Spirit of a Fighter – Chapter 7
"मैं सूँघ सकता हूँ।" ये पहली बार था जब मैंने किसी को अपनी शक्ति के बारे में सीधे बताया। "तू जो पानी पिलाता है, उसकी गंध बदल जाती है। पीने वाले की पसीने की गंध बदल जाती है। तेरी भी बदली है। तूने भी पिया है ना? बहुत साल पहले।"
भैरव का हाथ काँपा। लाठी हिली।
"तू झूठ बोल रहा है।"
"मैं झूठ नहीं बोलता।" मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। "मैं सूँघता हूँ। और मुझे पता है — तेरी गंध में वही कड़वाहट है। तूने खुद पीया है। तू खुद बीमार है।"
भैरव ने मेरी तरफ़ लाठी घुमाई।
"चुप!"
पर उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था। वो डरा हुआ था। पहली बार मैंने उसमें डर देखा।
और उसी पल, दीवार के पीछे से एक आवाज़ आई।
"भैरव सिंह!"
मीरा थी। हाथ में मोबाइल। स्क्रीन चमक रही थी — रिकॉर्डिंग चल रही थी।
"तीसरी बार।" उसने आगे बढ़ते हुए कहा। "मैंने तीन बार रिकॉर्ड किया है। इस बार सब साफ़ है।"
भैरव पलटा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मीरा… तू… तू यहाँ?"
"मैं हर जगह हूँ जहाँ तू होता है।" मीरा ने मोबाइल ऊपर उठाया। "अब बोल — रामदीन को क्यों बंद किया? वो पानी क्या है? कितने पहलवानों को—"
भैरव ने लाठी उठाई।
मैंने बीच में छलाँग लगाई।
लाठी मेरे कंधे पर पड़ी। ज़ोर से। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। घुटने झुके।
पर मैं गिरा नहीं।
"भागो!" मैंने मीरा को चिल्लाकर कहा। "रिकॉर्ड लेकर भागो!"
मीरा ने एक पल नहीं सोचा। वो भागी। कुएँ के पीछे से, दीवार की तरफ़।
भैरव मेरे ऊपर झुका। उसकी साँस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। कड़वी। बीमार।
"तूने अपनी किस्मत खुद लिखी है, वीर सिंह।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। दर्द कंधे में फैल रहा था। पर मैं मुस्कुराया।
"और तूने अपनी किस्मत बीस साल पहले लिखी थी। जब तूने पहली बार वो पानी पिया।"
भैरव का हाथ फिर उठा।
पर तभी दूर से आवाज़ आई। कई पैरों की। भागते हुए।
"भैया!"
गुड़िया।
और उसके पीछे — टिंकू। और टिंकू के पीछे — कालू काका। हाथ में लाठी।
और उनके पीछे, सबसे पीछे, धूल उड़ाती हुई एक व्हीलचेयर।
रणवीर सिंह।
भैरव ने लाठी नीचे की। उसका चेहरा बदला। वो पीछे हटा।
रणवीर सिंह की आवाज़ आई। धीमी। भारी। पर गरजती हुई।
"भैरव। बीस साल हो गए। अब भी वक़्त है।"
भैरव ने चारों तरफ़ देखा। गुड़िया मेरे पास दौड़कर आई। मेरा हाथ पकड़ा। उसकी आँखों में पानी था।
टिंकू मेरे आगे खड़ा हो गया। हाथ में मिठाई की डिब्बी। जैसे ढाल।
"भैया," गुड़िया ने फुसफुसाया। "मैंने माँ को बता दिया। उन्होंने रणवीर सिंह जी को बुलाया।"
रामदीन की आवाज़ कुएँ से आई। फिर। इस बार साफ़।
"भैरव!" वो चिल्लाया। "अब भी मौका है। सब बता दे।"
भैरव खड़ा रहा। लाठी उसके हाथ में थी, पर हाथ काँप रहा था। उसने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर कुएँ की तरफ़।
"अच्छा," उसने धीरे से कहा। "अच्छा।"
उसने लाठी नीचे की।
"कल सुबह।" वो बोला। "अखाड़े में। सबके सामने। जो कहना है, कह लेना।"
वो पलटा। जाने लगा।
फिर रुका। पलटा। मेरी तरफ़ देखा।
"वीर सिंह।" उसने कहा। "तेरी नाक अच्छी है। पर नाक से सिर्फ़ गंध आती है। सच नहीं। सच के लिए सबूत चाहिए।" उसने लाठी उठाई और कंधे पर रखी। "कल ले आना। अपने सबूत।"
वो गया।
मैं वहीं घुटनों पर बैठ गया। कंधे में दर्द फैल रहा था। गुड़िया ने मेरा सिर पकड़ा।
"भैया, तू ठीक है?"
"हाँ।"
टिंकू ने डिब्बी खोली।
"बर्फ़ी खा। इससे ताकत आएगी।"
"टिंकू, अभी मरहम चाहिए, बर्फ़ी नहीं।"
"बर्फ़ी में घी है। घी मरहम का काम करता है।" उसने बर्फ़ी मेरे मुँह में ठूँस दी।
मैं हँसा। दर्द के बीच भी। हँसी इस बार गले से निकल आई।
मीरा लौटी। मोबाइल हाथ में। उसकी साँस अभी भी तेज़ थी।
"रिकॉर्डिंग सेफ़ है।" उसने कहा। "मैंने दो जगह भेज दी है।" वो मेरे पास बैठी। "तूने मेरे लिए लाठी खाई।"
"तूने मेरे लिए रिकॉर्ड किया।"
मीरा ने मेरे कंधे की तरफ़ देखा। उसने उँगली हल्की सी लगाई और मैंने दाँत भींच लिए।
"सूज गया है," वो बोली। "डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा।"
"कल सुबह से पहले नहीं।"
"वीर—"
"मीरा, कल सुबह सबके सामने जवाब देना है। डॉक्टर मुझे ठीक करेगा या सबूत?"
वो चुप हो गई। पर उसकी आँखों में जो था, वो चुप नहीं था।
तभी रणवीर सिंह की व्हीलचेयर मेरे पास आई। पहिए धूल में दबे हुए थे। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। हाथ भारी था, पर गर्म।
"बेटा," उन्होंने कहा। "तेरे पिता ने भी एक बार मेरे लिए लाठी खाई थी। उस दिन मैंने कहा था — ये लड़का पहलवान नहीं, दीवार है।" उन्होंने रुककर मेरी आँखों में देखा। "आज तूने वो दीवार बनके दिखा दिया।"
मेरा गला भर आया। मैंने नज़र नीचे कर ली, क्योंकि अगर उनकी आँखों में देखता रहा, तो आवाज़ निकलती ही नहीं।
कालू काका ने कुएँ की तरफ़ जाकर आवाज़ दी। "रामदीन! ऊपर आ जा। अब डरने की ज़रूरत नहीं।"
कुएँ से रस्सी की आवाज़ आई। धीमी। थकी हुई।
मैं उठा। घुटने अभी भी काँप रहे थे। गुड़िया ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा। उसकी उँगलियाँ छोटी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"भैया," उसने फुसफुसाया। "तेरा कंधा लाल हो गया है।"
"पता है।"
"दुख रहा है?"
"नहीं।"
"झूठा।" उसने मेरी कलाई में नाखून गड़ाया। "माँ कहती है जब तू दुख छुपाता है, तेरी आँखें ऐसे हो जाती हैं जैसे बारिश से पहले आसमान।"
मैं हँस पड़ा। इतनी छोटी बच्ची, और बातें कैसी करती है।
घर पहुँचते-पहुँचते रात हो गई थी। आँगन में लालटेन जल रही थी। सरस्वती चक्की पर बैठी थी। कमर पकड़े हुए। मैंने देखा — उसकी उँगलियाँ कमर पर दब रही थीं, और आँखें बंद थीं। दर्द छुपाने वाला वो चेहरा, जो सिर्फ़ माँ के चेहरे पर होता है — जब वो चाहती है कि कोई न पूछे।
मेरे पैर की आहट सुनकर उसने आँखें खोलीं। और फिर वो हुई, जो रोज़ होती थी। चक्की तेज़ चलने लगी। हाथ तेज़। कमर का दर्द गायब। जैसे माँ कोई मशीन हो जो बेटे को देखकर चालू हो जाती है।
मैं उसके पास गया। बैठ गया। कुछ नहीं बोला।
वो बोली, "खाना रखा है। ठंडा हो गया तो गरम कर लेना।"
"माँ।"
"हाँ।"
"तूने रणवीर सिंह जी को बुलाया?"
चक्की धीमी हुई। फिर रुक गई। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"गुड़िया ने आकर रोते हुए बताया कि भैया अखाड़े में अकेले खड़ा है और भैरव सिंह लाठी लेकर गया है।" उसने अपने हाथ देखे। आटे से सफ़ेद। "मैं क्या करती? मेरे पास फ़ोन था। कालू काका का नंबर था। मैंने बस बोल दिया।"
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया कि तू जानती थी?"
वो चुप रही। चक्की फिर चलने लगी। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। चक्की रुकी।
"माँ, तू जानती थी न? भैरव के बारे में। पापा के बारे में। उस पानी के बारे में।"
उसकी आँखों में पानी आया। पर एक बूँद भी नहीं गिरी। जैसे सालों से उसने आँसू पीना सीख लिया हो।
"मैं तेरे पापा को बहुत रोका था," वो धीरे से बोली। "उस दिन भी। पर वो बोले थे — सरस्वती, अगर मैं चुप रहा तो मेरा बेटा भी चुप रहेगा। और मैं नहीं चाहता मेरा बेटा चुप रहे।"
मेरा गला जाम हो गया।
"तो पापा जानते थे?"
"वो सब जानते थे।" उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "पर सबूत नहीं था। सिर्फ़ नाक थी। और नाक अदालत में नहीं चलती।"
मैंने थैली निकाली। गुड़िया की वो छोटी थैली। लाल मिट्टी भरी हुई, जो उसने अखाड़े की दीवार से चुपके से ली थी। मैंने सरस्वती के सामने रख दी।
"ये गुड़िया ने दी। बोली — इससे तेरे हाथ मज़बूत होंगे।"
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