चुभी।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। "मेरे पापा ने कभी वो पानी नहीं पिया। वो आख़िरी दम तक ईमानदार रहे।"
"हाँ," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने उसमें पहले कभी नहीं सुनी — शर्म। "वो नहीं पिया। इसीलिए वो मर गया। और मैं पीता रहा, इसीलिए मैं ज़िंदा हूँ। ये सच है, वीर। तेरे पापा मरे क्योंकि वो साफ़ थे, और मैं ज़िंदा हूँ क्योंकि मैं सड़ चुका हूँ।"
अखाड़े में कोई नहीं बोला।
फिर माँ आगे आईं। उनके हाथ में वो पीली शीशी थी जो उन्होंने पहले जलाई थी — नहीं, ये दूसरी थी, ये वही थी जो वीर को दी थी। उन्होंने उसे भैरव के सामने रखा।
"तूने मेरे पति को ज़हर दिया," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में काँप नहीं था। बस एक बीस साल पुरानी चुप्पी टूट रही थी। "तूने मेरे बेटे को अनाथ किया। तूने मुझे उस रात के बाद से सिर्फ़ चक्की के पीछे रहने की सज़ा दी। और आज तू अपनी शर्म दिखा रहा है? तेरी शर्म तेरे पास रख। मुझे तेरी शर्म नहीं चाहिए। मुझे मेरा भवानी चाहिए।"
उनकी आवाज़ आख़िरी शब्द पर टूट गई। उन्होंने अपनी आँखें भींच लीं और उनके होंठ काँपे।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno