Spirit of a Fighter886 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 886

7 min read November 5, 2026

मैंने कॉपी अपने हाथ में ली और पन्ने उलटने लगा। हर पन्ने पर वही लिखाई। कहीं तारीख़ें थीं, कहीं नाम, कहीं हिसाब के आंकड़े। बीच में कुछ पन्ने फटे हुए थे — शायद किसी ने फाड़ने की कोशिश की थी, पर जल्दी में छोड़ दिए।

और फिर मैं आख़िरी पन्ने पर पहुँचा।

वहाँ लिखा था, बड़े अक्षरों में, नीचे की तरफ़ एक नाम — विक्रम।

मेरी साँस रुक गई।

"विक्रम," मैंने कहा। "भैरव का असली नाम।"

"पर यहाँ तो…" मीरा ने पन्ने के ऊपर की तरफ़ इशारा किया।

मैंने पढ़ा। पहली लाइन थी — "आज मैंने अपना नाम बदल लिया। अब मैं भैरव हूँ।"

मेरे हाथ काँपे। मैंने आगे पढ़ा।

"आज मैंने अपना नाम बदल लिया। अब मैं भैरव हूँ। और जिस दिन वीर अखाड़े में उतरेगा, उस दिन मैं उसे बताऊँगा कि उसके पिता ने अपने शिष्य को कैसे धोखा दिया था।"

मैं रुक गया। मेरी आँखें उस लाइन पर अटक गईं। "उसके पिता ने अपने शिष्य को कैसे धोखा दिया था।"

मेरे पिता ने? भवानी सिंह ने? जिसने अपने शिष्य को अपने बेटे से बचाया था? जिसने उसे अखाड़े से निकाला था क्योंकि वो बाहरी लोगों के पानी से खेल रहा था?

"ये झूठ है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कड़की। "भैरव झूठ लिख रहा है। अपने लिए। अपने मन को समझाने के लिए।"

"वीर," मीरा ने धीरे से कहा, "नीचे देख।"

मैंने पन्ने के नीचे देखा।

उस लाइन के नीचे, जगह छोड़कर, ताज़ी स्याही से कुछ जोड़ा गया था। स्याही अभी गीली लग रही थी। अक्षर भैरव के हाथ के नहीं थे — ये अक्षर पतले थे, काँपते हुए, जैसे लिखने वाले का हाथ बूढ़ा हो।

वहाँ लिखा था — "वो दिन कल है।"

मुझे लगा जैसे कुएँ की सारी ठंडक मेरे शरीर में उतर आई है। मैंने पन्ने को करीब लाकर देखा। स्याही में एक गंध थी। बादाम का तेल। और कपूर।

"नंदकिशोर," मैंने कहा। "ये उसने लिखा है। उसने ये कॉपी पहले पढ़ी है।"

मैंने चारों तरफ़ देखा। आँगन खाली था।

नंदकिशोर गया था।

दोनों मज़दूर भी गए थे। कुदालें मिट्टी में धँसी पड़ी थीं। उनके पैरों के निशान गड्ढे से लेकर आँगन की दीवार तक गए थे और उसके बाद गायब हो गए थे।

"वो भाग गया," मीरा ने कहा। "हम बात करते रहे और वो…"

"उसने भागकर कुछ नहीं किया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में वो ठंडक आ गई थी जो ख़तरे में अपने आप आ जाती है। "उसने ये कॉपी पहले पढ़ी थी। उसने ये लाइन जोड़ी थी। वो चाहता था कि मैं ये पढ़ूँ। वो यही चाहता था।"

मैंने पन्ने को पलटा। आख़िरी पन्ने के पीछे भी कुछ लिखा था — छोटा-सा, कोने में, जैसे कोई जल्दी में लिखकर भूल गया हो।

"वो जो कुएँ में बैठी है," मैंने पढ़ा, "वो मेरी माँ नहीं है। वो भवानी की माँ है। और भवानी ने मुझे उससे दूर रखा था। इसीलिए मैंने उसे कुएँ में डाला। ताकि भवानी को पता चले कि उसकी माँ किसके हाथ में है।"

मेरे हाथ से कॉपी छूट गई।

वो मिट्टी पर गिरी और खुली रह गई, पन्ने हवा में हिले।

"वो बुढ़िया," मीरा ने धीरे से कहा। "जो कुएँ में थी। जिसने हमें अंगूठी दी। जो भवानी की माँ है।"

"वो झूठ बोल रही थी?" मेरी आवाज़ टूटी।

"नहीं," कालू काका ने कहा। उन्होंने लालटेन नीचे की और कॉपी उठाई। "वो झूठ नहीं बोल रही थी, बेटा। ये भैरव लिख रहा है। और भैरव ने उसे कुएँ में डाला था — ये सच है। पर क्यों डाला, ये वो अपने फ़ायदे के लिए लिख रहा है। सच को अपनी तरफ़ से मोड़ रहा है।"

उन्होंने पन्ना पलटा और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"देख," उन्होंने कहा। "यहाँ नीचे और लिखा है।"

मैंने देखा। नीचे की तरफ़, किनारे पर, बहुत छोटे अक्षरों में — वो अक्षर भी भैरव के ही थे, पर ये लिखाई बहुत पुरानी थी, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।

"पर मैं उससे ये नहीं कहूँगा। मैं उसे ये कभी नहीं बताऊँगा कि मैंने उसकी माँ को क्यों कुएँ में डाला। वो मरेगा ये सोचकर कि उसकी माँ को भवानी ने छोड़ दिया था। ये उसकी सबसे बड़ी सज़ा होगी।"

मेरा सिर चकराया।

मैं गड्ढे की दीवार के सहारे बैठ गया। मेरे हाथ में अभी भी हड्डियों की गंध थी और मेरी छाती में पिता का वो कपड़ा था जो मीरा ने सँभालकर रखा था।

"तो वो बुढ़िया," मैंने धीरे से कहा, "वो सच बोल रही थी। भैरव ने उसे कुएँ में डाला। पर उसने मुझे ये नहीं बताया कि वो क्यों डाला गया।"

"उसने तुझे अंगूठी दी," कालू काका ने कहा। "और मुहर दी। ये दोनों सच्ची हैं। भैरव की लिखाई झूठ बोल सकती है, पर उसकी मुहर नहीं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"तो अब क्या?" मैंने पूछा।

कालू काका ने लालटेन उठाई और गड्ढे की दीवार पर रोशनी डाली। रोशनी में मिट्टी की परतें दिख रही थीं — ऊपर काली, नीचे लाल, और बीच में एक सफ़ेद पतली परत। चूने की।

"अब हम इन्हें लेकर अखाड़े चलेंगे," उन्होंने कहा। "पर सीधे नहीं। पहले उस जगह से होकर जहाँ भैरव हमें देख न सके। और एक बात, बेटा।"

"क्या?"

"जब तू ये कॉपी अखाड़े में ले जाएगा," उन्होंने कहा, "तो वो सिर्फ़ तेरे हाथ में नहीं होगी। वो भैरव के हाथ में भी होगी। क्योंकि भैरव इस कॉपी के बारे में जानता है। और वो जानता है कि तू उसे पढ़ चुका है।"

मैंने कॉपी उठाई और उसे अपनी कमर में खोंसा। मैंने हड्डियों को मीरा के आँचल से लिया और उन्हें उसी सफ़ेद कपड़े में लपेटा। फिर मैंने एक पल के लिए उन्हें अपने माथे से लगाया।

"अब चलें," मैंने कहा।

"कहाँ?" मीरा ने पूछा।

"अखाड़े," मैंने कहा। "भैरव के कमरे में। माँ वहीं है।"

हम गड्ढे से बाहर निकले। कालू काका आगे, लालटेन लिए। मीरा मेरे बगल में, और मेरे हाथ में पिता।

पर हम तीन कदम भी नहीं चले थे कि हवेली के सामने वाले दरवाज़े से एक आवाज़ आई — ठहरी हुई, धीमी, पर इतनी भारी कि हवा रुक गई।

"वीर सिंह।"

मैं ठिठका। मैंने पलटकर देखा।

दरवाज़े के फ्रेम में एक आदमी खड़ा था। भारी शरीर। चौड़ी छाती। बड़ी मूँछें जिनके सिरे तक तेल चमक रहा था। लाल धोती। गले में सोने की चेन।

भैरव सिंह।

उसके पीछे और भी लोग थे — दो, चार, छह। मशालें उनके हाथों में थीं और मशालों की रोशनी भैरव के चेहरे पर पड़ रही थी। उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था। कोई हँसी भी नहीं। बस वो शांत था, और यही सबसे डरावना था।

"तूने मेरे कुएँ में हाथ डाला," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ मीठी थी, जैसे गुड़। "और मेरी कॉपी निकाली। भवानी की हड्डियाँ निकालीं।"

मैंने हड्डियों को अपनी छाती से और कसा।

"ये मेरे पिता हैं," मैंने कहा। "ये तेरे हाथ में कैसे आए?"

भैरव ने एक कदम आगे बढ़ा। उसके जूतों की आवाज़ आँगन की मिट्टी पर गूँजी।

"तेरे पिता," उसने कहा, और उसके होठों पर एक पतली-सी रेखा आई — मुस्कान नहीं, कुछ और। "भवानी सिंह। जिसने मुझे अखाड़े से निकाला। जिसने मेरा नाम मिटाया। जिसने मुझे बीस साल के लिए ज़िंदा लाश बना दिया।"

"तूने उन्हें मारा," मैंने कहा।

"मैंने उन्हें मारा नहीं," भैरव ने कहा। "मैंने उन्हें सिर्फ़ रोका। उन्हें रोकना ज़रूरी था। वो मेरे रास्ते में थे।"

उसने एक और कदम बढ़ाया। मैं पीछे नहीं हटा।

"अब सुन, वीर," भैरव ने कहा। "तूने जो कॉपी निकाली है, वो मेरी ज़िंदगी है। उसमें मेरा नाम है, मेरा हिसाब है, मेरा सच है। अगर तू इसे अखाड़े में ले गया, तो मैं तेरी माँ को ज़िंदा नहीं रखूँगा।"

मेरी मुट्ठी कस गई।

"मेरी माँ कहाँ है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँपी नहीं, ये मैंने सुनिश्चित किया।

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