Spirit of a Fighter12 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 12

7 min read November 5, 2026

"आज तुम्हारे पापा के सामने जब सब खुलेगा," मैंने कहा। "तो एक बात पर बुरा मत मानना। मैं तुम्हारे पापा के सामने खड़ा होकर कहूँगा — जो हुआ उनके साथ, वो भैरव ने किया। और मैं उन्हें उस आदमी से बचाने की कोशिश नहीं करूँगा जिसने उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाया। मैं उन्हें सच दूँगा। चाहे वो कितना भी तीखा हो।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया था, पर होंठ सख्त थे।

"तुम्हें पता है," उसने धीरे से कहा, "मेरे पापा ने पिछले दस साल में किसी से ये नहीं कहा कि उनके पैर कैसे गए। मुझसे भी नहीं। मैंने उन्हें कई बार पूछा। वो हँसकर टाल देते हैं।"

"आज पूछ लेना," मैंने कहा। "जब सब सामने होंगे।"

वो सिर हिलाकर बाहर चली गई। दरवाज़ा खुला छोड़ गई।

मैं वहीं खड़ा रहा, कलाइयों पर लेप सूख रहा था।

बाहर ढोल बजने लगा था।

अखाड़े में भीड़ जुट रही थी। मैं दरवाज़े से झाँका तो देखा — सैकड़ों लोग। और पीछे, एक कोने में, सुक्खी बुआ अपनी साड़ी ठीक कर रही थीं और आधे गाँव को हाथ से इशारा करके बुला रही थीं। टिंकू एक तरफ़ खड़ा था, हाथ में मिठाई की डिब्बी पकड़े, चेहरा सफ़ेद। माँ और गुड़िया दूर, पीछे की कतार में — माँ ने सिर ढका हुआ था।

और धूल भरे रास्ते से, एक व्हीलचेयर आ रही थी। धीरे। मीरा उसे धकेल रही थी।

रणवीर सिंह।

उनका बड़ा शरीर व्हीलचेयर पर सिकुड़ा लग रहा था। सफ़ेद बाल, बड़ी मूँछें, और आँखें — बूढ़ी नहीं। वो आँखें अखाड़े की मिट्टी को देख रही थीं, और उनमें कुछ ऐसा था जैसे कोई शेर अपने पिंजरे को देख रहा हो।

धीरे-धीरे सन्नाटा छा गया।

भैरव सिंह मिट्टी के बीच आया। उसने चारों तरफ़ देखा, मुस्कुराया, फिर बोला —

"रामपुर वालो! आज बड़ा दिन है।" उसकी आवाज़ में गुड़ जैसी मिठास थी। "रणवीर सिंह — हमारे अखाड़े के मालिक — आज खुद यहाँ आए हैं। और उनके सामने, आज मैं एक नया चेहरा पेश करता हूँ। ये लड़का है — वीर सिंह। बाहर वाला। कल से हमारे अखाड़े में। और नियम के मुताबिक़, आज इसे मिट्टी में उतरना पड़ेगा।"

हल्की बातें शुरू हुईं। कुछ लोग हँसे।

"लेकिन," भैरव ने आवाज़ ऊँची की। "इस लड़के ने कुछ बड़े आरोप लगाए हैं। कहता है हमारा पानी खराब है। कहता है हमारे पहलवान बीमार पड़ रहे हैं।"

भीड़ में सन्नाटा। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो रणवीर सिंह के पीछे खड़ी थी, आँखें सिकोड़े।

"तो आज," भैरव ने कहा, "मैं ऐसा करता हूँ — वीर सिंह आज मिट्टी में उतरेगा। और अगर वो जीता, तो मैं उसका आरोप सुनूँगा। और अगर हारा…" वो मुस्कुराया। "तो जो बोला, उसका सबूत देगा।"

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई। ये शर्त थी। वो मुझे हराने के लिए किसी को भेजेगा — कोई ऐसा, जिसे वो जानता है कि मैं नहीं जीत सकता।

"किसके साथ?" किसी ने पीछे से पूछा।

भैरव ने हाथ उठाया।

"लुट्टन।"

भीड़ में साँस रुक गई। लुट्टन मिट्टी में उतरा। उसका शरीर मेरे से दुगना था। मोटा-तगड़ा, चौड़ी छाती, और आँखों में वो डर जो मैंने कुछ देर पहले देखा था — अब गुस्से में बदल चुका था।

वो मेरे पास आया और धीरे से बोला, "सर ने कहा है — तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ना।"

मेरा मुँह सूख गया। मैंने उसकी गंध सूँघी — कड़वाहट आज और तेज़ थी। जैसे उसने सुबह दो गिलास पी लिए हों।

मैं समझ गया। भैरव उसे पहले ही तैयार कर चुका था।

मैं मिट्टी में उतरा। लाल मिट्टी पैरों के नीचे नरम थी, ठंडी। पापा की पट्टी कमर पर कसी हुई थी। मैंने एक गहरी साँस ली।

ढोल बजा। भीड़ चिल्लाई। और लुट्टन झपटा।

वो भारी था। उसने मुझे कमर से पकड़कर उठाने की कोशिश की। मैंने अपना वज़न नीचे किया — जैसे कालू काका ने एक बार कहा था, "मिट्टी से लड़ने वाला जीतता है, हवा से नहीं।" मैं उसकी पकड़ से फिसला। वो झुका, मैंने उसकी कलाई पकड़ी और मोड़ी। वो कराहा।

भीड़ चौंकी। ये इतना आसान नहीं होना चाहिए था।

पर फिर उसने मेरे पेट में घुटना मारा। मेरी साँस अटकी। मैं लड़खड़ाया। उसने मौका देखा और मुझे धक्का दिया। मैं मिट्टी में गिरा। मेरा मुँह मिट्टी से भर गया।

लुट्टन ऊपर आया। उसका घुटना मेरी छाती पर।

"अब बोल," उसने फुसफुसाया। "कह दे सबके सामने — तू झूठा है। मैं तेरी जान छोड़ दूँगा।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वो कड़वाहट थी। वो आदमी जो खुद ज़हर पी रहा था और मुझे डरा रहा था।

मैंने अपना मुँह मिट्टी से साफ़ किया। और धीरे से कहा —

"लुट्टन भाई, तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

वो रुका।

"तुम सुबह से पानी नहीं पीए हो," मैंने कहा। "पर जो पिया, वो तुम्हें अंदर से खा रहा है। तुम्हें पता है न? तुम्हें पता है कि तुम उस पानी से बीमार हो रहे हो।"

उसका घुटना मेरी छाती पर और भारी हो गया। पर उसकी आँखें छलकीं।

"चुप रह," उसने फुसफुसाया।

"मैं चुप नहीं रहूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहता हूँ। तुम आज मुझे हरा दो, कल ये पानी तुम्हें हरा देगा।"

उसका घुटना ढीला पड़ा। एक पल के लिए। बस एक पल।

और उसी पल मैंने अपनी कमर घुमाई, उसके पैर पकड़े, और उसे उलट दिया।

वो मिट्टी में गिरा। भीड़ चीखी।

मैं उसके ऊपर झुका।

"अब तुम फैसला करो," मैंने फुसफुसाया। "या तो मुझे हराओ, और कल भैरव के पास जाकर अपनी बीमारी का इलाज माँगो। या मेरी बात सुनो।"

उसकी आँखों में पानी था। भैरव की तरफ़ उसने देखा। भैरव के चेहरे पर मुस्कान थी, पर आँखें ठंडी।

लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने अपना हाथ ऊपर उठाया।

"मैं हार गया," वो बोला।

भीड़ सन्न रह गई।

मैं उठा। मेरा पूरा शरीर दर्द कर रहा था। मिट्टी चेहरे पर जमी थी। पापा की पट्टी भीग गई थी, पर बँधी हुई थी।

और तब भैरव सिंह आगे आया। उसकी मुस्कान गायब हो चुकी थी। वो मेरे करीब आया, इतना करीब कि उसकी साँस मेरे चेहरे पर लगी।

"तो तुम जीत गए," उसने धीरे से कहा। सिर्फ़ मुझे सुनाई देने वाली आवाज़ में। "अब तुम्हारा आरोप सुनता हूँ।"

मैंने भीड़ की तरफ़ देखा। माँ, गुड़िया, टिंकू। रणवीर सिंह। मीरा।

मैंने गला साफ़ किया।

"मेरा आरोप नहीं है," मैंने कहा। "मेरे पास बात है।"

मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला — कोयले से लिखी धमकी। और उसे ऊपर उठाया।

"ये काग़ज़ आज सुबह टिंकू की दुकान के नीचे से मिला," मैंने कहा। "जिसने फेंका, वो चाहता था कि मैं आज यहाँ न आऊँ। पर मैं आया।"

भीड़ में फुसफुसाहट। भैरव की आँखें सिकुड़ीं।

"और ये," मैंने पापा की पट्टी की तरफ़ इशारा किया। "ये मेरे पापा की है। जिन्होंने इसी अखाड़े में कुश्ती लड़ी थी। उसी दिन जिस दिन उनकी गंध बदल गई थी।"

मैंने पट्टी को अपनी नाक के पास लाया। गहरी साँस ली। और फिर सबके सामने कहा —

"ये पट्टी अब भी कड़वी है। बीस साल बाद भी।"

भैरव हँसा। ज़ोर से।

"बेटा, तू पागल हो गया है।" उसने भीड़ की तरफ़ देखा। "ये लड़का सूँघकर सबूत देता है! अरे, कोई भी कपड़ा पुराना हो जाता है, बदबू आती है — इसे कड़वाहट कह रहा है!"

कुछ लोग हँसे। मेरा पेट गिरा।

और तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

"रुको।"

सब पलटे।

रणवीर सिंह ने अपना हाथ ऊपर उठाया था। व्हीलचेयर पर बैठे हुए भी उनकी आवाज़ में वो गरज थी जिसने एक बार पूरे इलाक़े को थर्राया था।

"ये कपड़ा मैं पहचानता हूँ," उन्होंने कहा। "ये जगदीश की पट्टी है। जगदीश सिंह। जो मेरे अखाड़े का सबसे ईमानदार पहलवान था। और जिसे मैंने अपने हाथों से मिट्टी दी थी।"

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