Spirit of a Fighter – Chapter 888
माँ ने हड्डियों को देखा। उसका चेहरा नहीं बदला। वो बस वहीं बैठ गई — धीरे से, जैसे कोई बोझ उठाने के बाद थककर बैठता है। उसने अपना हाथ बढ़ाया और हड्डियों को छुआ। उँगलियाँ काँप रही थीं, पर उसने पूरा हाथ रख दिया। उसकी हथेली हड्डियों पर टिकी रही।
और फिर वो चुपचाप रोने लगी। कोई आवाज़ नहीं। कोई सिसकी नहीं। बस होंठ काँप रहे थे, और आँसू उसके गालों पर गिर रहे थे, और उसकी आँखें खुली थीं — हड्डियों पर टिकी हुईं।
"माँ," मैंने कहा। "पिताजी मिल गए।"
वो कुछ नहीं बोली। बस हाथ हड्डियों पर रखे बैठी रही। मैं उसके पास बैठ गया। गुड़िया दूसरी तरफ़ बैठ गई। टिंकू और कालू काका पीछे खड़े रहे। किसी ने कुछ नहीं कहा।
बहुत देर बाद माँ ने अपना हाथ उठाया और मेरे सिर पर रखा।
"बीस साल," उसने धीरे से कहा। "बीस साल मैंने इस आदमी को सपने में भी नहीं देखा। और आज मेरा बेटा उसे मेरे पास ले आया।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर उनमें जो पहले डर था, वो चला गया था। उनमें कुछ और था — कुछ जो मैंने उसकी आँखों में पहली बार देखा।
"तूने वो किया जो तेरे पिता नहीं कर पाए," उसने कहा। "तू उन्हें घर ले आया।"
मेरा गला इतना भर गया कि मैं कुछ बोल नहीं पाया। मैंने बस सिर हिलाया।
गुड़िया ने मेरी कमर से चिपककर कहा, "अब भैया, अब हम उन मोटे आदमी को पकड़ेंगे न?"
"पकड़ेंगे," मैंने कहा। "आज ही।"
तभी टिंकू ने पीछे से कुछ कहा, पर उसकी आवाज़ रुँधी हुई थी।
"भाई, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"ये सब हो गया, पर मेरी बर्फ़ी का डिब्बा हवेली में ही छूट गया।"
मैं पलटा। टिंकू की आँखें भरी हुई थीं, और वो अपनी आस्तीन से नाक पोंछ रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे, पर वो मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था।
मैं हँसा। ज़ोर से हँसा। मेरी आँखों से पानी बह रहा था और मैं हँस रहा था, और टिंकू भी हँसने लगा, और गुड़िया भी, और माँ ने अपना आँचल मुँह पर रखकर एक आवाज़ निकाली जो रोने और हँसने के बीच की थी।
कालू काका ने लालटेन नीचे रखी और कहा, "डिब्बा मैं ले आऊँगा। तुम सब अखाड़े चलो। सूरज निकल रहा है।"
अखाड़े का फाटक खुला था। अंदर मिट्टी पर ओस की परत थी, और उस पर सुबह की पहली किरण पड़ रही थी। लाल मिट्टी लाल सोने जैसी चमक रही थी।
पहलवान पहले से इकट्ठे थे। कुछ खड़े थे, कुछ मिट्टी पर बैठे थे, कुछ दीवार के सहारे। जब मैं अंदर आया तो सबकी नज़रें मुझ पर आ गईं। मैं जानता था वो क्या देख रहे थे — एक मज़दूर, जो अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था, जिसे कुछ दिन पहले तक कोई नहीं जानता था। आज वो मिट्टी पर खड़ा था, बाँहों में अपने पिता की हड्डियाँ लिए।
माँ और गुड़िया पीछे रुक गईं। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "जा। तेरे पिता तेरे साथ हैं।"
मैं मिट्टी के बीच गया। मैंने पोटली खोली और हड्डियाँ उस लाल मिट्टी पर रख दीं। मिट्टी ने उन्हें अपने अंदर ले लिया, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को गोद में लेती है।
मैंने घुटने टेके। माथा मिट्टी पर टिकाया। मिट्टी की गंध मेरी नाक में भर गई — लाल मिट्टी, पसीना, और कुछ जो सिर्फ़ मैं सूंघ सकता था। पुरानी मिट्टी। पिता की मिट्टी।
मैं उठा। मैंने अपनी आवाज़ में जितनी ताकत थी, उतनी इकट्ठी की।
"ये मिट्टी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अखाड़े की दीवारों से टकराई, "आज से सिर्फ़ पहलवानों की नहीं है। आज से ये मेरे पिता की भी है। जो भी इस मिट्टी में पसीना डालेगा, वो भवानी सिंह के बेटे के साथ खड़ा होगा।"
सन्नाटा। पहलवान एक-दूसरे को देखने लगे। किसी ने कुछ नहीं कहा।
तभी व्हीलचेयर की आवाज़ आई। रणवीर सिंह आ रहे थे। कालू काका उन्हें धकेल रहे थे। रणवीर सिंह का चेहरा सुबह की रोशनी में और भी साफ़ दिख रहा था — बड़ी मूँछें, सफ़ेद बाल, और आँखों में वो आग जो बुझी नहीं थी।
वो मेरे पास रुके। उन्होंने हड्डियों को मिट्टी में देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"भवानी सिंह का बेटा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी, पर साफ़। "आज से ये अखाड़ा तेरा है।"
पहलवानों में हलचल हुई। एक बूढ़ा पहलवान आगे आया — मैंने उसे पहले भी देखा था, वो अखाड़े का सबसे पुराना पहलवान था, जिसकी पीठ झुकी हुई थी और जिसके कान मोटे थे।
"महाराज," उसने रणवीर सिंह से कहा, "ये बात तो ठीक है, पर ये लड़का अभी किसी बड़े मुकाबले में नहीं जीता।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे बेटे ने कभी भैरव के ज़हर से किसी को बचाया है?" उन्होंने पूछा।
बूढ़ा चुप हो गया।
"इसने बचाया है," रणवीर सिंह ने कहा। "और आज सुबह ही इसने अपने पिता की हड्डियाँ उस आदमी के गड्ढे से निकालकर इस मिट्टी में रखी हैं। जिसकी मिट्टी में अपने बाप की हड्डियाँ रखने की हिम्मत हो, वो अखाड़े का उत्तराधिकारी है।"
किसी ने ताली बजाई। फिर एक और। फिर सब बजाने लगे। मैंने आँखें उठाईं तो देखा — टिंकू पहले पंक्ति में खड़ा ज़ोर-ज़ोर से ताली बजा रहा था और उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
उसने आगे आकर अपनी डिब्बी खोली। उसमें लड्डू थे — बड़े, गोल, घी में लिपटे, ऊपर से पिस्ते की कतरनें।
"आज से मेरी मिठाई का नाम 'वीर का लड्डू' होगा," उसने घोषणा की। "और ये पहला लड्डू उसी को मिलेगा जिसने इस अखाड़े को उसके पिता से मिलाया।"
उसने पहला लड्डू मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने लिया। घी की गंध और शक्कर की मिठास मेरी नाक में भर गई, और मैं उसे खाते वक़्त सोच रहा था कि मैंने ऐसा लड्डू कभी नहीं खाया।
टिंकू ने दूसरा लड्डू माँ की तरफ़ बढ़ाया। माँ ने लिया और उसकी तरफ़ देखा।
"तेरी माँ जानती है कि तू यहाँ है?" माँ ने पूछा।
टिंकू का चेहरा उतर गया। "नहीं। मैंने उसे बोला था कि मैं दुकान पर हूँ।"
माँ ने एक हाथ उसके सिर पर रखा। "जा, उसे बता। और उसे लेकर आ। आज सबको खाना यहीं खिलाऊँगी।"
टिंकू की आँखें फैल गईं। वो मुड़ा और दौड़ा — अपनी टोपी भी नहीं ली, जो अभी भी हवेली में पड़ी थी।
मीरा अखाड़े के फाटक पर खड़ी थी। वो अंदर नहीं आई थी। मैंने उसे देखा — कुर्ता-सलवार, कंधे पर बैग, बाल हवा में उड़ रहे थे। उसके हाथ में एक छोटी पोटली थी, और उसके चेहरे पर वो पुरानी ज़िद वापस आ गई थी।
मैं उसकी तरफ़ गया।
"तू अंदर क्यों नहीं आई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मुझे पता है कि अगर मैं अंदर आई, तो तेरे सारे पहलवान सोचेंगे कि मैं तेरे पीछे पड़ी हूँ," उसने कहा। "और मुझे नहीं चाहिए कि तेरी जीत में मेरा हिस्सा दिखे।"
मैं हँसा। "मैंने अभी कोई जीत नहीं जीती।"
"आज जीतेगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो यकीन था जो मुझे सिर्फ़ उसकी आवाज़ में मिलता था। "पर एक बात सुन — कल मुकाबले में मेरी तरफ़ मत देखना। अगर तूने मेरी तरफ़ देखा, तो तेरा ध्यान बँटेगा और तू हार जाएगा।"
"अगर मैंने नहीं देखा, तो मैं कैसे जानूँगा कि तू वहाँ है?"
"तू जानेगा," उसने कहा, और उसके होंठ हिले। "मेरी दवाओं की गंध आएगी। तुलसी और अदरक। और तू उस गंध को कभी नहीं भूल सकता।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि उसने अपनी पोटली खोली।
"ये तेरे लिए है," उसने कहा। "कल के लिए।"
मैंने पोटली खोली। उसमें एक छोटी शीशी थी — हरी काँच की — और उस पर हाथ से लिखा था: "घाव पर लगाना। दर्द में पीना।"
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno