Spirit of a Fighter – Chapter 901
"मैं ग़लत हो गया। मैं जानता हूँ। पर मेरे अंदर भी वो मिट्टी है।"
मैं उसके सामने खड़ा था। उसका सिर मेरे घुटनों के पास था।
और मुझे अपने पापा की आवाज़ याद आई। ख़त में लिखी उनकी आख़िरी बात — "पहलवान बनना, बदला लेने वाला नहीं।"
मैंने अपनी मुट्ठी देखी। वो कसी हुई थी।
मैंने उसे धीरे से खोला।
"तू मेरे पापा का शिष्य था," मैंने कहा। "तो उनका नाम तूने बढ़ाया कहाँ? तूने तो उन्हें ही खा लिया।"
भैरव का सिर और नीचा झुक गया।
"मैं तुझे माफ़ नहीं करूँगा," मैंने कहा। "माफ़ करना मेरे हाथ में नहीं है। पर मैं तुझे ये ज़रूर बताऊँगा — तेरी मिट्टी, तेरा अखाड़ा, तेरा नाम, सब कुछ आज के बाद मेरा है। और मैं इसे उस तरह रखूँगा जिस तरह मेरे पापा रखते।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"अब उठ। और मिट्टी में हाथ डाल। आज से तू फिर से शुरू करेगा। और मैं देखूँगा कि तू क्या बनता है।"
भैरव ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था।
और तभी अखाड़े के फाटक पर कुछ हुआ।
पुलिस आई थी। मीरा के पीछे-पीछे, और उसके साथ हरनाम हथकड़ी में था।
पर उनसे पहले, एक और चीज़ हुई।
जग्गा, जो अब तक मेरे पीछे खड़ा था, आगे आया। उसने अपनी जेब से वो पीली शीशी निकाली — वही जो उसने मिट्टी पर रखी थी। उसने उसे अपने मुँह के पास ले जाया।
मेरा दिल रुक गया।
"जग्गा!"
वो रुका। शीशी उसके होंठों से एक इंच दूर थी।
वो मेरी तरफ़ मुड़ा। और उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी — पहली बार, एक असली मुस्कान, जो आँखों तक पहुँच रही थी।
"डर मत," उसने कहा। "मैं इसे पीने नहीं जा रहा।"
और उसने शीशी को ज़मीन पर पटक दिया।
शीशी टूट गई। पीला पानी मिट्टी में फैल गया, और उसकी कड़वी गंध हवा में उठ गई।
जग्गा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब बता," उसने कहा। "तेरे साथ कब कसरत शुरू करनी है?"
भीड़ में पहले एक आवाज़ आई, फिर दूसरी, फिर पूरा अखाड़ा हँसने लगा। वो हँसी ऐसी थी जो बीस साल के डर के बाद निकली हो।
मैं हँसा। मेरी आँखों से पानी बह रहा था और मैं हँस रहा था।
और तभी मेरी माँ मेरी तरफ़ आई। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। उनके हाथों में चक्की की गंध थी — आटा, पसीना, और हल्दी।
"मेरा बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बस इतनी ही कह पाई।
मैंने उनके हाथों में अपना मुँह दबा दिया।
और मेरे पीछे, अखाड़े की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर में, एक नौजवान मिट्टी में लिपटा मुस्कुरा रहा था। कालू काका उस तस्वीर के नीचे खड़े थे, और उनकी आँखों में भी पानी था।
कालू काका ने तस्वीर से नज़र हटाई। उन्होंने अपनी अंगुली उठाई और सबको चुप कराया।
"आज से ये अखाड़ा वीर का है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ रुंधी थी, पर साफ़। "और जग्गा इसका पहला शिष्य।"
जग्गा ने मेरी तरफ़ देखा। मिट्टी में उसके घुटनों के निशान अभी गीले थे।
"एक शर्त है," वो बोला।
"बोल।"
"मैं तेरे साथ लड़ूँगा, पर तेरे पीछे नहीं चलूँगा। तेरे बराबर चलूँगा।"
मैंने उसका हाथ थामा। उसकी हथेली खुरदरी थी, और उसमें वो गर्मी थी जो सिर्फ़ मेहनत करने वाले हाथों में होती है।
"बराबर," मैंने कहा।
तभी मीरा आई। उसने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे भीड़ से थोड़ा दूर खींच लाई। उसकी साँस तेज़ चल रही थी।
"वीर, आज तो तू जीत गया," उसने धीरे से कहा। "पर सुन।"
उसने पीछे मुड़कर देखा।
"भैरव ने कोई साल भर पहले एक शीशी एक आदमी को भेजी थी। शहर में। उस आदमी का नाम भैरव ने कभी किसी को नहीं बताया। पर उसकी आवाज़ उसने हरनाम से छुपाई थी।"
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो अभी भी मिट्टी में बैठा था, पर अब उसकी आँखों में सिर्फ़ शर्म नहीं थी। कुछ और था। डर।
"वो आदमी कौन है?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं नहीं जानती। पर भैरव जानता है। और वो अब भी उससे डरता है।"
धूप ढल रही थी। अखाड़े की मिट्टी में फैला पीला पानी सूख रहा था, और उसकी जगह एक हल्का-सा धब्बा छोड़ रहा था।
मैं जग्गा के पास गया। वो रस्सी पर बैठा था, अपने घुटने सहला रहा था।
"तेरा घुटना?" मैंने पूछा।
"तेरे दाँव से ज़्यादा तेरे बोल से दुखता है," वो हँसा। पर फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया।
उसने धीरे से अपनी जेब में हाथ डाला।
"वीर, मैं तुझे कुछ दिखाना चाहता हूँ। भैरव ने मुझे ये दिया था — 'जब तू हारने लगे, तब पी लेना,' उसने कहा था। पर मैंने कभी नहीं पिया।"
उसने जेब से एक छोटी पीली शीशी निकाली। फिर एक और। और एक और।
तीन शीशियाँ। और उन पर वही निशान था — एक छोटा सा नाग, जो मुँह खोले बैठा था।
"मैंने इन्हें कभी पिया नहीं," जग्गा ने धीरे से कहा। "पर मुझे पता है ये किसने बनाई हैं।"
मैंने शीशियाँ उसके हाथ से लीं। उनमें पीला तरल हिल रहा था।
"किसने?"
जग्गा ने मेरी आँखों में देखा।
"तेरे गाँव के उस बूढ़े वैद्य ने। जो अब शहर में रहता है। जिसके पास तेरे पापा आख़िरी बार गए थे।"
मेरे हाथ से शीशी फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ा। मेरी उँगलियाँ ठंडी हो गई थीं।
"वो वैद्य," मैंने धीरे से कहा। "जिसने मेरे पापा का इलाज किया था।"
जग्गा ने सिर हिलाया।
"वही।"
और तभी भैरव की आवाज़ आई, बहुत दूर से, बहुत हल्की — जैसे किसी कुएँ से।
"वीर… वो आदमी… वो आदमी तेरे पापा को मारने नहीं आया था।"
मैं पलटा।
"वो तेरे पापा को बचाने आया था। पर देर हो गई। और उसने अपना गुनाह छुपाने के लिए मेरे हाथ में ये पानी दे दिया।"
भैरव ने अपनी आँखों से पानी पोंछा।
"उसने मुझसे कहा — 'जो हुआ सो हुआ। अब इस मिट्टी को अपने नाम पर चलाना।'"
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरी आँखों के आगे मेरे पापा की तस्वीर घूम गई — एक बूढ़े वैद्य के सामने बैठे, पानी का प्याला हाथ में लिए, भरोसा किए हुए।
"मैं उससे मिलूँगा," मैंने कहा।
जग्गा उठा। उसने अपने घुटने सीधे किए और मेरे सामने खड़ा हो गया।
"तो चल। पर एक बात याद रख।"
"क्या?"
"वो आदमी आम नहीं है। उसके पास शीशियाँ हैं, हर तरह की। और उसके पास वो भी है जो भैरव के पास कभी नहीं था।"
"क्या?"
जग्गा ने धीरे से कहा।
"सबका भरोसा।"
मैं खड़ा रहा। अखाड़े की मिट्टी मेरे पैरों के नीचे से ठंडी हो रही थी। पीछे कहीं मेरी माँ की आवाज़ आई — "वीर, घर चलें" — पर मैंने सुना नहीं।
मैंने अपनी जेब से वो तीन शीशियाँ निकालीं। उन्हें धूप में उठाया। उनमें पीला पानी चमक रहा था।
और फिर मैंने देखा — तीसरी शीशी के पेंदे पर एक लिखाई थी। बहुत छोटी, बहुत पुरानी।
मैंने उसे आँखों के पास लाया।
और मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
वहाँ मेरे पापा का नाम लिखा था।
॥
तीसरी शीशी के पेंदे पर मेरे पापा का नाम लिखा था, और मेरी उँगलियाँ उसे पकड़े हुए ऐसे ठंडी हो गईं जैसे मिट्टी में गड़ी हों।
"वीर?" मीरा ने मेरा कंधा छुआ। "क्या हुआ?"
मैंने शीशी उसकी तरफ़ बढ़ाई। उसने पेंदा पलटकर देखा, और उसका चेहरा उतर गया।
"ये तो… ये तो लिखाई है।"
"पापा का नाम," मैंने कहा। मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "शीशी के पेंदे पर पापा का नाम।"
जग्गा ने गर्दन झुकाई और पास आया। उसने देखा और उसकी साँस रुक गई।
"मुझे नहीं पता था," वो धीरे से बोला। "ईश्वर कसम, मुझे नहीं पता था। भैरव ने ये शीशियाँ मुझे दी थीं, बस दी थीं।"
"इसका मतलब वैद्य ने ये शीशी पापा के लिए बनाई थी," मैंने कहा। "और भैरव ने इसे किसी और के हाथ में दे दिया।"
मैंने शीशी को अपनी हथेली में कसा। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मैं चाहकर भी उन्हें रोक नहीं पा रहा था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno