Spirit of a Fighter – Chapter 14
"बीस साल," वो फुसफुसाई। "बीस साल पुराना है।"
मेरा गला सूख गया। "आपको कैसे पता?"
उसने मेरी आँखों में देखा। और उसकी आँखों में कुछ ऐसा तैरा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — पछतावा। गहरा, पुराना, दबा हुआ पछतावा।
"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "ये निशान मैंने पहले एक बार देखा है। बहुत साल पहले। एक छोटे बच्चे के हाथ पर। उस दिन आग लगी थी।"
मेरे कानों में एक भनभनाहट शुरू हुई।
"कौन-सा बच्चा?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी।
माई ने मेरा हाथ छोड़ दिया। उसने पीछे मुड़कर भीड़ को देखा — जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हो। फिर वो बोली, पर आवाज़ ऊँची करके, ताकि सब सुनें।
"आज यहाँ बहुत कुछ बोला गया। बहुत कुछ खुला। पर सब कुछ नहीं।" उसने भैरव की तरफ़ देखा। "भैरव, तू अपनी अलमारी खोल। काग़ज़ निकाल। सबके सामने।"
भैरव का चेहरा बदल गया। "माई, इसकी ज़रूरत क्या…"
"मैंने कहा — खोल।"
भैरव ने धीरे-धीरे चाबी उठाई जो उसने अभी ज़मीन पर फेंकी थी। उसके हाथ काँप रहे थे, और मैंने सोचा — ये वही आदमी है जिसने अभी आधे घंटे पहले पूरे गाँव को डरा रखा था। अब ये काँप रहा है। एक बूढ़ी औरत के आगे।
अलमारी खुली। उसमें से काग़ज़ों की गड्डियाँ निकलीं, धूल भरी फ़ाइलें, और सबसे नीचे — दो लाल कपड़े में लिपटी बोतलें।
माई ने वो बोतलें उठाईं। उसने एक को खोला और सूँघा। फिर उसने मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"सूँघ। तेरी नाक तेज़ है, तू ही बता।"
मैंने सूँघा। और मेरा पेट पलट गया।
वही। वही कड़वाहट, वही जला हुआ, वही मिट्टी के नीचे दबी हुई सड़ांध। पर इस बार कुछ और भी था — एक मीठी गंध, बहुत हल्की, जैसे गुड़ जल रहा हो।
"इसमें कुछ और है," मैंने कहा। "कुछ मीठा।"
माई ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चौड़ी हुईं। "तू ये भी पहचान गया? अकेले सूँघकर?"
"हाँ।"
उसने बोतल वापस कपड़े में लपेटी। फिर उसने भीड़ की तरफ़ मुँह किया और बोली — "आज से ये अखाड़ा बंद है। जब तक सच पूरा नहीं खुलता, कोई पहलवान यहाँ नहीं उतरेगा।"
भीड़ में हलचल हुई। कोई बोला — "माई, हमारी फ़ीस…" तो कोई बोला — "माई, हम कहाँ जाएँ?"
"फ़ीस का हिसाब मैं देखूँगी," माई ने कहा। "और हर पहलवान को, एक-एक को, मैं खुद मुँह से पूछूँगी — किसने कितना पानी पिया, किसने क्या देखा। जो सच बोलेगा, वो मेरा। जो छुपाएगा…" वो रुकी। "वो भैरव का रास्ता पकड़ ले।"
भैरव ज़मीन पर बैठा रहा। उसने कुछ नहीं कहा।
फिर माई मेरे पास आई और बहुत धीरे से, सिर्फ़ मेरे कान तक, बोली — "कल अकेला आ। दोपहर में। पीछे के कुएँ के पास। मुझे तुझसे कुछ बात करनी है। तेरे पापा के बारे में।"
मेरी साँस रुक गई।
"पर माई, आपने अभी कहा कि मैं जगदीश का बेटा नहीं…"
"मैंने कहा था," उसने मेरी बात काटी। "और मैं अपनी बात वापस नहीं लेती। पर सच पूरा है। आधा सच सबसे बड़ा झूठ होता है, लड़के। कल आ। तब तक किसी से कुछ मत कहना। किसी से भी नहीं।"
वो पलटी और भीड़ में चली गई। लोग उसके लिए रास्ता छोड़ते गए, जैसे नदी पत्थर के लिए रास्ता छोड़ती है।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ अभी भी काँप रहे थे।
टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "भाई," उसने धीरे से कहा, "वो क्या बोली तुझे?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बाद में।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में शक था, पर उसने ज़ोर नहीं किया। वो बस मेरे साथ खड़ा रहा।
घर लौटते वक्त कोई कुछ नहीं बोला।
माँ आगे चल रही थी, गुड़िया का हाथ पकड़े हुए। उसकी पीठ सीधी थी, पर मुझे पता था — सीधी पीठ बनावटी थी। जब कोई बहुत थका होता है और थकान छुपाना चाहता है, तो पीठ ऐसे ही सीधी कर लेता है। मैंने ये माँ में बहुत बार देखा था।
टिंकू मेरे साथ था। उसने रास्ते में एक बार मेरी कलाई की तरफ़ देखा, फिर नज़र हटा ली। फिर दोबारा देखा। फिर चुप हो गया।
घर पहुँचकर माँ सीधे रसोई में गई। चूल्हा जलाया। पानी चढ़ाया। गुड़िया चुपचाप अपनी कॉपी निकालकर बैठ गई, पर उसने किताब नहीं खोली। वो बस उसे खुली रखकर बैठी रही।
मैं आँगन की मुंडेर पर बैठ गया। टिंकू मेरे पास बैठ गया।
"भाई," उसने फिर कहा। "वो निशान।"
"टिंकू।"
"नहीं, सुन। मैं तेरा दोस्त हूँ। सालों का। और मैंने आज पहली बार देखा।" उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो चुभ गया — जैसे किसी ने कहा हो, तूने मुझ पर भरोसा नहीं किया। "इतने साल, और तूने कभी नहीं बताया?"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। आसमान में बादल थे, बिना बारिश के। ऐसे बादल जो सिर्फ़ भारी होते हैं, बरसते नहीं।
"क्या बताता?" मैंने कहा।
"सच।"
"सच कभी-कभी ऐसा होता है कि बताने से लोग हँसते हैं।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "मैं तेरे पीछे हँसूँगा? भाई, तू पागल है क्या?"
और तभी — मुझे खुद नहीं पता क्यों — मैं बोल पड़ा।
"जब मैं सात साल का था," मैंने कहा, "तब मुझे लगता था कि ये चीज़ — ये सूंघने की चीज़ — ये कोई ताकत है। जैसे किसी कहानी वाले को मिलती है। मुझे लगता था मैं खास हूँ।"
टिंकू चुप था। उसने टोपी उतारी और अपने घुटनों पर रख ली।
"एक दिन गाँव के बच्चे आँगन में खेल रहे थे। उनमें से एक की माँ ने खीर बनाई थी। मैंने कहा — खीर में इलायची डाली है, पर कम। और गुड़ ज़्यादा है। उसने पूछा, तूने देखा कैसे? मैंने कहा, देखा नहीं, सूँघा।"
मैं रुका। मेरा गला भर रहा था, और मुझे ये बात अच्छी नहीं लगी।
"फिर?" टिंकू ने धीरे से पूछा।
"फिर मैंने और बताया। कि मुझे पता चलता है किसके घर में क्या पका है। किसे बुखार है। किसने नहाओ नहीं किया। सब हँसने लगे। पहले तो हँसी लगी, फिर…" मेरी आवाज़ रुकी। "फिर एक लड़का बोला — अरे, ये तो कुत्ता है। गाँव का कुत्ता।"
टिंकू की साँस रुकी।
"और फिर सब हँसने लगे। कुत्ता, कुत्ता। मैं भागा। वो मेरे पीछे भागे। मुझे पत्थर मारे। एक पत्थर मेरी पीठ पर लगा। मैं गिरा। और तभी…" मैंने अपनी कलाई की तरफ़ देखा। "तभी एक लड़के ने जलती लकड़ी उठाई। चूल्हे से निकली थी। उसने मेरे हाथ पर रख दी। मैं चिल्लाया।"
टिंकू ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"बस उस दिन से," मैंने कहा। "मैंने किसी को नहीं बताया। किसी को भी नहीं। माँ को भी नहीं। वो बस जानती है कि मैं कुछ अलग हूँ, पर उसने कभी नहीं पूछा। और मैंने कभी नहीं कहा।"
कुछ देर चुप्पी रही। आँगन में सिर्फ़ चूल्हे की आवाज़ आ रही थी — जैसे माँ जान-बूझकर कुछ ज़्यादा ही चूल्हा कर रही हो, ताकि उसे सब सुनाई न दे।
फिर टिंकू बोला।
"तो क्या मैं भी तुझे कुत्ता कहूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे उसने कुछ ग़लत बोल दिया हो।
"देख भाई," वो आगे झुका, "अगर कुत्ता होने का मतलब है कि तुझे पता चल जाए कि भैरव के पानी में ज़हर है, और तेरे कारण ग्यारह जानें बच सकें — तो मैं तो कहूँगा, गाँव में और भी कुत्ते होने चाहिए।"
मैं उसे देखता रहा।
"और सुन," उसकी आँखें चमक रही थीं, "अगर तू कुत्ता है, तो मैं क्या हूँ? तेरे साथ हर जगह घूमता हूँ, तेरी खीर खाता हूँ, तेरे पीछे-पीछे चलता हूँ। तो मैं तेरी पूँछ हुआ। भाई, पूँछ!"
मैं हँस पड़ा। पहली बार, कई दिनों में — हँसा। ज़ोर से। और टिंकू भी हँसने लगा। और फिर हम दोनों इतना हँसे कि मेरा पेट दुखने लगा और टिंकू की आँखों से पानी निकल आया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno