Spirit of a Fighter – Chapter 10
"भगवान ने क्या कहा?"
"कुछ नहीं। पर मुझे लगता है वो सुन रहे हैं।"
मैं हँसा। और पहली बार, कई दिनों बाद, मेरी हँसी अंदर से आई।
माँ ने पीछे से कहा, "खाना खा लो। कल का दिन लंबा होगा।"
मैं उठा। माँ के पास गया। उसके पैर छुए।
वो रुकी। चक्की का हत्था छोड़ा। मेरे सिर पर हाथ रखा। और धीरे से बोली:
"कल जब खड़ा हो, तो याद रखना — तेरे पापा भी वहीं खड़े होंगे। तेरे पीछे।"
मैंने सिर हिलाया। गला भरा हुआ था।
रात को मैंने अपनी चप्पल सिली। सुई नहीं थी, तो धागे से बाँध दिया। कंधे की पट्टी बदली। और सुबह की तैयारी में सिक्कों की पोटली जेब में रखी।
सुबह चार बजे माँ की चक्की चलने लगी। मैं आँख खोलकर बैठ गया।
आज वो दिन था। आज भैरव सिंह को जवाब देना था।
और तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
इतनी सुबह कौन?
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर टिंकू खड़ा था। हाँफ रहा था। उसकी टोपी गिरी हुई थी, और हाथ में एक काग़ज़ था जो काँप रहा था।
"भाई," वो बोला। "ये… ये अभी-अभी मेरी दुकान के नीचे से मिला। किसी ने फेंका है।"
मैंने काग़ज़ लिया। खोला।
उस पर बस एक लाइन लिखी थी, कोयले से, मोटे अक्षरों में।
"आज अखाड़े में जो भी बोलेगा, वो ज़िंदा नहीं बचेगा।"
और मेरे पीछे से माँ की आवाज़ आई, चक्की रुकी हुई, आँगन में सन्नाटा:
"वीर। ये क्या है?"
॥
माँ की आवाज़ सुनकर मेरे हाथ से वो काग़ज़ गिरते-गिरते बचा। मैंने उसे पलट दिया, कोयले की कालिख उँगली पर लग गई।
"कुछ नहीं माँ," मैंने कहा। "टिंकू कोई पुराना बिल लेकर आया है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें काग़ज़ पर टिकी थीं, फिर मेरे चेहरे पर। वो कुछ नहीं बोलीं, बस चक्की का हत्था फिर पकड़ लिया। पर चक्की नहीं चली। हत्था पकड़े वो वैसे ही बैठी रहीं।
टिंकू को मैंने बाहर खींच लिया। दरवाज़े के पास, नीम के पेड़ के नीचे।
"किसने फेंका?"
"क्या पता भाई।" टिंकू ने टोपी उठाकर सिर पर रखी, फिर फिर उतार दी। "सुबह दुकान खोलने गया, तो शटर के नीचे से ये निकला। मैंने आस-पास देखा — कोई नहीं। सिर्फ़ एक चीज़ और थी।"
"क्या?"
"एक टूटी चप्पल।" टिंकू ने धीरे से कहा। "एक ही। दुकान के पीछे, कूड़े के ढेर पर।"
मेरे पेट में ठंडी सी लहर दौड़ी। मैंने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा।
"वो चप्पल मत छूना। वैसी ही रहने देना।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल सुबह जो आएगा, उसे ये भी दिखाना है।"
टिंकू ने मेरी आँखों में देखा। उसका मुँह खुला रह गया। "भाई, तू… तू डरा हुआ नहीं है?"
मैंने सोचा। सच बोलूँ तो पेट में जो ठंडी लहर थी, वो कहीं गई नहीं थी। उल्टी ही बढ़ रही थी।
"डरा हुआ हूँ," मैंने कहा। "पर ये डर आज काम का नहीं है। आज काम का है — तू जाकर सुक्खी बुआ को उठा।"
"सुक्खी बुआ को?" टिंकू की आँखें बड़ी हो गईं। "भाई, वो तो पूरे गाँव में बात कर देगी।"
"वही तो चाहिए।" मैंने कहा। "जो काग़ज़ कोई अकेले में फेंककर आया है, वो सबके सामने आने से डरता है। तो सुक्खी बुआ से बड़ा मुँह कोई नहीं।"
टिंकू ने सिर झुकाया, फिर खड़ा हो गया, टोपी ठीक की, और भागा। उसके जाने के बाद मैं आँगन में लौटा।
माँ अब भी चक्की के पास बैठी थीं। गुड़िया जाग गई थी और दरवाज़े से झाँक रही थी।
मैं माँ के पास बैठ गया। उनके घुटने पर हाथ रखा।
"माँ, वो काग़ज़ कोई धमकी है। पर वो मुझे डराने के लिए नहीं आया है — वो खुद डरा हुआ है। जो आदमी सबके सामने जवाब देने की बात कह चुका है, वो रात में चोरी-छुपे काग़ज़ फेंकता है। इसका मतलब वो जानता है कि सुबह उसका पत्ता कटने वाला है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत कम देखी थी।
"तेरे पापा ने भी ऐसी बात कही थी," वो बोलीं। "उस रात। जब वो अखाड़े से लौटे थे। उन्होंने कहा था — 'सरस्वती, आज मैंने भैरव की आँखों में डर देखा। और जो आदमी डरा हुआ हो, वो सबसे खतरनाक होता है।'"
मैं चुप हो गया।
"फिर तेरे पापा कभी लौटकर वो बात पूरी नहीं कर पाए," माँ ने धीरे से कहा। "तीन दिन बाद बुखार आया। फिर वो उठे ही नहीं।"
गुड़िया ने पीछे से कहा, "माँ, भैया को मत जाने दो।"
मैं पलटा। गुड़िया की आँखें भरी हुई थीं, पर उसका जबड़ा कसा हुआ था। बारह साल की लड़की में इतनी ज़िद मैंने कहीं नहीं देखी।
"गुड़िया," मैंने कहा। "आज अगर मैं नहीं गया, तो कल कोई और जाएगा। और वो कोई और पापा जैसा होगा — जो सच जानकर भी चुप रह जाएगा। तू चाहती है कि और एक घर सूना हो?"
गुड़िया ने होंठ काटे। फिर वो मेरे पास आई, मेरी जेब में हाथ डाला, और एक छोटी थैली निकाली। लाल मिट्टी से भरी।
"ये कब की?"
"रोज़ भरती हूँ," उसने कहा। "नई। पुरानी फेंक देती हूँ।"
मैंने उसे गले लगा लिया। उसका शरीर काँप रहा था। मैंने उसे कसकर पकड़ा।
"तू आज अखाड़े में मेरे पीछे खड़ी रहेगी," मैंने कहा। "और अगर मैं कहीं फँस जाऊँ, तो ज़ोर से चिल्लाना — 'भैया, पीछे!'"
"ऐसे ही?"
"ऐसे ही। मैं तेरी आवाज़ पहचानता हूँ।"
वो हँसी। आँसू के साथ हँसी। और माँ ने दोनों को देखकर अपनी आँखें फेर लीं।
सूरज निकल रहा था। आसमान में लाली थी।
मैंने स्नान किया, धोती पहनी, कंधे की पट्टी बदली। सिक्कों की पोटली और दोनों थैलियाँ जेब में रखीं। और जब मैं दरवाज़े पर पहुँचा, तो माँ वहाँ खड़ी थीं।
उनके हाथ में एक छोटी-सी गठरी थी। खोली तो अंदर पुरानी धोती की पट्टी थी, लाल मिट्टी में रंगी हुई।
"ये तेरे पापा की थी," वो बोलीं। "जिस दिन वो पहली बार अखाड़े में उतरे थे, उन्होंने इसे कमर पर बाँधा था। बाद में कभी नहीं खोला।"
मैंने वो पट्टी हाथ में ली। उसमें पसीने की पुरानी गंध थी। मिट्टी की गंध थी। और उसके नीचे, बहुत नीचे, कहीं दबी हुई, एक और गंध थी — बहुत हल्की, बहुत पुरानी। जैसे किसी कड़वी चीज़ का बहुत पुराना साया।
मेरी साँस रुक गई।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "पापा ने ये पहनकर कुश्ती लड़ी थी?"
"हाँ। उसी दिन।"
मैंने गठरी को दोनों हाथों से पकड़ा। तो पापा ने उस दिन कुश्ती लड़ी थी — उसी दिन जब दूसरे पहलवानों की गंध बदल गई थी। वो पट्टी उनका सबूत थी। और वो इसे कभी नहीं खोले, क्योंकि वो जानते थे कि इसे खोलने का मतलब था — सब कुछ सामने रख देना। और उनके पास सबूत नहीं था, पर डर था।
"आज मैं इसे पहनकर जाऊँगा," मैंने कहा।
माँ ने मेरा माथा चूमा। उनके होंठ ठंडे थे।
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने फिर वही कहा। "आज खाली पेट ही जा।"
"क्यों?"
"क्योंकि ऊपर वाला याद रखे कि तेरा पेट भी उसी पर है।"
मैं हँसा। पर हँसी गले में अटक गई। और मैं निकल पड़ा।
गाँव के बाहर, नहर के मोड़ पर, सुक्खी बुआ मिलीं। उनकी साड़ी आज और भी चमकीली थी — पीली, जिस पर लाल फूल। हाथ में पान का बीड़ा और दूसरे हाथ में मिट्टी का तेल वाला टिन।
"अरे वीर!" वो चिल्लाईं। "मैंने तो सुना है कि भैरव सर आज अखाड़े में बड़ा ऐलान करने वाले हैं! कह रहे थे, नए पहलवानों को मौका मिलेगा!"
"बुआ," मैंने कहा। "आज अखाड़े में सबको आना है। सबको।"
"सबको?" उन्होंने पान का बीड़ा गाल के दूसरी तरफ़ किया। "क्यों? क्या हो रहा है?"
"कुछ बड़ा।" मैंने कहा। "पर बुआ, ये बात आपसे पहले किसी को नहीं बतानी। पूरे गाँव को आप बुलाएँगी।"
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