Spirit of a Fighter17 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 17

7 min read November 5, 2026

ये अजीब था। माँ कभी दरवाज़ा खुला नहीं छोड़तीं। चाहे गर्मी हो या सर्दी, वो दरवाज़ा बंद करके ही सोती हैं। कहती हैं — "दरवाज़ा बंद रहे तो नींद भी बंद रहती है।"

मेरे पैर रुक गए।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ कहना चाहा, पर मैंने हाथ से रोक दिया।

मैं धीरे-धीरे अंदर गया। आँगन में चूल्हा बुझा हुआ था। चक्की वहीं पड़ी थी। पर माँ कहीं नहीं थी।

फिर मैंने कमरे की तरफ़ देखा।

दरवाज़े के पास, लालटेन की हल्की रोशनी में, माँ खड़ी थीं। उनके हाथ में एक काग़ज़ था। पीला, मुड़ा हुआ, पुराना। उनके हाथ काँप रहे थे। इतने काँप रहे थे कि काग़ज़ उनके हाथ से निकला-निकला जा रहा था।

मैंने दरवाज़े पर पैर रखा। लकड़ी चरमराई।

माँ ने झट से पलटकर देखा। उनकी आँखें बड़ी हो गईं। और फिर — जैसे बिजली कौंधी हो — उन्होंने वो काग़ज़ जल्दी से साड़ी के कोने में छुपा दिया। इतनी जल्दी कि मुझे लगा कि मेरी आँखों ने जो देखा वो सच था या नहीं।

"माँ?" मैंने कहा।

"तू लौट आया," उन्होंने कहा। आवाज़ सामान्य बनाने की कोशिश में और भी अजीब लग रही थी। "खाना गर्म कर देती हूँ।"

वो चूल्हे की तरफ़ बढ़ीं। पर मैंने रास्ता रोक लिया।

"माँ, वो क्या था? तुम्हारे हाथ में?"

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "पुराना काग़ज़ है। हिसाब-किताब का।"

"तुम्हारे हाथ काँप रहे थे।"

माँ रुक गईं। उनकी पीठ मेरी तरफ़ थी। मैंने उनकी पीठ देखी — दुबली, झुकी हुई, सफ़ेद होती चोटी। और उनके कंधे हिल रहे थे। हल्के-हल्के।

"माँ?" मैंने धीरे से कहा। "तुम रो रही हो?"

कुछ देर तक वो चुप रहीं। फिर उन्होंने कपड़े के कोने से आँखें पोंछीं और मेरी तरफ़ पलटीं। उनका चेहरा शांत था। पर उनकी आँखों में वो पानी अभी भी था, जो पोंछने से नहीं जाता।

"वीर," उन्होंने कहा, "तू कुएँ के पास गया था?"

मेरी साँस अटक गई। कैसे जाना?

"कालू काका आए थे," मैंने कहा। "मुझे वहाँ से भगा दिया।"

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर टिंकू की तरफ़ जो दरवाज़े पर खड़ा था। टिंकू ने हाथ जोड़कर हल्की-सी हँसी में सिर झुकाया।

"चले जाओ, टिंकू," माँ ने कहा। "कल सुबह आ जाना।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। वो चला गया, पर जाते-जाते मेरी तरफ़ देखता गया। उसकी आँखों में वो ही सवाल था जो मेरे अंदर घूम रहा था।

जब वो चला गया, माँ ने चूल्हे पर पानी रखा। धीरे-धीरे। जैसे वो मुझे कोई बड़ी बात बताने से पहले खुद को तैयार कर रही हों।

"बैठ," उन्होंने कहा।

मैं बैठ गया। आँगन में, चक्की के पास। वो जगह जहाँ से मेरा बचपन गुज़रा था। जहाँ मैंने हज़ार बार माँ को आटा पीसते देखा था।

"तेरे पापा," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ रुक गई। "वो भी तेरी तरह थे। ज़िद्दी। बात नहीं मानते थे।"

मैंने कुछ नहीं कहा। माँ कभी पापा के बारे में नहीं बोलतीं। जब मैं छोटा था तो पूछता था, तो वो कहतीं — "चूल्हा देख, दाल चढ़ा दे।" और मैं समझ जाता कि ये सवाल वो नहीं सुनना चाहतीं।

पर आज वो खुद बोलीं।

"तेरे पापा अखाड़े में जाते थे। रोज़ सुबह। भैरव सिंह तब भी वहाँ था। पर तब वो इतना बड़ा नहीं हुआ था। तब वो रणवीर सिंह के नीचे काम करता था।"

मैंने कान सीधे किए।

"एक दिन तेरे पापा ने देखा कि भैरव पहलवानों को कुछ पिला रहा है। वो बोतलें। तेरे पापा ने उससे पूछा। भैरव ने हँसकर कहा — 'जोश का पानी है, भाई।' पर तेरे पापा को कुछ अलग लगा। उन्होंने रणवीर सिंह को बताया। रणवीर सिंह तब जवान थे, अपने दम पर। उन्होंने भैरव से पूछा। भैरव ने चुपचाप कुछ नहीं कहा। पर कुछ महीने बाद रणवीर सिंह की कुश्ती में ऐसी चोट लगी कि उनके पैर हमेशा के लिए…"

माँ रुक गईं।

"तेरे पापा को शक हुआ। पर सबूत कहाँ था? फिर एक दिन तेरे पापा बीमार पड़े। डॉक्टर बोले — कमज़ोरी है। पर मैं जानती थी। मैंने उनकी आँखों में देखा था। वो उसी पानी से बीमार पड़े थे।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पानी अब बह रहा था। और उन्होंने पोंछा नहीं।

"मरने से पहले तेरे पापा ने मुझे एक काग़ज़ दिया था। कहा था — 'इसे संभालकर रखना। जब वीर बड़ा हो जाए, तो उसे देना।'"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"वो काग़ज़," मैंने कहा। "जो तुमने छुपाया?"

माँ ने सिर हिलाया। उन्होंने साड़ी का कोना खोला और वो पीला काग़ज़ निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

मैंने उसे उठाया। काग़ज़ बहुत पुराना था। मुड़ा हुआ, पीला, किनारों से फटा हुआ। उस पर मर्द की लिखाई थी। टेढ़ी-मेढ़ी, पर साफ़। मैंने पढ़ा।

उस पर लिखा था — "भैरव के कमरे के नीचे, कुएँ की सीढ़ियों के बाद, तीसरी दीवार। वहाँ अलमारी है। अलमारी में लाल कपड़े में लिपटी बोतलें हैं। उसमें एक बोतल हरी है। वो हरी बोतल पानी में घोलने की है। एक बूँद दस पहलवानों को बीमार कर सकती है। उसका रंग पानी में नहीं दिखता। पर उसकी गंध में गुड़ जैसी मिठास है।"

मेरे हाथ काँपने लगे।

गुड़ जैसी मिठास।

वो मिठास जो मैंने भैरव की बोतलों में सूँघी थी। वो मिठास जो मैंने अकेले पहचानी थी।

ये काग़ज़ मेरे पापा ने लिखा था। मेरे पापा ने ये सब पहले देखा था। पहले पहचाना था।

और मर गए।

"माँ," मैंने धीरे से कहा। "ये काग़ज़ तुमने अब तक क्यों नहीं दिया?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर था। वो डर जो सिर्फ़ माँ की आँखों में होता है — अपने बच्चे के लिए।

"क्योंकि मैं डरती थी, वीर," उन्होंने कहा। "मैंने तेरे पापा को खोया। मैं तुझे नहीं खो सकती।"

मेरी आँखें भर आईं। मैंने काग़ज़ को अपने सीने से लगा लिया। जैसे वो मेरे पापा का हाथ हो। जैसे वो मुझे छू रहे हों।

"माँ," मैंने कहा, "पापा ने ये काग़ज़ लिखा था। मतलब वो चाहते थे कि मैं ये काम करूँ।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर। फिर उन्होंने अपने हाथ मेरे सिर पर रखे। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उसमें ममता की गर्मी थी।

"तेरे पापा चाहते थे कि तू पहलवान बने," उन्होंने कहा। "पर वो ये नहीं चाहते थे कि तू उनकी मौत की तरह मरे।"

"मैं नहीं मरूँगा, माँ," मैंने कहा। "मैं वादा करता हूँ।"

माँ ने कुछ नहीं कहा। बस मेरे सिर पर हाथ रखे रहीं। और उनकी आँखों से आँसू बहते रहे, चुपचाप, बिना किसी आवाज़ के।

रात में मैंने वो काग़ज़ अपने तकिये के नीचे रखा। और कालू काका की बात सोचता रहा — वो अखाड़े की मिट्टी को पहचानने की बात। कुएँ की सीढ़ियों की बात। और उस बूढ़ी आवाज़ की बात जो मेरे पापा का नाम ले रही थी।

मुझे नींद नहीं आई। पर मैं उठा नहीं। मैं लेटा रहा और छत को देखता रहा। छत पर टूटी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। कभी ठीक नहीं हुई। पर आज उसकी आवाज़ मुझे किसी के दिल की धड़कन जैसी लग रही थी।

सुबह चार बजे माँ की चक्की चलने लगी। मैं उठा। बाहर गया। ठंडी हवा ने मेरे चेहरे को छुआ।

टिंकू पहले से दरवाज़े पर खड़ा था। मुठ्ठी में दो पकौड़े दबाए हुए।

"मैंने सोचा," उसने कहा, "अगर तू अखाड़े की मिट्टी उठाने जा रहा है, तो भूखे पेट क्यों जाए?"

मैंने पकौड़े लिए। एक मुँह में रखा। तेल और आलू की गर्मी मुँह में फैल गई।

"चल," मैंने कहा।

अखाड़े का गेट बंद था। चेन लगी थी। लोहे की चेन, जिस पर जंग लगी थी। मैंने चेन को छुआ। ठंडी थी।

"पीछे से चलते हैं," टिंकू ने कहा। "कुएँ वाले रास्ते से।"

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