Spirit of a Fighter – Chapter 11
उनकी आँखें चमक उठीं। मैं उनकी कमज़ोरी जानता था — और आज उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।
"अरे मैं तो…" उन्होंने साड़ी ठीक की। "मैं तो पूरे रामपुर को उठा लाऊँगी। किसी को खाना भी नहीं खाने दूँगी।"
वो चलीं। उनके कदमों में जोश था। मुझे टिंकू की याद आई — वो भी कहीं यही कर रहा होगा।
अखाड़े का रास्ता मैंने आज तीसरी बार लिया था। पहली बार दीवार के छेद से, दूसरी बार कुएँ के पास पकड़े जाने के लिए, और आज — सामने के दरवाज़े से। मैंने दरवाज़ा देखा। लोहे का, बड़ा, जिस पर लाल रंग उतर रहा था।
दरवाज़े पर लुट्टन खड़ा था। वही वर्दी, वही छोटी मूँछें। हाथ में लाठी, जो टेक रहा था ज़मीन पर।
"अरे, बाहर वाला।" उसने मुँह टेढ़ा किया। "आज अंदर आने की हिम्मत आई है?"
"हिम्मत नहीं," मैंने कहा। "बुलावा है। भैरव सर ने खुद कहा था — सबके सामने जवाब दूँगा। मैं जवाब लेने आया हूँ।"
लुट्टन की आँखें सिकुड़ीं। उसने लाठी सीधी की। मेरे करीब आया।
"सुन," उसने धीरे से कहा। "मैंने सर से बात कर ली है। तुझे अंदर जाने दूँगा — पर शर्त पर।"
"क्या शर्त?"
"जब सर बोलें, तू चुप रहे। बीच में एक शब्द भी नहीं।" उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा — वही कंधा, जहाँ लाठी लगी थी। मैंने दर्द छुपाया। "वरना जो हुआ, उससे बुरा होगा।"
मैंने उसके हाथ को अपने कंधे से हटाया। धीरे से। बिना गुस्सा दिखाए।
"लुट्टन भाई," मैंने कहा। "तुम्हारी गंध बदल गई है।"
वो रुका। "क्या?"
"तुम रोज़ सुबह जो पानी पीते हो, अखाड़े का।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "उसका असर तुम्हारे पसीने में आ गया है। कड़वा।"
लुट्टन का चेहरा बदला। एक पल के लिए उसकी आँखों में कुछ और था — डर, सवाल, और थोड़ा सा शक। फिर उसने मुँह फेर लिया और लाठी से मेरा रास्ता रोका।
"अंदर जाता है तो बोलने का नहीं," वो बड़बड़ाया। "वरना मैं नहीं जानता।"
मैं अंदर गया।
अखाड़े की मिट्टी आज कुछ और थी। लाल, ताज़ी सिंची हुई, और उस पर सैकड़ों पैरों के निशान — जैसे कोई पूरी रात यहाँ चला हो। पर सबसे अजीब बात — मिट्टी में एक गंध थी। वही कड़वी गंध। बहुत हल्की, पर सब जगह फैली हुई। जैसे किसी ने यहाँ पानी नहीं, ज़हर सींचा हो।
मेरा सिर घूमा। मैंने आँखें बंद कर लीं।
तभी दीवार के पास से कोई बोला।
"तो आ गया।"
आवाज़ मीठी थी। भैरव सिंह की। मैंने आँखें खोलीं। वो दीवार के सहारे खड़ा था — लाल मिट्टी वाली धोती, सोने की चेन, बड़ी मूँछें जिनके सिरे तेल से चमक रहे थे। हाथ में एक गिलास पानी। ठीक वैसा ही, जैसा वो रोज़ नए पहलवानों को देता है।
"फ़ीस लाया?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"तो दे।"
मैंने सिक्कों की पोटली निकाली। वो आगे बढ़ा। जब पोटली लेने के लिए हाथ बढ़ाया, तो मैंने पोटली कसकर पकड़ी।
"सर," मैंने कहा। "पहले एक बात।"
उसकी आँखें ठंडी हो गईं। "हूँ?"
"आज सबके सामने आप जवाब देंगे — ये आपने खुद कहा था।" मैंने धीरे से कहा। "तो मैं सिर्फ़ एक सवाल पूछूँगा। आप बताइए, ये मिट्टी में जो गंध है — ये कौन सींच रहा है?"
उसका हाथ रुक गया। और उस पल में, उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — हड़बड़ी। एक पल के लिए। फिर वो मुस्कुराया। मीठी मुस्कान।
"बेटा, ताकत तो सबमें है," उसने कहा। "फर्क सिर्फ़ यह है कि किसकी ताकत किसके हाथ में है।"
उसने पोटली खींच ली। "अंदर जा। और कपड़े बदल। आज तुझे भी मिट्टी में उतरना पड़ेगा।"
"मैं?"
"हाँ।" उसने मुस्कुराते हुए कहा। "अखाड़े में नया बाहरी आया है — सबके सामने उसे कुश्ती में उतरना पड़ेगा। ये रणवीर सिंह का नियम है। और रणवीर सिंह आज यहाँ आ रहे हैं, वो भी खुद।"
वो मुड़ा और चल दिया। उसकी धोती की गाँठ से कुछ लटक रहा था — मैंने देखा। चाबी। लोहे की अलमारी की चाबी।
वो जब दूर गया, तो मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
कुश्ती। आज। मैं। ऐसे समय पर जब खेल असली था — सच का खेल, न कि दंगल का।
मैं चेंजिंग रूम की तरफ़ बढ़ा। रास्ते में एक छोटा-सा कमरा पड़ता था — भैरव का। मैंने चुपके से दरवाज़े पर नज़र डाली। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था, पर मेरी नाक कमरे के अंदर से आती गंध पकड़ रही थी — कुछ डिब्बे, कुछ काग़ज़, और वही कड़वी गंध, बहुत तेज़।
मेरा मन किया कि अंदर झाँक लूँ। पर मैं रुका। मैंने अपने आप से कहा — अभी नहीं। अभी अगर पकड़ा गया तो सब बेकार।
मैं आगे बढ़ गया।
चेंजिंग रूम में एक लोहे का बक्सा था, कुछ पुरानी धोतियाँ, एक टूटा दर्पण। मैंने कपड़े बदले। अपनी धोती ठीक की, पापा की लाल पट्टी कमर पर बाँधी। और दर्पण में अपना चेहरा देखा।
आँखें थकी नहीं थीं। आज नहीं।
पीछे से किसी ने खाँसा।
मैं पलटा।
दरवाज़े पर मीरा खड़ी थी। कुर्ता-सलवार, बाल पीछे बँधे, हाथ में एक छोटा-सा बक्सा। उसके चेहरे पर वो भाव नहीं था जो कल नहर के किनारे था। आज वो कुछ और थी — कसी हुई, सतर्क।
"कपड़े बदल रहे हो," उसने कहा। "मतलब तुमने हाँ कह दी।"
"क्या चारा था," मैंने कहा। "नियम है न।"
वो अंदर आई और दरवाज़ा बंद कर दिया। मैं चौंका।
"मेरे साथ बस थोड़ी देर बात करनी है," उसने कहा। "पर पहले — हाथ दिखाओ।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो तुम आज लड़ने वाले हो, उसकी कलाई देखनी है।" उसने बक्सा खोला। अंदर छोटे-छोटे डिब्बे थे। "मैंने कुछ बनाया है। हल्दी, अदरक, सर्सों का तेल। जोड़ों को गरम रखेगा। कुश्ती में जल्दी अकड़न नहीं होगी।"
मैंने हाथ बढ़ा दिए। वो मेरी कलाई पर लेप लगाने लगी। उसके हाथ ठंडे थे। और जिस पल उसकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर लगीं, मेरा पूरा हाथ काँप गया। उसने देखा। कुछ नहीं बोली।
"मीरा," मैंने कहा।
"हूँ?"
"अगर आज मैं हार गया, तो… तुम सब कर लेना। वो रिकॉर्डिंग, वो सबूत। मेरे बिना भी।"
उसके हाथ रुक गए।
"तुम कैसी बातें कर रहे हो?" वो बोली। "कुश्ती में हार का मतलब मौत नहीं होता। तुम गिरोगे, उठोगे, फिर लड़ोगे।"
"मीरा, तुम नहीं जानती…" मैंने धीरे से कहा। "भैरव आज मुझे अखाड़े में उतार रहा है। वो जानता है मैं उसका राज़ जानता हूँ। तो वो चाहेगा कि मैं यहाँ से टूटकर निकलूँ। या न निकलूँ।"
वो मेरी आँखों में देखने लगी। फिर उसने मेरी कलाई छोड़ दी और अपने बक्से में हाथ डाला। एक छोटी शीशी निकाली।
"ये लो।" उसने कहा। "इसमें नींबू और सेंधा नमक है। जब बहुत थक जाओ, तो ज़ुबान पर लगा लेना। एक बूँद। बस।"
मैंने शीशी ली। जेब में रखी।
"अब सुनो," उसने कहा। "पापा आए हैं। बाहर। व्हीलचेयर पर। और मैंने सुना है कि भैरव ने आज कुछ और भी बुलाया है।"
"क्या?"
"हरनाम ठेकेदार।" उसने कहा। "वो आज काग़ज़ लेकर आया है। मुझे लगता है भैरव कुछ ऐसा दिखाएगा जिससे तुम ग़लत साबित हो जाओ।"
मेरा पेट कसा।
"और एक बात।" उसने मेरी तरफ़ झुककर धीरे से कहा। "पापा नहीं जानते कि तुम कौन हो। उन्हें लगता है तुम एक बाहरी लड़के हो जो अखाड़े में घुसना चाहता है। मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं उन्हें सबूत के साथ बताना चाहती हूँ," उसने कहा। "आज।"
वो बक्सा बंद करने लगी। मैंने उसका हाथ रोका।
"मीरा।"
वो रुकी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno