Spirit of a Fighter – Chapter 900
जग्गा ने मेरा हाथ देखा। उसके होंठ काँपे।
फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली में पसीना था, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
मैंने उसे खींचकर उठाया। वो एक पैर पर खड़ा हुआ, फिर दूसरे पैर पर, और वो लड़खड़ाया। मैंने उसकी बाँह पकड़ ली।
और तभी, मंच से एक और आवाज़ आई। इस बार भैरव नहीं चिल्ला रहा था। वो नीचे उतर रहा था।
मैंने उसे देखा। वो अपनी लाल धोती में, अपनी चमकती चेन और अंगूठी के साथ, मंच की सीढ़ियों से नीचे आ रहा था। उसकी मूँछों का तेल बह गया था और उसके चेहरे पर वो मुस्कान नहीं थी जो बीस साल से थी। उसके चेहरे पर सिर्फ़ ठंडक थी। कुएँ जैसी ठंडक।
वो अखाड़े की मिट्टी में उतरा। उसके चमड़े के जूते मिट्टी में धँसे।
"बहुत हो गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो मिठास नहीं थी जो अब तक थी। "मेरा अखाड़ा है ये। और मैं यहाँ फ़ैसला करता हूँ कि कौन जीता, कौन हारा।"
वो मेरे और जग्गा के बीच आकर खड़ा हो गया।
मैंने उसकी आँखों में देखा। और मैंने देखा कि वो डर रहा है।
"तू क्यों आया है नीचे?" मैंने पूछा। "तेरे पास अब कुछ नहीं बचा। तेरा आदमी पकड़ा गया, तेरा काग़ज़ पढ़ा गया, तेरा पानी सबके सामने है। तू यहाँ क्या करेगा?"
भैरव ने जग्गा की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"मैं तुझे बताता हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गुड़ जैसी मिठास वापस आ गई — पर अब वो झूठी थी। "तू अभी भी हार सकता है। अगर तू इस मुकाबले को छोड़ दे, तो मैं तेरी माँ को, तेरी बहन को, इस टिंकू को, सबको सही-सलामत घर भेज दूँगा। और तुझे इलाके का सबसे बड़ा अखाड़ा दूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मेरी माँ, मेरी बहन, मेरा दोस्त," मैंने कहा, "वो अभी भी मेरे पास हैं। और तेरे पास क्या है?"
भैरव ने अपनी जेब से कुछ निकाला। वो एक चमड़े की थैली थी, जिसमें सोने के सिक्के खनक रहे थे। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये सब तेरा," उसने कहा। "बस आज इस मुकाबले को छोड़ दे। कल तू अपने घर जा।"
मैंने उस थैली को देखा। सोने के सिक्के। मेरी माँ की चक्की। मेरी बहन के जूते। मेरे घर की छत।
मेरे अंदर कुछ हिला। एक पल के लिए।
फिर मैंने भीड़ में अपनी माँ को खोजा। वो दूर खड़ी थी, गुड़िया की कॉपी उसकी छाती से चिपकी थी, और वो मेरी तरफ़ देख रही थी। उनकी आँखों में पानी था, पर उनके होंठ हिल रहे थे। मैंने पढ़ा — "मत लेना।"
और मेरे सीने में कुछ जम गया।
मैंने भैरव की थैली को देखा, फिर उसकी आँखों में।
"मेरी माँ चक्की चलाती है," मैंने कहा। "चालीस साल से। उसकी कमर की हड्डी घिस गई है। मेरे पापा मरे तब मैं पाँच साल का था। मेरे घर में एक टूटी घड़ी है जो कभी ठीक नहीं हुई।"
मैंने उस थैली को मिट्टी में गिरा दिया। सिक्के मिट्टी में लुढ़क गए।
"तेरे सिक्कों से मेरी माँ की हड्डी नहीं जुड़ेगी," मैंने कहा। "और तेरी मिट्टी से मेरे पापा की हड्डियाँ नहीं आएँगी।"
भैरव का चेहरा बदल गया। उसकी आँखें सिकुड़ गईं। वो मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ा।
और तभी जग्गा आगे आया।
वो भैरव के सामने खड़ा हो गया। उसका घुटना काँप रहा था, पर वो खड़ा था।
"मैं गवाही दूँगा," जग्गा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब डर नहीं था। "मैं बताऊँगा कि तूने क्या-क्या दिया। कब दिया। कितना दिया। मैं बताऊँगा कि तूने लुट्टन को क्या दिया और वो कैसे बीमार पड़ा।"
भैरव ने जग्गा को देखा। उसके होठों पर वो पुरानी मुस्कान आई — वो मुस्कान जो वो तब दिखाता है जब उसे लगता है कि वो जीत रहा है।
"अच्छा," उसने कहा। "तो तू भी उसकी तरफ़ हो गया।"
"ना," जग्गा ने कहा। "मैं अपने पापा की तरफ़ हूँ।"
भैरव ने एक लंबी साँस ली। उसने अपने आस-पास देखा। पूरा अखाड़ा खड़ा था। हर आँख उस पर थी। मंच पर रणवीर सिंह खड़े थे, और उनकी मुट्ठी अभी भी कसी हुई थी।
और फिर भैरव ने अपना हाथ उठाया।
उसके बारह आदमी, जो अखाड़े की चारदीवारी के पास खड़े थे, आगे बढ़े। उनके हाथों में लाठियाँ थीं।
"अगर गवाही देनी है," भैरव ने कहा, "तो पहले ज़िंदा रहना पड़ेगा।"
भीड़ में हलचल मची। किसी ने चीखा। कोई भागा।
मेरी माँ की आवाज़ सबसे ऊपर आई — "वीर!"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो अपनी जगह पर खड़ी थी, गुड़िया को अपने पीछे छुपाए हुए। उनकी आँखों में डर था, पर उनकी आवाज़ में नहीं।
"जो तू कर रहा है, कर," उन्होंने कहा। "मैं तेरी माँ हूँ। मैं देख रही हूँ।"
मेरे अंदर कुछ भर गया। मैंने अपने हाथ मुट्ठी में बांधे।
और तभी, अखाड़े के फाटक पर एक आवाज़ आई।
"रुको।"
सब पलटे।
फाटक पर एक आदमी खड़ा था। उसका आधा चेहरा जला हुआ था, और उसके हाथ में एक पीली शीशी थी। वही आदमी। वही रहस्यमयी आदमी।
वो धीरे-धीरे अंदर आया। उसके कदम अखाड़े की मिट्टी में पड़ रहे थे और जैसे-जैसे वो आगे आ रहा था, भैरव के आदमियों के हाथ धीरे-धीरे नीचे हो रहे थे।
"तू?" भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो डर जैसा था। "तू यहाँ?"
वो आदमी रुका। उसने अपना जला हुआ चेहरा उठाया।
"मैं तुझे बीस साल से ढो रहा हूँ," उसने धीरे से कहा। "अब नहीं ढोऊँगा।"
और उसने वो पीली शीशी मिट्टी में गिरा दी।
शीशी गिरी, पर टूटी नहीं। वो मिट्टी पर लुढ़की और रुक गई।
भैरव ने उसकी तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया।
"ये… ये क्या है?"
"ये वो है," वो आदमी बोला, "जो तूने मुझे दिया था। बीस साल पहले। और आज मैं इसे अपने पास नहीं रखूँगा।"
वो पलटा।उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — वो चीज़ जो किसी आदमी की आँखों में तब होती है जब वो बीस साल बाद पहली बार सोचता है कि वो क्या बन गया।
"मुझे बुला," उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "मैं गवाही दूँगा। मैंने बीस साल तक ये पानी भैरव के लिए बनाया। मैं जानता हूँ इसमें क्या है। मैं जानता हूँ किसे दिया गया।"
भैरव की आँखें फट गईं।
"तू चुप रह!" वो चिल्लाया। "तू मेरा आदमी है! तू—"
"मैं तेरा आदमी कभी नहीं था," वो आदमी बोला, और उसकी आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था, बस सच था। "मैं तेरा डरा हुआ आदमी था।"
वो मेरे पास आया। उसके जले चेहरे पर मिट्टी की धूल रगड़ी हुई थी, और उसके हाथ की उँगलियाँ पतली थीं, जैसे किसी कारीगर की हों।
"मेरा नाम चंदन है," उसने कहा। "और मैंने वो पानी बनाया है जिसने इस अखाड़े के बीस साल खा लिए।"
मेरी तरफ़ देखकर उसने हाथ बढ़ाया।
"अब तू बता," उसने कहा। "मैं तेरे साथ हूँ, या तेरे सामने?"
मैंने उसका हाथ देखा। फिर मैंने भैरव की तरफ़ देखा, जिसका चेहरा अब पीला पड़ रहा था।
और मैंने उसका हाथ थाम लिया।
"मेरे साथ," मैंने कहा। "और मेरे सामने भी। क्योंकि तुझे जवाब देना पड़ेगा।"
चंदन ने मेरी आँखों में देखा। उसके जले होंठ काँपे। फिर उसने सिर हिलाया।
"हाँ।"
भैरव ने एक कदम पीछे हटाया। उसने अपने आदमियों की तरफ़ देखा, पर वो कोई नहीं हिला। उनके हाथों की लाठियाँ नीचे झुक गई थीं।
"तुम सब!" भैरव चिल्लाया। "मैं तुम्हें पैसे देता हूँ! मैं तुम्हारे बच्चों को खाना देता हूँ!"
कोई नहीं बोला।
और फिर भैरव ने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
वो मिट्टी में घुटनों के बल गिर गया।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट रही थी। "वीर, मैं तेरे पापा का शिष्य था। मैंने उन्हें अपना गुरु माना था। एक बार मैंने कहा था कि मैं उनके नाम को आगे बढ़ाऊँगा।"
उसने अपने हाथ जोड़े।
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