Spirit of a Fighter – Chapter 18
मैंने सिर हिलाया। पर जब हम पीछे पहुँचे, तो कुआँ वही था। ढक्कन बंद। पत्थर वहीं। और उसके पास — कालू काका।
वो मिट्टी सींच रहे थे। बाल्टी से पानी लेकर, धीरे-धीरे, अखाड़े की दीवार के नीचे की मिट्टी पर छिड़क रहे थे। उनकी आँखें झुकी हुई थीं।
"काका," मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया। मुझे देखकर मुस्कुराए। जैसे उन्हें उम्मीद थी कि मैं आऊँगा।
"आ गया?" उन्होंने कहा। "मैं जानता था।"
उन्होंने बाल्टी नीचे रखी और दीवार के पास गए। फिर अपनी उँगली से दीवार में लगी लाल मिट्टी को खुरचा। मुट्ठी भर मिट्टी उनकी हथेली पर आ गई।
वो मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ले," उन्होंने कहा। "ये अखाड़े की असली मिट्टी है। इसे अपने हाथ में रख। इसकी गंध पहचान।"
मैंने मिट्टी हाथ में ली। नम थी। ठंडी थी। और उसकी गंध में कुछ था — पसीना, बहुत सारा पसीना, सालों का। और मेहनत। और वो कड़वाहट नहीं थी जो ज़हरीले पानी में थी। ये गंध साफ़ थी। ईमानदार थी।
मेरी आँखें भर आईं। मुझे नहीं पता क्यों। मिट्टी की गंध से आँखें क्यों भरती हैं। पर भर आईं।
"पहचानी?" कालू काका ने पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
"अब समझा?" उन्होंने कहा। "ये मिट्टी किसी की जागीर नहीं है। ये उन सबकी है जिन्होंने इसमें पसीना डाला है। जिन्होंने इसमें अपना दर्द गाड़ा है। और जो इसे पहचानता है, वो इसका मालिक होता है — चाहे उसके पास एक इंच ज़मीन न हो।"
मैंने मिट्टी को अपनी मुट्ठी में कस लिया।
"काका," मैंने कहा, "माई ने मुझे दोपहर में कुएँ के पास बुलाया है। पापा के बारे में बात करनी है।"
कालू काका का चेहरा कुछ बदला। जैसे किसी पुरानी तस्वीर पर धूल जमी हो और किसी ने उसे पोंछ दिया हो।
"माई…" उन्होंने धीरे से कहा। "तो उसने तुझे पहचान लिया।"
"क्या मतलब?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने मेरे हाथ से मिट्टी वापस ली। उसे दीवार पर मल दिया। जैसे किसी को दीवार पर अपना नाम लिखना हो।
"माई इस अखाड़े की मालिक है," उन्होंने कहा। "पर वो अखाड़े की मालिक नहीं है। वो उस मिट्टी की मालिक है। और वो मिट्टी उससे बात करती है।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू का मुँह खुला हुआ था।
"मिट्टी बात करती है?" टिंकू ने कहा।
कालू काका मुस्कुराए।
"सब मिट्टी बात करती है, बेटा," उन्होंने कहा। "पर सुनने वाला चाहिए।"
दोपहर में मैं कुएँ के पास पहुँचा। अकेला। माँ से कहकर आया था — "कुछ काम है।" उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरी तरफ़ देखा और सिर हिला दिया। जैसे वो जानती थीं।
कुएँ का ढक्कन बंद था। पत्थर वहीं। पास में कोई नहीं था।
मैं खड़ा रहा। साँस रोके। इंतज़ार करता रहा।
फिर मुझे पीछे से आहट आई। हल्की-सी। साड़ी की सरसराहट। मैं पलटा।
माई आ रही थीं। सफ़ेद साड़ी, माथे पर चंदन, हाथ में तांबे का लोटा। उनकी चाल में वो ठहराव था जो सिर्फ़ बहुत साल जीने वालों में आता है। वो मेरे पास आईं और कुएँ के पत्थर पर बैठ गईं।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं उनके सामने बैठ गया। ज़मीन पर। अखाड़े की लाल मिट्टी पर।
माई ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें वो चमक थी जो उम्र से नहीं जाती।
"तू कालू से मिला?" उन्होंने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "उसने मुझे अखाड़े की मिट्टी दी।"
माई मुस्कुराईं।
"तो तूने पहचान ली," उन्होंने कहा। "अच्छा किया।"
कुछ देर वो चुप रहीं। फिर उन्होंने लोटा उठाया और उसमें से पानी कुएँ के पत्थर पर डाला। पानी बहकर मिट्टी में मिल गया। और मुझे वो कड़वी गंध फिर आई। हल्की-सी। पर आई।
"ये पानी भी वही है?" मैंने पूछा।
"नहीं," माई ने कहा। "ये तो बस कुएँ का पानी है। पर मिट्टी ने ये कड़वाहट पी ली है। ये मिट्टी अब वैसी नहीं रही जैसी सौ साल पहले थी। इसे साफ़ करना पड़ेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"पर उससे पहले," उन्होंने कहा, "तुझे एक बात बतानी है। जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
मेरी साँस रुक गई।
"तू जगदीश का बेटा नहीं है," उन्होंने कहा।
मेरे अंदर कुछ टूटा। फिर से। वही बात। वही झटका। बार-बार।
"मैंने कल भी यही कहा था," माई ने कहा। "पर आज मैं पूरी बात बताऊँगी। तेरे पापा जगदीश सिंह ने तुझे गोद लिया था। तू उनका खून नहीं है।"
मेरे हाथ मिट्टी में गड़ गए। मेरी उँगलियों ने मिट्टी को कस लिया। मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि कहने के लिए कुछ था ही नहीं।
"तेरे असली पापा," माई ने धीरे से कहा, "इसी कुएँ के नीचे हैं।"
॥
मेरे हाथ मिट्टी में गड़ चुके थे। माई की बात हवा में लटकी रह गई। मैंने अपनी तरफ़ देखा — उँगलियाँ लाल मिट्टी से भरी, नाखूनों के नीचे धूल।
"कुएँ के नीचे?" मैंने कहा। आवाज़ निकली, पर किसी और की लगी।
माई ने लोटा ज़मीन पर रख दिया। ठक। तांबे की आवाज़ मिट्टी में दब गई।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा, "इस कुएँ में एक आदमी उतरा था। वो नीचे गया, और फिर ऊपर नहीं आया। मैंने उसे देखा था। अपनी आँखों से।"
"कौन था?"
"तेरा बाप।" माई ने मेरी आँखों में देखा। "रघुवीर।"
नाम सुनकर मेरे अंदर कुछ हिला। जैसे कोई बंद कमरे में दरवाज़ा धक्का दे। मैंने वो नाम पहले कभी नहीं सुना था। पर फिर भी… फिर भी कुछ जाना-पहचाना लगा।
"रघुवीर," मैंने दोहराया।
"हाँ। रघुवीर सिंह। अखाड़े का सबसे नया पहलवान। सबसे भूखा।" माई ने धीरे से कहा। "तेरे जैसा। बिलकुल तेरे जैसा।"
मैं उठना चाहता था, पर पैर नहीं उठे। मिट्टी में बैठा रहा।
"तो वो मर गया?"
माई चुप रहीं। फिर बोलीं, "मुझे नहीं पता। मैंने उसे उतरते देखा। फिर आवाज़ आई। फिर चुप्पी। और फिर भैरव कुएँ के ऊपर आया, अकेला।"
मेरी छाती में कुछ जम गया। ठंडा।
"भैरव?"
"उस वक़्त भैरव नया था। रणवीर के नीचे काम करता था। मैंने उससे पूछा कि रघुवीर कहाँ है। उसने कहा, 'भाग गया। डर के मारे।' और मैंने मान लिया।" माई की आवाज़ में कड़वाहट आई। "मैंने मान लिया, वीर। बीस साल तक मैंने मान लिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैं बूढ़ी हो रही थी। और अकेली। और अखाड़ा चलाना था।" माई ने अपनी सूखी हथेलियों को देखा। "डर से इंसान बहुत कुछ मान लेता है।"
कुएँ से ठंडी हवा आ रही थी। मेरे कानों में वो आवाज़ फिर गूँजी — "जगदीश… तू आ गया?" पर अब उस आवाज़ में नाम बदल गया था। अब मैं सुन रहा था — रघुवीर।
"माई," मैंने कहा, "अंदर कोई ज़िंदा है। मैंने आवाज़ सुनी। कल रात।"
माई ने अपनी आँखें बंद कर लीं। जैसे कोई बहुत पुराना दर्द याद आ गया हो।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैं बीस साल से सुन रही हूँ। पर मैं कुएँ के पास आने से डरती थी।"
"आप डरती थीं?"
"हाँ। क्योंकि अगर मैंने ढक्कन खोला और अंदर रघुवीर मिला… तो मुझे ये भी मानना पड़ता कि मैंने बीस साल एक ज़िंदा आदमी को कुएँ में सड़ने दिया।" उनकी आवाज़ टूटी। "और ये सोचकर मैं हर रात सो जाती थी कि वो भाग गया। भाग गया, तो ज़िंदा होगा। कहीं और होगा। खुश होगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके माथे पर चंदन की लकीर पसीने से फैल रही थी।
"कल रात," मैंने धीरे से कहा, "मैंने पत्थर हटाया। सीढ़ियाँ साफ़ थीं। कोई आता-जाता है।"
माई ने तुरंत मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में जो डर आया वो सच्चा था।
"किसी ने पत्थर हटाया?" उन्होंने पूछा। "किसने?"
"कालू काका ने।"
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