Spirit of a Fighter – Chapter 887
"वो जहाँ है," भैरव ने कहा, "वहाँ से तू उसे नहीं ला सकता। पर मैं ला सकता हूँ। एक शर्त पर।"
उसने अपना हाथ बढ़ाया।
"कॉपी दे। हड्डियाँ दे। और मैं तेरी माँ को छोड़ दूँगा। तू अखाड़े में नहीं उतरेगा। तू रामपुर से चला जाएगा। और मैं भूल जाऊँगा कि तू कभी आया था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में देखा — बुढ़िया की चेतावनी याद थी, पर मैंने देखा। और मुझे वो मिला जो मैं ढूँढ रहा था। डर। भैरव की आँखों में डर था। बहुत गहरा डर, मिट्टी में दबा हुआ, पर मौजूद।
"तू डरा हुआ है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीरे थी, इतनी धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके। "तू डरा हुआ है क्योंकि तू जानता है कि ये कॉपी अगर अखाड़े में गई, तो तेरा बीस साल का सच एक दिन में खत्म हो जाएगा।"
भैरव का हाथ हवा में रुका रह गया।
"तुझे पता है तेरे पिता ने मेरे साथ क्या किया था?" उसने कहा, और अब उसकी आवाज़ से गुड़ गायब हो गया था। "उन्होंने मुझे अपने बेटे से ज़्यादा प्यार दिया। मुझे पहलवानी सिखाई। मुझे मिट्टी में उतारा। और जब मैं उनसे आगे निकल गया, तो उन्होंने मुझे अखाड़े से निकाल दिया। कहा — तू ताकत से खेल रहा है। पर वो सच नहीं था। सच ये था कि वो मुझसे जलते थे।"
"वो सच नहीं है," मैंने कहा। "वो सच ये था कि तू उनके पीछे लगे बाहरी लोगों के पानी से ताकत ले रहा था। तू उनका अखाड़ा बेच रहा था।"
भैरव ने अपना हाथ नीचे किया। उसकी आँखें मेरी आँखों में टिकी थीं।
"तो ठीक है," उसने कहा। "तो खेल शुरू होता है।"
उसने मुड़कर अपने आदमियों को इशारा किया।
"कल सुबह, अखाड़े की मिट्टी में," उसने कहा। "तेरे और मेरे बीच। अगर तू जीता, तो तेरी माँ, तेरे पिता, तेरा सच — सब तेरा। और अगर मैं जीता…"
वो रुका। उसने मेरी छाती में लिपटी हड्डियों की तरफ़ देखा।
"…तो तेरे पिता की हड्डियाँ अखाड़े की मिट्टी में नहीं मिलेंगी। कुत्तों के सामने फेंकी जाएँगी।"
मेरे भीतर कुछ जम गया।
"कल सुबह," भैरव ने कहा। "अखाड़े में। अकेला आना।"
और वो मुड़ा। उसके आदमी उसके पीछे चले। मशालों की रोशनी दरवाज़े के उस पार फैल गई और फिर हवेली के अंधेरे में घुल गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी बाँहों में पिता की हड्डियाँ थीं और छाती में एक नई आग जल रही थी।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"अकेला मत जाना," उसने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा मशालों की बची हुई रोशनी में दिख रहा था — साफ़, ज़िद्दी, और मेरी तरफ़ झुका हुआ।
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। और मैंने हड्डियों को थोड़ा और कसा। "मेरे पिता मेरे साथ होंगे।"
कालू काका ने लालटेन उठाई और आगे बढ़े।
"अब चलो," उन्होंने कहा। "कल से पहले आज रात बहुत काम है।"
॥
कालू काका की लालटेन की रोशनी सुरंग की दीवारों पर काँप रही थी। मैंने हड्डियों की पोटली छाती से अलग की और उसे अपनी बाँहों में ऐसे पकड़ा जैसे कोई नवजात बच्चा हो। कॉपी मेरी कमर में खोंसी थी। भैरव का सच, भैरव का पूरा बीस साल, मेरी कमर से चिपका हुआ था।
टिंकू पीछे-पीछे हाँफ रहा था। उसकी टोपी गिर गई थी और कान के पीछे की पेंसिल किसी कोने में छूट आई थी, पर उसे इसकी फ़िक्र नहीं थी।
सुरंग के मोड़ पर कालू काका रुके। उन्होंने लालटेन ऊपर उठाई।
"सुनो," उन्होंने फुसफुसाया।
हम रुके। ऊपर से आवाज़ आ रही थी — किसी के दौड़ने की, फिर गिरने की, फिर एक औरत की आवाज़ जो किसी को कोस रही थी।
"ये सुक्खी बुआ हैं," टिंकू ने कहा। "मैं इस आवाज़ को कहीं भी पहचान लूँगा।"
कालू काका हँसे। पहली बार उस रात हँसे।
हम सुरंग के आख़िरी हिस्से से ऊपर चढ़े। कुएँ का ढक्कन पहले से खुला था — किसी ने हमारे जाने के बाद खोला था। मैं पहले बाहर निकला, फिर टिंकू, फिर कालू काका।
आसमान में सुबह की पहली किरण फूट रही थी। पूरब में आसमान गुड़ की चाशनी जैसा पीला हो रहा था, और पश्चिम में अभी भी रात का काला बचा हुआ था। आँगन में ओस थी। मेरे नंगे पैरों के नीचे मिट्टी ठंडी थी, और उस सुबह की हवा में नीम के फूलों की गंध थी।
तभी टिंकू ने दौड़ते हुए किसी को देखा और चिल्लाया।
"अरे! अरे रुक!"
मैंने देखा — हवेली के पिछले दरवाज़े से एक आदमी भाग रहा था, सिर पर पगड़ी बाँधे, हाथ में लाठी। वो पीछे मुड़ा, मुझे देखा, और उसका चेहरा ऐसे सफ़ेद पड़ गया जैसे उसने भूत देख लिया हो। फिर वो लाठी फेंककर भाग गया — इतनी तेज़ी से भागा कि उसकी एक चप्पल भी वहीं छूट गई।
"ये तो पहरेदार है," कालू काका ने कहा। "भैरव का आदमी।"
"तो भाग क्यों रहा है?" टिंकू ने पूछा।
कालू काका ने अपनी लालटेन उस भागते आदमी के पीछे उठाई और धीरे से बोले, "क्योंकि उसने देख लिया है कि मिट्टी ने अपना हिसाब रखना शुरू कर दिया है।"
मैं हवेली के पिछले दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था, पर दीवार पर टँगी मशालों की बची हुई लौ से मुझे रास्ता दिख रहा था। मैंने अंदर कदम रखा, और मेरे पैर के नीचे कुछ चटका — काँच का टुकड़ा।
आवाज़ सुनकर अंदर से एक औरत की आवाज़ आई।
"कौन है? सामने आ!"
मैं रुका। ये आवाज़ मेरी माँ की थी।
"माँ?" मैंने कहा।
भीतर से सन्नाटा। फिर तेज़ कदमों की आवाज़। फिर एक पतला साया दरवाज़े पर आया — सिर पर चोटी बिखरी हुई, साड़ी का पल्लू फटा हुआ, माथे पर हल्दी का टीका पसीने से बहा हुआ। मेरी माँ। मेरी माँ खड़ी थी, अपने दोनों हाथों से दरवाज़े का चौखट पकड़े, और उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।
"तू ज़िंदा है," उसने कहा। उसकी आवाज़ में कोई सवाल नहीं था, कोई खुशी नहीं थी — बस एक सीधी बात थी, जैसे वो बीस साल से यही सोच रही हो।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फँस गई।
वो दौड़कर आई। मुझे गले लगाया। उसके हाथ मेरी पीठ पर ऐसे बजे जैसे कोई चक्की चला रहा हो — तेज़, बेतरतीब, थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने मेरा सिर अपनी छाती से लगाया और कुछ कहा जो मैं समझ नहीं पाया, क्योंकि उसका मुँह मेरे बालों में दबा था।
तभी अंदर से एक और आवाज़ आई।
"भैया!"
गुड़िया। वो भागकर आई और मेरी कमर से चिपक गई। उसकी दोनों चोटियाँ खुल गई थीं, स्कूल की कॉपी उसके हाथ में थी, और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर वो रो नहीं रही थी। वो बस मुझे देख रही थी और बार-बार मेरा नाम ले रही थी, जैसे यकीन करना चाह रही हो कि मैं असली हूँ।
"भैया, तू आ गया," वो बोली। "मैं जानती थी। मैं जानती थी तू आएगा।"
मैंने उसे गले लगाया। उसका शरीर छोटा था, हड्डियाँ निकली हुईं, और उसके बालों में गोदाम की बदबू थी — गीली मिट्टी और सड़े अनाज की। मेरा गला भर आया।
"तू ठीक है?" मैंने पूछा।
"मैं ठीक हूँ," उसने कहा, और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई। "पर उस मोटे आदमी ने मुझे बहुत डराया, भैया। मैंने उसे बोला कि मेरा भैया आएगा तो तेरी मूँछें नोच लेगा।"
मैं हँसा। मेरी आँखों में पानी था और मैं हँस रहा था। माँ ने मेरा कंधा पकड़ा।
"तू बाहर कैसे?" उसने पूछा। "भैरव ने कहा था कि तू…"
वो रुकी। उसकी नज़र मेरी बाँहों में लिपटी पोटली पर पड़ी।
"ये क्या है?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने पोटली उसके सामने रखी। आँगन की ओस वाली मिट्टी पर। मैंने कपड़ा खोला।
हड्डियाँ। सफ़ेद, छोटी, टूटी हुई। उनमें कुछ जगह जली हुई काली थीं। कपड़े का एक टुकड़ा अभी भी एक हड्डी से चिपका हुआ था — नीला धागा, जो माँ ने खुद सिला था।
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