Spirit of a Fighter – Chapter 13
मेरी साँस रुक गई। जगदीश सिंह। मेरे पापा का नाम। मैंने पहली बार किसी और के मुँह से सुना। और वो भी रणवीर सिंह से।
भैरव का चेहरा बदला।
"सर," वो जल्दी से बोला। "ये लड़का भावुकता में…"
"चुप।" रणवीर सिंह ने एक शब्द में कहा। और भैरव चुप हो गया। जैसे किसी ने उसका बटन दबा दिया हो।
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ा। उसकी मुट्ठी भिंची थी, पर आवाज़ में वो तेज़ाब नहीं था जो अभी था।
"सर, आप थक गए हैं। व्हीलचेयर पर हैं। ये लड़का आपकी भावना का फ़ायदा उठा रहा है।"
रणवीर सिंह ने उसे देखा। बस देखा। कोई जवाब नहीं दिया। और वो चुप हो गया — दूसरी बार।
फिर रणवीर सिंह ने मुझे इशारा किया। "पास आ।"
मैं गया। मेरे पैर काँप रहे थे, पर मैं गया। व्हीलचेयर के पास झुका, तो उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, हड्डी जैसी।
"तेरा नाम?"
"वीर सिंह।"
"जगदीश का बेटा?"
"हाँ।"
वो एक पल चुप रहे। उनकी आँखों में कुछ चला — पुराना, भारी।
"तेरे पापा ने उस दिन मुझसे कहा था," उन्होंने धीरे से कहा, इतने धीरे से कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "कि अखाड़े का पानी बदल गया है। मैंने उन्हें टाल दिया। कहा — बीस साल से यही पानी है, क्या बदलेगा।" उन्होंने मेरी कलाई छोड़ी। "वो अगले हफ़्ते नहीं रहे।"
मेरा गला सूख गया। मैं कुछ बोलना चाहता था, पर शब्द नहीं बने।
रणवीर सिंह पलटे और भीड़ की तरफ़ देखा।
"भैरव," उन्होंने कहा। आवाज़ नरम थी, इसलिए ज़्यादा डरावनी लगी। "अखाड़े का पानी कहाँ से आता है?"
"वही नहर से, सर। जैसे हमेशा से आता था।"
"और नहर में कौन कुछ मिलाता है?"
"कोई नहीं, सर।"
"तो फिर क्यों"—रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर घुमाई—"पिछले एक साल में इक्कीस पहलवानों की गंध बदली? क्यों इक्कीस में से ग्यारह के पसीने में कड़वाहट आ गई?"
भीड़ में सन्नाटा। इक्कीस। उन्हें भी पता था। सबको पता था, बस कोई बोलता नहीं था।
भैरव हँसा। पर ये हँसी अब पहले जैसी नहीं थी। इसमें फटन थी।
"सर, आप भी इन्हीं अफ़वाहों में आ गए? ये बच्चा सिर्फ़ नाम कमाना चाहता है।"
"मैंने तुझसे सवाल पूछा था," रणवीर सिंह ने कहा। "जवाब दे।"
भैरव का जबड़ा कसा। उसने मेरी तरफ़ देखा, ऐसे जैसे आँखों से जला देगा।
और तभी मीरा आगे आई।
वो अपने पापा के पीछे खड़ी थी। अब वो आगे आई और बोली — "पापा, पिछले महीने मैंने अखाड़े की दवाइयों का हिसाब देखा था। कुछ बोतलें ऐसी थीं जो किसी काम की नहीं थीं। खाली बोतलें। भैरव अंकल की अलमारी में।"
भैरव ने उसे देखा। "बेटी, तू पढ़ाई में ध्यान दे। ये अखाड़े के मर्दों के…"
"मैं तुम्हारी बेटी नहीं हूँ," मीरा ने काट दिया। "और मुझे मालूम है खाली बोतल किस चीज़ की थी। मैंने उसकी गंध पहचानी थी।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। हवा में तनाव इतना घना था कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था।
भैरव ने एक कदम पीछे लिया। बस एक। पर भीड़ ने देख लिया। और भीड़ में से कोई बोला — "भैरव, सच बोल।"
फिर दूसरा। फिर तीसरा।
और भैरव सिंह, जिसने एक शब्द में अखाड़ा हिला दिया था, पहली बार सिकुड़ा।
उसने अपनी अलमारी की तरफ़ देखा। फिर नहर की तरफ़। फिर मेरी तरफ़। और मुझे लगा — वो भागेगा।
पर वो नहीं भागा। उसने अपनी जेब से एक चाबी निकाली और ज़मीन पर फेंक दी।
"मेरे पीछे कोई है," वो फुसफुसाया। "मैं अकेला नहीं हूँ।"
व्हीलचेयर पर बैठे रणवीर सिंह की आँखें सिकुड़ीं। "कौन?"
भैरव ने मुँह खोला। पर उससे पहले कि कुछ बोले, भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई — मीठी, धीमी, जैसे कोई गा रहा हो।
"भैरव," वो आवाज़ बोली। "तू ज़्यादा बोल गया।"
मैं पलटा। भीड़ के पीछे, दरवाज़े की छाया में, एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। सफ़ेद साड़ी, माथे पर चंदन, हाथ में तांबे का लोटा। मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा। पर पूरे अखाड़े ने उसे देखते ही सिर झुका लिए। कुछ ने हाथ जोड़े।
"माई," भैरव ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ में अब वो गरज नहीं थी। बस डर था।
और मैं समझ गया — अखाड़े का असली मालिक भैरव नहीं था। ये औरत थी।
वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखें मुस्कुरा रही थीं, पर उनमें कुछ ऐसा था जो मेरे पेट में ठंडा उतार गया।
"लड़के," उसने कहा, "तेरी नाक बहुत तेज़ है। पर नाक से आगे भी कुछ होता है।"
वो मेरे पास आई। उसके कदमों में आवाज़ नहीं थी। और तभी टिंकू मेरे पीछे से खिसका, मेरे कान के पास आया, और ज़ोर से फुसफुसाया —
"भाई, तेरे हाथ पर ये जला हुआ निशान कहाँ से आया? तूने तो कभी बताया नहीं।"
मैंने अपना हाथ देखा। निशान वहीं था, बाएँ हाथ की कलाई पर — पुराना, सिकुड़ा हुआ, जले हुए चमड़े जैसा। बीस साल पुराना। मैंने उसे कभी किसी को नहीं दिखाया था।
और वो औरत, जो अभी मेरे दो कदम दूर खड़ी थी, उस निशान को देखकर रुक गई।
उसकी आँखें फैलीं। उसके हाथ से लोटा छूट गया और ज़मीन पर गिरा — छन्। पानी फैल गया, और उस पानी की गंध में वही कड़वाहट थी।
"तू…" वो औरत फुसफुसाई, "तू जगदीश का बेटा नहीं है।"
॥
मेरा हाथ पीछे चला गया। अपने आप। जैसे साँप को देखकर पैर पीछे हटता है, वैसे ही मेरा हाथ पीछे हट गया और धोती की सिलवट में छुप गया।
पर देर हो चुकी थी।
वो औरत — माई — मेरे हाथ से नज़र नहीं हटा रही थी। उसकी आँखें उसी जगह टिकी थीं जहाँ मेरी कलाई थी। और उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
पूरा अखाड़ा चुप था। इतना चुप कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और उस चुप्पी में एक बात साफ़ हो गई — ये औरत सिर्फ़ मालिक नहीं है। ये औरत कुछ जानती है। मेरे बारे में।
"माई," भैरव ने फिर कहा। इस बार उसकी आवाज़ में मिन्नत थी। "माई, ये बच्चा…"
"चुप।"
बस एक शब्द। और भैरव का मुँह बंद। इतना बड़ा आदमी, इतनी बड़ी छाती, पर एक बूढ़ी औरत के एक शब्द से उसका मुँह सिल गया।
माई ने अपनी सफ़ेद साड़ी का पल्ला ठीक किया। फिर धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ी। उसके पैरों में आवाज़ नहीं थी, पर मुझे लगा जैसे ज़मीन हिल रही है। मेरे दो कदम पहले वो रुकी।
"हाथ दिखा," उसने कहा।
मैं चुप रहा। मेरी धोती के नीचे मेरा हाथ कसा हुआ था।
"लड़के," उसकी आवाज़ नरम हो गई, पर उसमें वो चीज़ बची थी जो डराती है — जैसे कोई दरवाज़ा धीरे से खुले, पर पीछे अंधेरा ही अंधेरा हो। "मैं तेरा कुछ नहीं बिगाड़ूँगी। बस हाथ दिखा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे दो कदम पीछे खड़ी थी, उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं, पर उसके होंठ कसे हुए थे। जैसे वो कह रही हो — संभल।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो भीड़ के किनारे खड़ी थी, गुड़िया को अपने पीछे किए हुए। उसका चेहरा सफ़ेद था। उसकी आँखें मुझसे कह रही थीं कुछ, पर मैं समझ नहीं पाया।
और मैंने अपना हाथ निकाल दिया।
धोती के नीचे से, बाएँ हाथ की कलाई, सबके सामने।
सूरज पश्चिम की तरफ़ ढल रहा था और उसकी पीली रोशनी उस निशान पर पड़ी। मैंने देखा जैसे सब देख रहे थे — चमड़ा सिकुड़ा हुआ, ऊपर उभरा, गुलाबी-सफ़ेद, और बीच में छोटे-छोटे दाने जैसे लकड़ी के जले के निशान।
माई ने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया। उसके हाथ सूखे थे, पर गरम थे। और उनमें इतनी ताकत थी कि मुझे झटका लगा — इतनी बूढ़ी औरत, इतनी मज़बूत पकड़।
वो निशान को देखती रही। फिर उसने अपनी उँगली उस पर फेरी। धीरे से। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म सहला रही हो।
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