Spirit of a Fighter8 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 8

7 min read November 5, 2026

सरस्वती ने थैली देखी। उसकी उँगलियाँ काँपीं। उसने पलटकर दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ गुड़िया सो रही थी।

और फिर उसने थैली को हाथ में नहीं उठाया।

बिना मेरी तरफ़ देखे, धीरे से बोली।

"जो काम डर से छुपाकर किया जाए, वो कभी पूरा नहीं होता, बेटा।"

मेरे हाथ से थैली फिसल गई।

मिट्टी आँगन में बिखर गई। लाल।

॥

मैं झुककर थैली उठाने लगा, पर उँगलियाँ काम नहीं कर रही थीं। मिट्टी के छोटे-छोटे ढेले आँगन में फैल गए थे, और लालटेन की पीली रोशनी में वो लाल मिट्टी और भी लाल लग रही थी।

मैंने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई। उँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल गई।

"माँ।"

वो चक्की पर बैठी थी, हाथ आटे में। मेरी तरफ़ नहीं देखा।

मैं उसके पैरों के पास बैठ गया। घुटने ज़मीन पर, कंधा जल रहा था, और दिल में कुछ ऐसा भारी था जो रोने से भी नहीं हल्का होता।

"माँ, मैं कुछ पूछूँ?"

"पूछ।"

"तू रोज़ खाने में नमक कम क्यों डालती है?"

चक्की रुकी। बस एक पल के लिए। फिर फिर चलने लगी।

"कहाँ से आया ये सवाल?"

"बस। दो महीने से खा रहा हूँ। हर दिन वही। दाल में नमक कम, साग में नमक कम। तू अच्छी रसोइया है, माँ। तू भूलती नहीं। फिर?"

सरस्वती ने चक्की का हत्था छोड़ दिया। हाथ झाड़े। आटा उड़ा। वो पलटी, और उसकी आँखें मेरी आँखों पर टिक गईं।

"तू बड़ा हो गया है," वो बोली। "सवाल बड़े पूछता है अब।"

"माँ।"

"नमक कम डालती हूँ क्योंकि नमक महँगा है।" उसने कहा। "और ये भी सच है कि तेरे पापा जब ज़िंदा थे, तब भी कम डालती थी। तब भी महँगा था।"

वो मुस्कुराई। ऐसी मुस्कान जो होंठों पर आकर रुक जाती है, आँखों तक नहीं पहुँचती।

"अब सो जा। सुबह जल्दी उठना है। बोरी ढोनी है न?"

वो उठी, चक्की का हत्था फिर पकड़ा, और चलने लगी। और मैं वहीं बैठा रहा, मिट्टी हाथ में, ये सोचते हुए कि माँ के पास हर सवाल का एक जवाब होता है, पर कुछ जवाब ऐसे होते हैं जो सवाल से भी बड़े होते हैं।

रात भर मेरा कंधा जलता रहा। करवट बदलता तो दर्द उठता। आँख लगी तो सपने में वही कुआँ आया — अंधेरा, गीला, और नीचे से कोई पानी माँग रहा है। मैं जवाब देने की कोशिश करता हूँ, पर मेरी आवाज़ कुएँ में गिरती है और लौटकर नहीं आती।

सुबह माँ ने उठाया। कंधे पर हल्दी का लेप लगा दिया, ऊपर से कपड़ा बाँध दिया।

"आज मत जा।"

"जाना है।"

"कंधा।"

"कंधा ठीक है, माँ। हाथ ठीक है। बोरी उठाने में कंधा नहीं लगता, कमर लगती है।"

वो कुछ नहीं बोली। बस मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कह रही हो — तू बड़ा ज़िद्दी हो गया है, और ये ज़िद तुझे ले डूबेगी।

बाज़ार में सुबह आठ बजे से ही रौनक लग जाती है। मंडी से आने वाली बोरियाँ, ठेलों की आवाज़, तरकारी वालों की चिल्लाहट। मुझे महाजन की दुकान पर बोरी उतारनी थी — गेहूँ की बोरियाँ, चावल की, और कुछ बोरियाँ ऐसी जिन पर कुछ लिखा नहीं था पर जिनसे दाल की गंध आ रही थी।

मैं दोपहर तक लगा रहा। पसीना आँखों में जा रहा था, कंधे की पट्टी गीली हो गई थी, और पीठ पर एक जगह ऐसी थी जहाँ लगता था कोई सुई घुसी है।

फिर मैंने सुना। अखाड़े के गेट के पास।

लुट्टन खड़ा था। अखाड़े की वर्दी में — बनियान, धोती, और कमर पर एक पट्टा जिस पर अखाड़े का नाम लिखा था। मोटा-तगड़ा, छोटी मूँछें, और चेहरे पर वो भाव जो सिर्फ़ उन लोगों के होते हैं जिन्हें किसी और की ताकत से अपनी ताकत लगने लगती है।

उसके सामने चार-पाँच लड़के खड़े थे। छोटे, दुबले, किसी की चप्पल टूटी थी, किसी की कमीज़ में छेद। सबकी आँखों में वही बात — अखाड़े में घुसने की उम्मीद।

"सुनो सब," लुट्टन बोला, और उसकी आवाज़ में भैरव वाली मिठास नहीं थी, सिर्फ़ सख्ती थी। "ये भैरव सर का अखाड़ा है। यहाँ सिर्फ़ उनके बोले से घुसना। जो अपने मन से घुसा, वो बाहर निकला नहीं, उठाया गया। समझे?"

लड़के सिर हिला रहे थे।

"और एक बात।" लुट्टन ने एक लड़के का कंधा थपथपाया, जैसे भाई का कंधा थपथपाते हैं। "अखाड़े में आए हो तो सर का पानी पीना। जो पीता है वो सर का, जो नहीं पीता वो… समझदार हो तो खुद निकल जाओ।"

मेरा पेट कड़ा हो गया।

वो पानी। वो कड़वाहट। और ये लड़के — इनकी उम्र क्या होगी? सोलह? सत्रह? इनके हाथों में अभी छाले नहीं पड़े, इनकी आँखों में अभी सपने ताज़े हैं। और ये लोग इन्हें वही पिलाने वाले हैं जो मेरे पापा ने पिया था।

मेरी मुट्ठी अपने आप भर गई। पैर अपने आप आगे बढ़ने लगे। और फिर मैं रुक गया।

क्योंकि माँ की बात कान में बजी — "जो काम डर से छुपाकर किया जाए, वो कभी पूरा नहीं होता।" और मैंने सोचा, अगर मैं अभी चिल्लाकर सबको बता दूँ, तो क्या होगा? लुट्टन मुझे पीटेगा। भैरव को खबर जाएगी। और कल सुबह का वो "सबके सामने जवाब" वाला प्लान बिखर जाएगा।

सबूत पहले। सच बाद में। यही मीरा ने कहा था, और यही पापा ने अपनी चुप्पी से कहा था।

मैंने बोरी उठाई। भारी थी। कंधे पर रखी और चल दिया।

लुट्टन की नज़र मुझ पर पड़ी। मैं जानता हूँ कैसे पड़ी — क्योंकि मेरी गर्दन पर वो नज़र ऐसे लगती है जैसे कोई उँगली से छू रहा हो।

"अरे।" उसने आवाज़ दी। "तू। बोरी वाला।"

मैं रुका। पलटा।

वो आया। पास। और उसके पसीने की गंध मेरी नाक में घुसी — और उस गंध में वो हल्की कड़वाहट थी। बहुत हल्की। पर थी। मुझे पता चल गया कि लुट्टन भी उस पानी का एक घूँट कभी पी चुका है। मेरा दिल धक्क से रह गया।

"तू रोज़ अखाड़े की उस दीवार के पास क्यों खड़ा रहता है?" उसने आँखें सिकोड़कर कहा। "मैंने तुझे कई बार देखा है। सुबह-सुबह। दीवार से चिपका हुआ।"

मेरा गला सूख गया। पर मैंने आवाज़ नहीं बदली।

"रास्ता है।"

"रास्ता?"

"हाँ। बाज़ार जाने का रास्ता। वहीं से जाता हूँ।"

"अच्छा।" वो मुस्कुराया, और वो मुस्कान अच्छी नहीं थी। "रास्ता।"

वो एक कदम और पास आया। उसकी छाती मेरी छाती से लगभग छू रही थी। उसने धीरे से कहा, इतने धीमे कि बस मैं सुन सकूँ।

"सुन, तू जो भी है। भैरव सर को पता चला कि कोई उनके अखाड़े की दीवार पर नज़र रखता है, तो वो तेरी हड्डी-हड्डी अलग कर देंगे। और मैं उसमें उनका हाथ बनूँगा। समझा?"

मेरी मुट्ठी भरी रही। कंधा जल रहा था। और अंदर कुछ ऐसा उबल रहा था जो मुँह से बाहर आना चाहता था — कि तू मेरे पापा का कातिल है, कि तू उस पानी को जानता है, कि तेरी गंध में भी वो ज़हर है, और तू खुद जानता है।

पर मैंने मुँह नहीं खोला।

बस उसकी आँखों में देखा। एक पल। दो पल। इतना कि वो असहज हो जाए। और फिर मैंने बोरी कंधे पर सँभाली, और चल दिया।

पीछे से उसकी हँसी आई। "गूँगा है क्या? बोलता नहीं।"

मैं नहीं रुका।

पर अंदर से मैं मुस्कुराया। क्योंकि लुट्टन को नहीं पता था — मैं गूँगा नहीं था। मैं चुप था। और चुप्पी में वो सब था जो वो बोलकर कभी नहीं कह सकता।

दोपहर में मैंने तीन बोरियाँ और उतारीं। महाजन ने गिनकर पैसे दिए — इकहत्तर रुपये। मैंने मुट्ठी में दबाए और सीधा नहर की तरफ़ चल दिया।

नहर का किनारा मेरा जगह था। वहाँ घास लंबी उगती है, और पानी की आवाज़ सब कुछ ढँक लेती है। मैं वहाँ बैठकर जब भी कुछ सोचता, सोच सुलझ जाती।

पर आज बैठने से पहले ही मैंने गाड़ी की आवाज़ सुनी।

एक सफ़ेद कार। नहर के किनारे वाली मिट्टी की सड़क पर आकर रुकी। धूल उड़ी और मेरी आँखों में गई।

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