Spirit of a Fighter – Chapter 15
माँ रसोई से बाहर आई। उसने हमें देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला — जैसे बहुत दिनों बाद उसने कुछ देखा जो अच्छा था।
"खाना खा लो," वो बोली। "रोटी ठंडी हो रही है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और फुसफुसाया — "आज तेरी माँ ने नमक ठीक डाला है क्या?"
"पता नहीं," मैंने कहा। "चल, चखते हैं।"
उस रात हम नहर के किनारे बैठे रहे। टिंकू मिठाई की एक डिब्बी ले आया था — कह रहा था पीछे वाली बैच से बचा ली। हमने वो खाई, और वो पूरी खीर का किस्सा सुनाता रहा कि कैसे उसकी माँ को शक हो गया था कि डिब्बी कहाँ जाती है, और उसने दुकान की तलाशी ली थी, और उसे एक खाली डिब्बी मिली थी जिसमें बस एक चम्मच खीर बची थी।
"और फिर?" मैंने पूछा।
"फिर क्या, मैंने कहा — माँ, ये बिल्ली आ गई थी।"
"बिल्ली खीर खाती है?"
"मेरी बात सुन, अब वो बिल्ली बन गई है। अगली बार जब वो पूछेगी, मैं कहूँगा — बिल्ली का बच्चा आया था।"
हम फिर हँसे।
और उस हँसी में, उस रात, नहर के पानी की आवाज़ में, मुझे कुछ ऐसा मिला जो मैंने बहुत सालों से नहीं पाया था। सुकून नहीं — सुकून तो बाद में आता है। ये कुछ और था। ये ये एहसास था कि मैं अकेला नहीं हूँ। मेरा एक दोस्त है जो मेरे सबसे बड़े डर को जानता है, और उसने मुझसे मुँह नहीं फेरा।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो नहर में पत्थर फेंक रहा था और हर बार गिन रहा था कि कितनी उछालें आईं।
"भाई," मैंने कहा। "कल मुझे अखाड़े जाना है। दोपहर में।"
उसने पत्थर फेंकना रोक दिया। "माई ने बुलाया?"
"तूने सुना कैसे?"
"भाई, मैं तेरी पूँछ हूँ। पूँछ को सब पता होता है।" उसने पत्थर फिर फेंका। "मैं साथ चलूँगा।"
"नहीं। उसने कहा अकेले आ।"
टिंकू कुछ देर चुप रहा। फिर बोला — "ठीक है। पर मैं दीवार के बाहर रहूँगा। अगर तू एक घंटे में बाहर नहीं आया, तो मैं अंदर आ जाऊँगा। चाहे जो हो।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कुछ बातें कहने की नहीं होतीं। बस उस वक्त तक साथ खड़े रहने की होती हैं।
रात गहरी हो गई थी जब मैं घर लौटा।
माँ सो गई थी। गुड़िया सो गई थी। पर जब मैं अपनी चारपाई पर लेटा, तो नींद नहीं आई।
मेरे दिमाग़ में माई की बात घूम रही थी — "कल अकेला आ। पीछे के कुएँ के पास। तेरे पापा के बारे में।"
और वो दूसरी बात — "तू जगदीश का बेटा नहीं है।"
अगर मैं जगदीश का बेटा नहीं हूँ, तो किसका हूँ?
माँ कभी कुछ नहीं बोली। कभी नहीं कहा कि मैं गोद लिया हूँ, कि मैं किसी और का हूँ। उसने हमेशा मुझे अपना बेटा कहा। और अब ये औरत आकर कह रही है कि मैं जगदीश का बेटा नहीं हूँ?
तो क्या मैं माँ का भी बेटा नहीं हूँ?
ये सोचकर मेरा सीना भर आया। मैं करवट बदलकर बैठ गया। मेरी साँस तेज़ थी।
मैंने चारपाई से पैर नीचे रखे। धोती पहनी। दरवाज़ा धीरे से खोला — कड़क न हो, इसका ध्यान रखा। बाहर निकला।
रात में रामपुर अलग लगता है। दिन में जो चीज़ें आम होती हैं — नीम का पेड़, पंचायत का चबूतरा, टिंकू की दुकान — रात में वो सब साये बन जाती हैं। और हवा में एक अलग गंध होती है। ठंडी, गीली, मिट्टी की।
मैं अखाड़े की तरफ़ चला।
मेरे पैर अपने आप चल रहे थे। जैसे किसी और ने उन्हें भेजा हो।
अखाड़े की दीवार पास आई। वो वही दीवार थी जिसके छेद से मैं सालों से कुश्ती देखता आया था। जिसके पास मैं रोज़ खड़ा रहता था, जिसकी लाल मिट्टी की गंध मेरे कपड़ों में लग जाती थी और माँ पूछती थी — कहाँ से आया?
पर आज मैं उस छेद के पास नहीं रुका।
आज मैं दीवार के साथ-साथ चला। पीछे की तरफ़। जहाँ कुआँ है।
कुआँ पुराना था — मैंने सुना था कि ये अखाड़े से भी पुराना है। इसका ढक्कन लोहे का था, मोटा, जंग लगा। ऊपर एक भारी पत्थर रखा था ताकि कोई खोल न सके।
मैंने पत्थर को हाथ लगाया। ठंडा था, और गीला — जैसे अभी किसी ने छुआ हो।
मैंने धक्का दिया। नहीं हिला।
मैंने दोनों हाथ लगाए। पूरा ज़ोर लगाया। मेरी बाँहों की नसें उभर आईं, मेरी पीठ में खिंचाव आया, और मेरी साँस फूलने लगी।
पत्थर ज़रा-सा खिसका।
मैंने फिर ज़ोर लगाया। पसीना मेरे माथे से बहकर आँखों में जा रहा था। मेरे हाथ फिसल रहे थे।
और फिर — एक बड़ी आवाज़ के साथ — पत्थर खिसक गया।
मैं रुक गया। साँस भरने के लिए। और तभी मुझे वो गंध आई।
वो ऐसी गंध थी जैसी मैंने कभी नहीं सूँघी।
नम मिट्टी। बहुत पुरानी। सौ साल पुरानी। ऐसी मिट्टी जिसे किसी ने छुआ नहीं, जिसमें हवा नहीं लगी, जो बंद पड़ी थी किसी तहखाने में। और उस गंध में कुछ और भी था — जड़ी-बूटियों का धुआँ, जैसे कोई सदियों से यहाँ धूप जला रहा हो। और पसीने की गंध। बहुत सारे लोगों के पसीने की।
मेरी नाक भर आई।
ये गंध मुझे कहीं से जानी लगी। पर मैं समझ नहीं पाया कहाँ से।
मैंने ढक्कन को और खिसकाया। अंदर अंधेरा था — गाढ़ा, स्याह। मैंने झुककर देखा। कुछ नहीं दिखा।
फिर मैंने अपनी जेब टटोली। एक माचिस थी — टिंकू से ली थी, कभी-कभी दुकान पर काम आती है।
मैंने एक तीली जलाई। पीली रोशनी में मुझे सीढ़ियाँ दिखीं। पत्थर की, नीचे जाती हुईं। ऊपर काई जमी थी, गीली। और सीढ़ियों पर धूल नहीं थी। साफ़ थीं। जैसे कोई आता-जाता हो।
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
मैं सीढ़ी पर पैर रखने ही वाला था कि मैं रुक गया।
क्योंकि अंधेरे से एक आवाज़ आई।
हल्की सी। धीमी। जैसे किसी ने सीढ़ी पर पैर रखा हो।
चर… मर…
मैं वहीं जम गया।
मेरी तीली बुझ गई — हवा से, या मेरे हाथ के काँपने से। अंधेरा और गाढ़ा हो गया।
और फिर, अंधेरे में, एक और आवाज़ आई।
इस बार पैरों की नहीं। इस बार किसी के बोलने की। बहुत धीमी, बहुत दबी हुई, जैसे कोई सालों से बोल नहीं रहा हो और आवाज़ भूल गया हो।
"कौन… है… ऊपर?"
मेरी साँस रुक गई।
वो आवाज़ मर्द की थी। बूढ़े मर्द की। और उसमें एक अजीब-सी पहचान थी — जैसे मैंने ये आवाज़ पहले कभी सुनी हो। बहुत पहले।
मेरे होंठ अपने आप खुले। मैंने कुछ कहना चाहा। पर आवाज़ नहीं निकली।
फिर नीचे से आवाज़ फिर आई, इस बार थोड़ी साफ़।
"जगदीश… तू आ गया? मैं जानता था तू आएगा। बीस साल से तेरा इंतज़ार कर रहा हूँ।"
मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
॥
कुएँ के मुँह से आती ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लग रही थी, और मेरे पैर जैसे जम गए थे।
वो आवाज़ फिर आई। इस बार और साफ़। जैसे बोलने वाला ऊपर आने की कोशिश कर रहा हो।
"जगदीश… बोल ना। कितना इंतज़ार कराएगा?"
मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। मैं कुछ कहना चाहता था, पर मेरा शरीर मेरी बात नहीं मान रहा था। पैर पीछे हटने लगे। अपने आप। जैसे किसी ने मेरी एड़ियों में रस्सी बाँधकर खींची हो।
मैं पलटा और भागने लगा।
पर तीन कदम भी नहीं गया था कि सामने से कोई आ रहा था। हाथ में लालटेन, पीली रोशनी। मैं ठिठक गया। मेरी साँस अटक गई।
वो कालू काका थे।
कुबड़ी कमर, सफ़ेद दाढ़ी, छोटा कद। वैसे ही धीरे चलते हुए, जैसे हमेशा चलते हैं। उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई और मेरे चेहरे पर रोशनी डाल दी।
"अरे, तू है?" उन्होंने कहा। आवाज़ में हैरानी नहीं थी। जैसे उन्हें पता था कि मैं यहीं मिलूँगा।
"काका, वहाँ अंदर…" मैंने उँगली कुएँ की तरफ़ की। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "कोई है। कोई बोल रहा है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno