Spirit of a Fighter9 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 9

6 min read November 5, 2026

दरवाज़ा खुला। और मीरा उतरी।

छोटे बाल। कुर्ता-सलवार। कंधे पर किताबों का बैग। हाथों में औषधियों की गंध — अदरक, तुलसी, काली मिर्च। इतनी दूर से भी मेरी नाक पहचान गई।

वो आई। मेरे सामने आकर रुकी। और वो ऐसे देख रही थी जैसे मैं कोई किताब हूँ जिसका वो कोई ख़ास पन्ना ढूँढ रही है।

"तुम यहाँ क्यों बैठे हो?"

"नहर है। बैठने से मना है क्या?"

"मना नहीं है।" उसने बैग नीचे रखा। "पर तुम घर जाते हो न दोपहर में? माँ के पास?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो जानती है मेरी माँ है। कैसे? किसने बताया? फिर याद आया — गुड़िया। गुड़िया ने कल कुएँ पर मीरा को सब कुछ बता दिया होगा। मेरी बहन का मुँह पर पहरा नहीं है।

"काम था," मैंने कहा।

"क्या काम?"

"मज़दूरी। बोरी ढोई।"

वो मेरे पास बैठ गई। इतनी पास कि मैं उसके कुर्ते पर लगी सिलाई देख सकता था। हाथ में उसने एक छोटी डिब्बी निकाली — काँच की, लाल ढक्कन।

"कंधा दिखाओ।"

"क्या?"

"कंधा। वो जिस पर लाठी लगी थी। भैरव की लाठी।"

मैं पीछे हटा। "ये तुम्हें किसने बताया?"

"गुड़िया ने। सुबह स्कूल जाते वक़्त मिल गई थी। बोली — भैया ने बैंडेज तो बाँध लिया, पर मुझे पता है अंदर से पक रहा है।" मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "उसकी आँखें ऐसी थीं जैसे वो रोई हो। तो मैं आई। कंधा दिखाओ।"

"तुम डॉक्टर नहीं हो।"

"मैं आयुर्वेद पढ़ती हूँ।" उसने कहा। "और ये मार-पीट का घाव है, डिप्लोमा नहीं माँगता। कंधा दिखाओ, वरना मैं गुड़िया को बोल दूँगी कि तुमने मना कर दिया — फिर वो दिन भर रोएगी।"

मेरा गुस्सा जाता रहा। मैंने बनियान का पट्टा खोला। पट्टी खोलते वक़्त चेहरा बन गया।

वो पास आई। उसने कपड़ा हटाया। उसकी उँगलियाँ ज़ख़्म के चारों तरफ़ फिरीं — हल्की, ठंडी। मैंने साँस रोक ली।

"हल्दी लगाई है?"

"माँ ने।"

"अच्छा किया।" उसने डिब्बी खोली। अंदर एक मोटा लेप था, भूरा। "ये मैंने खुद बनाया है। इसमें नीम, हल्दी और थोड़ा कपूर है। जलन कम होगी।"

उसने लेप लगाया। ठंडा था। और जैसे ही लगा, मेरे कंधे की जलन कुछ कम हुई। मैंने साँस छोड़ी।

"अच्छा लगा?"

"हाँ।"

"बोलो और।"

"क्या?"

"अच्छा लगा, मैडम।" उसने कहा। और उसकी आवाज़ में हल्की हँसी थी।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मुस्कुरा रही थी। पहली बार। और उस मुस्कान में वो ज़िद नहीं थी जो कल थी। कुछ और था। कुछ जो मैंने पहले किसी के चेहरे पर नहीं देखा था।

"मैडम," मैंने कहा। "अच्छा लगा।"

वो हँसी। छोटी हँसी। फिर चुप हो गई। और उसने पट्टी बाँधनी शुरू की।

तभी उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे:

"तुम वही हो न, जो कल रात अखाड़े की दीवार पर चढ़ा था?"

मेरा दिल एक पल को रुक गया।

कैसे पता? किसने बताया? क्या भैरव ने बता दिया? क्या लुट्टन ने? वो मुझे अभी ढूँढ रहा होगा। क्या मीरा उन्हीं के साथ है?

मेरा पूरा शरीर अकड़ गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मेरी आँखों में वो शक आ गया जो मैं छुपा नहीं सका।

मीरा ने मेरी आँखें देखीं और उसकी उँगलियाँ पट्टी बाँधते-बाँधते रुक गईं।

"अरे," वो धीरे से बोली। "तुम्हारी आँखों में वो भाव क्यों आ गया? जैसे तुम सोच रहे हो कि मैं भैरव की आदमी हूँ।"

मैं चुप रहा।

"बोलो।"

"तुम्हें कैसे पता कि मैं दीवार पर चढ़ा था?"

"क्योंकि मैंने देखा।" उसने कहा। "मैं कल रात अखाड़े में थी। पापा के कमरे में। रिकॉर्ड देख रही थी। और खिड़की से बाहर देखा तो एक परछाई दीवार पर थी। फिर गायब हो गई।"

"तो तुमने मुझे पहचाना कैसे?"

"तेरी चप्पल।" उसने कहा। "तेरे पैरों में वही चप्पल थी जो रात में दीवार पर दिखी थी। और अब भी वही है।"

मेरी नज़र अपने पैरों पर गई। टूटी चप्पल। मेरी माँ ने कई बार सिलने की बात कही थी।

मैंने सिर नीचे कर लिया। शर्म आई। ऐसी शर्म जो गरीबी में पलती है, जब कोई तुम्हारी सबसे छोटी चीज़ से तुम्हें पहचान ले।

"सॉरी," मीरा ने कहा। "मुझे ऐसे नहीं कहना चाहिए था। चप्पल की बात।"

"सच है।" मैंने कहा। "चप्पल टूटी है। तो क्या?"

"तो कुछ नहीं।" उसने पट्टी पूरी बाँधी। "बस मैं कह रही थी कि मैंने तुम्हें पहचाना। कल रात। दीवार पर।"

वो पीछे हटी। मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो शक नहीं था जो मेरी आँखों में था। उसकी आँखों में कुछ और था। कुछ जो कह रहा था — मैं तुमसे डरती नहीं, पर मैं तुम पर भरोसा भी नहीं करती।

"एक बात पूछूँ?" उसने कहा।

"पूछो।"

"तुम कल रात अखाड़े में क्यों आए थे? दीवार पर चढ़कर क्या देख रहे थे?"

मैंने सोचा। क्या बताऊँ? कि मैं रोज़ आता हूँ? कि मैं दीवार के छेद से कुश्ती देखता हूँ? कि ये मेरा सपना है, और सपना देखने के लिए मुझे किसी की इजाज़त नहीं चाहिए?

पर मैंने कुछ और कहा।

"रामदीन को।"

वो चौंकी। "क्या?"

"मैं कल रात कुएँ की तरफ़ जा रहा था। रामदीन से बात करनी थी। पर दीवार पर चढ़ा तो देखा — भैरव वहाँ खड़ा था। कुएँ के पास। और वो किसी से बात कर रहा था।"

"किससे?"

"पता नहीं। अंधेरा था। पर उसकी आवाज़ भैरव की नहीं थी। कोई और था।"

मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।

"क्या बात हो रही थी? सुनाई दिया?"

"थोड़ा।" मैंने कहा। "भैरव बोल रहा था — 'कल सुबह तक सब तय हो जाएगा। वो लड़का बहुत बोलने लगा है। मीरा भी उसके साथ घूम रही है। दोनों को एक साथ निपटाना पड़ेगा।'"

मीरा सुन्न होकर बैठी रही।

"वो लड़का मैं हूँ," मैंने कहा। "और तुम हो मीरा। भैरव कल सुबह सिर्फ़ जवाब नहीं देने वाला। वो सबके सामने कुछ और करने वाला है।"

मीरा ने अपनी बैग की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आवाज़ स्थिर थी।

"तो कल सुबह हमें उससे पहले वहाँ पहुँचना होगा।"

"कैसे?"

"रिकॉर्डिंग है मेरे पास।" उसने कहा। "दो जगह भेज दी है। एक पुलिस वाले को, एक अखबार वाले को। वो सुबह आएँगे। पर हमें सबूत भी चाहिए — बोतलें, कागज़, और रामदीन की गवाही।"

"रामदीन ऊपर आया?"

"कालू काका ने रस्सी डाली थी। पर वो अभी कमज़ोर है। बोल नहीं पाया। बस इतना कहा — 'पानी।'"

मेरी छाती भर आई।

"तो कल सुबह," मीरा ने कहा। "मैं पापा को लाऊँगी। तुम कालू काका को। और टिंकू को बोलो वो सबको साथ लाए।"

"सबको?"

"पूरे गाँव को।" उसने कहा। "भैरव ने कहा है सबके सामने जवाब देगा। ठीक है। सबके सामने ही होगा। पर सवाल हमारे होंगे।"

वो उठी। बैग उठाया। और जाने लगी।

फिर रुकी। पलटी।

"एक बात कहूँ?"

"कहो।"

"तुम्हारी आँखों में जो चीज़ है — वो मैंने पहले किसी में नहीं देखी।" उसने कहा। "तुम डरते हो, पर तुम चुप नहीं रहते। तुम डर के बावजूद सवाल पूछते हो। ये आसान नहीं है।"

वो चली गई। कार स्टार्ट हुई। धूल उड़ी।

मैं वहीं बैठा रहा। कंधे पर पट्टी ठंडी थी। और मेरी आँखों में पानी था — ये पहली बार किसी ने मेरी चुप्पी को ताकत कहा था, गूँगापन नहीं।

घर पहुँचा तो शाम हो चली थी। आँगन में गुड़िया बैठी थी, स्कूल की कॉपी खोले। माँ चक्की पर थी।

मैंने गुड़िया के पास बैठकर कहा, "कल सुबह तुझे स्कूल नहीं जाना।"

"क्यों?"

"अखाड़े चलना है।"

उसकी आँखें चमक गईं। "भैया, तू लड़ेगा?"

"नहीं।" मैंने उसका सिर सहलाया। "पर जो लड़ेगा, उसे तू देखेगी।"

गुड़िया ने कॉपी बंद की। "मैंने प्रार्थना में कहा था — भैया को पहलवान बना दे।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho