Spirit of a Fighter – Chapter 16
कालू काका ने कुएँ की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था। बस वो वैसे ही शांत खड़े रहे, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को गिरते हुए देख ले और अंदर से जान ले कि कुछ नहीं हुआ।
"मुझे पता है," उन्होंने धीरे से कहा। "रोज़ सुनता हूँ।"
मेरा मुँह खुला का खुला रह गया।
"आपको पता है? और आप कुछ नहीं करते?"
कालू काका ने लालटेन नीचे रखी और मेरे पास आकर खड़े हो गए। उनके कंधे झुके हुए थे, पर उनकी आँखें मेरी आँखों में सीधी थीं।
"क्या करता?" उन्होंने कहा। "किससे कहता? भैरव से? जिसने ये कुआँ बंद कराया है?"
मैं चुप हो गया।
कालू काका कुएँ के पास गए। उन्होंने झुककर उस भारी पत्थर को छुआ जो मैंने खिसकाया था। उनकी उँगलियाँ पत्थर पर फिरीं, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी किताब का पन्ना पलट रहा हो।
"ये रास्ता अभी तेरा नहीं, बेटा," उन्होंने कहा। "अभी नहीं।"
"पर अंदर कोई है!" मैंने कहा। "वो बोल रहा था। मेरे पापा का नाम ले रहा था।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। इतनी देर कि मुझे लगा वो मेरे अंदर कुछ ढूँढ रहे हैं।
"मुझे पता है कौन है," उन्होंने कहा। "पर आज नहीं।"
फिर उन्होंने पत्थर को दोनों हाथों से पकड़ा और एक ही झटके में उसे उसकी जगह पर सरका दिया। मैं हैरान रह गया। इतना भारी पत्थर, और ये बूढ़ा आदमी, और एक झटका?
उन्होंने मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा दिया। जैसे मेरे मन की बात पढ़ ली हो।
"मिट्टी में काम करने वाले के हाथ और होते हैं, बेटा," उन्होंने कहा। "ताकत हड्डी में नहीं, आदत में होती है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी उँगलियाँ मोटी थीं, नाखून टूटे हुए, हथेलियों पर इतने छाले थे जैसे कोई नक्शा बना हो।
"काका, अंदर क्या है?" मैंने पूछा। "प्लीज बताइए।"
कालू काका ने लालटेन उठाई और उसकी रोशनी में अपना चेहरा दिखाया। उनके चेहरे पर वो झुर्रियाँ थीं जो बरसों की धूप में पड़ी हों। पर आँखें — आँखों में कुछ और था। कुछ चमक रहा था।
"मिट्टी है," उन्होंने कहा। "बस मिट्टी।"
फिर वो रुके। और मुस्कुराए।
"पर ये मिट्टी झूठ नहीं बोलती। जो इसमें पसीना डालता है, वो इसे पहचानता है। जो इसमें लालच डालता है, वो इसके लिए अंधा हो जाता है।"
मैंने उनकी बात समझने की कोशिश की। पर मेरे अंदर कुछ और चल रहा था। वो आवाज़। वो बूढ़ी आवाज़ जो मेरे पापा का नाम ले रही थी।
"मैं अंदर जाना चाहता हूँ," मैंने कहा। "मुझे देखना है।"
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर। उनकी आँखें मेरी आँखों से हट नहीं रही थीं। जैसे वो कोई तराजू लगा रहे हों, कोई हिसाब कर रहे हों।
और फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मुझे समझ नहीं आया।
"तेरी आँखें वैसी हैं," वो फुसफुसाए। "बिलकुल वैसी।"
"कैसी?" मैंने पूछा।
पर वो पहले ही पलट चुके थे। मेरे सवाल को हवा में छोड़कर, जैसे किसी ने मिट्टी का ढेला उठाकर पानी में फेंक दिया हो।
"अभी नहीं," उन्होंने कहा। "पहले अखाड़े की मिट्टी को पहचान। उसे अपने हाथों में ले। उसकी गंध पहचान। उसकी थकान पहचान। जब तू उसे पहचान लेगा, तब ये मिट्टी खुद तुझे बुलाएगी।"
वो चलने लगे। लालटेन की रोशनी मिट्टी पर नाच रही थी।
और फिर वो रुके। पलटे। और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मेरे रोंगटे खड़े कर गया।
"बीस साल पहले," उन्होंने धीरे-धीरे कहा, "मैंने भी यहाँ एक लड़के को खड़ा देखा था। इसी कुएँ के पास। वो भी तेरी तरह भूखा था। वो भी तेरी तरह हाँफ रहा था। और वो भी तेरी तरह जिद्दी था।"
मेरी साँस रुक गई।
"वो कौन था, काका?"
कालू काका मुस्कुराए। एक छोटी-सी मुस्कान, जो उनकी दाढ़ी के नीचे छुप गई।
"वो तेरा पापा था, बेटा," उन्होंने कहा। "जगदीश सिंह।"
और वो लालटेन लेकर अंधेरे में चले गए। उनके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती गई। और मैं वहीं खड़ा रह गया, कुएँ के पास, अंधेरे में, ये सोचकर कि मेरे पापा भी यहाँ आए थे। यहीं खड़े थे। यही हाँफे थे।
मेरी आँखें भर आईं। पर मैंने पोंछा नहीं। क्योंकि इस बार वो आँसू डर के नहीं थे। वो कुछ और थे। जैसे कोई पुराना घाव खुल गया हो, और उसमें से हवा लग रही हो।
मैं कुएँ से पीठ करके लौटा। अखाड़े की दीवार के पास से गुज़रा। उस दीवार के पास से जिसके छेद में से मैंने सालों तक कुश्ती देखी थी। और आज पहली बार मुझे लगा कि वो दीवार मेरी है। वो छेद मेरा है। वो मिट्टी मेरी है।
टिंकू दीवार के बाहर बैठा था। मेरी मिठाई की डिब्बी उसके हाथ में थी, खुली हुई। आधी खत्म हो चुकी थी।
"एक घंटा हो गया था," उसने कहा, मुँह में लड्डू ठूँसकर। "मैं अंदर आने ही वाला था।"
"तो आ जाता," मैंने कहा और उसके बगल में बैठ गया।
"मैं आता," उसने कहा, "पर सोचा, अगर तू अंदर किसी को पीट रहा होगा तो मेरी मिठाई खराब हो जाती।"
मैं हँस पड़ा। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि खुद चौंक गया। मेरे अंदर जो कुछ भी जमा था — कुएँ की आवाज़, कालू काका की बातें, पापा की याद — वो सब इस हँसी में बहकर निकल गया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। फिर लड्डू का डिब्बा मेरी तरफ़ सरका दिया।
"ले," उसने कहा। "तेरा चेहरा देखकर लग रहा है अंदर कुछ बड़ा हुआ है।"
मैंने एक लड्डू उठाया। हल्दी और घी की गंध मेरे हाथों से उठी। और अचानक मुझे याद आया — कालू काका ने कहा था, अखाड़े की मिट्टी को पहचान। मैंने लड्डू मुँह में रखा और चबाते-चबाते सोचने लगा।
"टिंकू," मैंने कहा, "कल सुबह मुझे अखाड़े में जाना है।"
टिंकू का लड्डू उसके गले में अटक गया। उसने खाँसते हुए पानी माँगा। मैंने अपनी थैली से पानी की बोतल दी।
"तू… तू पागल हो गया है?" उसने खाँसते हुए कहा। "माई ने अखाड़ा बंद कर दिया है। भैरव वहाँ है। लुट्टन है। और तू कह रहा है कल सुबह?"
"माई ने कहा था, कल दोपहर कुएँ के पास आना। पर सुबह मुझे मिट्टी चाहिए। अखाड़े की। उस मिट्टी में कुछ है, टिंकू। कालू काका ने कहा — पहले अखाड़े की मिट्टी को पहचान।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था। साफ़ दिख रहा था। पर उसने लड्डू का डिब्बा बंद किया और उसे अपनी बगल में दबा लिया।
"ठीक है," उसने कहा। "मैं भी आऊँगा।"
"तू रोज़ कहता है कसरत कल से शुरू करेगा।"
"तो क्या हुआ?" उसने कंधे उचकाए। "कल से करूँगा। आज तेरे साथ चलूँगा।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। वो दुबला था, हड्डियों का ढाँचा। पर उसका कंधा मेरे हाथ के नीचे मज़बूत था। अपने-अपने तरीके से मज़बूत।
रास्ते में मैंने उसे कुएँ की सारी बात बताई। वो आवाज़। कालू काका का आना। पापा का नाम। सब कुछ। टिंकू चुपचाप सुनता रहा। बीच में एक बार भी नहीं बोला। जब मैंने कहा कि कालू काका ने कहा कि पापा भी यहाँ खड़े थे, तब टिंकू रुक गया।
"तेरे पापा?" उसने कहा। "तो मतलब तेरे पापा भी उस कुएँ के बारे में जानते थे।"
मैंने सिर हिलाया।
"और वो मर गए," टिंकू ने धीरे से कहा। "उसी पानी से।"
ये बात मैंने खुद कही थी, पर टिंकू के मुँह से सुनकर कुछ और लगी। जैसे किसी ने चाकू को घुमाकर दोबारा घोंप दिया हो।
"हाँ," मैंने कहा। "उसी पानी से।"
हम चुपचाप चलते रहे। नीम के पेड़ों की गंध, रात की ठंडी हवा, और दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था।
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