Spirit of a Fighter – Chapter 885
जब मैं आँगन में पहुँचा तो वो पलट चुका था। लालटेन उसके हाथ में काँप रही थी, और उसकी रोशनी उसके आधे चेहरे पर पड़ रही थी।
"तू…" उसने शुरू किया, पर आगे नहीं बोला।
"मैं," मैंने कहा। "और ये गड्ढा बंद होगा।"
उसने कुदाल वाले मज़दूरों को इशारा किया। दोनों ने कुदाल उठाई। मैंने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं।
"ये दोनों मुझे नहीं रोक सकते," मैंने कहा। "तुझे पता है। जिस रात मैंने तेरे बारह आदमियों के हाथ काँपे थे, तू वहीं खड़ा था।"
नंदकिशोर ने लालटेन नीचे की। उसकी आँखें मेरी आँखों पर टिकी थीं, पर बुढ़िया की बात मेरे कानों में बज रही थी — आँखों में मत देखना। मैंने अपनी नज़र उसकी छाती पर टिका दी, जहाँ सोने की चेन थी।
"तू जो खोद रहा है," मैंने कहा, "वो मेरे पिता हैं।"
"तेरे पिता?" नंदकिशोर हँसा। वो हँसी खोखली थी, डर से भरी। "तेरे पिता तो शेर सिंह थे, और वो भी तेरे नहीं थे। तेरे पिता कोई नहीं था। तू एक…"
"चुप।"
मेरी आवाज़ इतनी नीची थी कि मैं खुद चौंक गया। आँगन में सन्नाटा छा गया। कुदाल वाले दोनों मज़दूरों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
"तू जो भी बोलेगा," मैंने कहा, "वो मेरे कानों तक आएगा। और मैं तेरे हर शब्द को याद रखूँगा। तेरे हर शब्द का हिसाब लूँगा। इसलिए सोच समझकर बोल। अभी तेरे पास एक ही सवाल है — और वो ये कि गड्ढा बंद करे या न करे।"
नंदकिशोर ने लालटेन को दूसरे हाथ में पकड़ा। उसकी उँगलियाँ लोहे के हैंडल पर सफ़ेद पड़ गई थीं।
"गड्ढा…" उसने धीरे से कहा, "गड्ढा तो खुदेगा। पर सोच ले, वीर। अगर तूने ये हड्डियाँ उठाईं और अखाड़े में ले गया, तो भैरव तुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। भैरव वो नहीं जो तू सोचता है। भैरव सिर्फ़ पानी नहीं देता। भैरव के पास और भी चीज़ें हैं।"
"भैरव की चीज़ें मेरे पास आ रही हैं," मैंने कहा। "एक-एक करके।"
मैंने कदम बढ़ाया। नंदकिशोर पीछे हटा और उसका पैर गड्ढे के किनारे की मिट्टी पर पड़ा। वो लड़खड़ाया। लालटेन उसके हाथ से छूटी और मिट्टी पर गिरी, पर बुझी नहीं। रोशनी ज़मीन से ऊपर उठी और गड्ढे की दीवारों पर फैल गई।
और उसी रोशनी में मैंने देखा।
गड्ढे की दीवार में एक सफ़ेद कपड़ा दिख रहा था। कपड़ा गीला था, सिकुड़ा हुआ। उसके नीचे से कुछ उभरा हुआ था। मैंने अपनी आँखों पर भरोसा नहीं किया, पर गंध ने भरोसा दिया। चूना। गीली मिट्टी। और… और वो हल्की-सी ख़ुशबू जो मुझे बचपन से पता थी, जो मेरे पिता की धोती से आती थी। कपूर और तुलसी।
मैंने एक झटके में गड्ढे में छलाँग लगाई।
"वीर!" मीरा की आवाज़ पीछे से आई।
मैंने हाथ से मिट्टी हटाई। मिट्टी ठंडी थी और उसमें चूने के छोटे-छोटे टुकड़े मिले थे। मेरे नाखूनों में मिट्टी भर गई। मैंने तेज़ी से खोदा, बिना किसी औज़ार के, बिना सोचे। दो कुदाल वाले मज़दूर सामने खड़े देख रहे थे और उनमें से एक ने कुछ बुदबुदाया, पर मैंने सुना नहीं।
फिर मेरी उँगली एक सख़्त चीज़ पर अटकी।
सफ़ेद कपड़ा।
मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा और खींचा। कपड़ा भारी था। वो गीला था, पर सूख चुका था — पूरी तरह नहीं, बस ऊपर से। जैसे कोई चीज़ बहुत सालों तक सील में रही हो और अभी खुले में आई हो।
मैंने कपड़े को खोला।
हड्डियाँ।
छोटी-छोटी, साफ़ रंगी हुई, कुछ जगह पीली पड़ गई थीं। वो सलीके से रखी थीं — जैसे किसी ने प्यार से, धीरे-धीरे, बिना जल्दी के रखी हों। एक पसली के टुकड़े पर धागे का निशान था। एक हड्डी टूटी हुई थी, और उसके जोड़ पर कुछ लिपटा हुआ था — पुराना कपड़ा, जो अब मिट्टी जैसा लग रहा था।
मेरे हाथ रुक गए।
मैंने कपड़े के कोने को उठाया। उसके नीचे एक छोटी पीतल की तश्तरी थी। तश्तरी पर खुदाई थी — घिसी हुई, पर पढ़ी जा सकती थी।
"भवानी सिंह — जो मिट्टी से कभी नहीं डरा।"
मेरी आँखों के आगे सब धुंधला हो गया।
मैं उस गड्ढे में बैठ गया, घुटनों के बल, और हड्डियों को अपनी छाती से लगा लिया। वो ठंडी थीं। एक हड्डी मेरी बाँह के नीचे दब गई और मुझे लगा जैसे कोई मेरी बाँह में हाथ डाल रहा हो।
और फिर मैं रोया।
न जाने कितने साल के रोए हुए आँसू थे। मैं नहीं जानता कि मैं कितनी देर रोया। मुझे सिर्फ़ याद है कि मेरा माथा हड्डियों पर टिका था और मेरा गला ऐसे फट रहा था जैसे कोई पुरानी गाँठ खुल रही हो। मैंने पिता को कभी नहीं देखा था। मैंने उनकी आवाज़ नहीं सुनी थी। मेरे पास उनकी सिर्फ़ एक चीज़ थी — वो पीली शीशी और माँ की आँखों में छुपा हुआ एक नाम। और अब मेरे हाथ में उनकी हड्डियाँ थीं। वो भी टूटी हुई, मिट्टी में मिली हुई, किसी की खोदी हुई।
"पिताजी," मैंने फुसफुसाया। मेरी आवाज़ मेरी ही नहीं लग रही थी। "अब आप मिट्टी में नहीं, मेरे साथ चलेंगे। हर मुकाबले में। हर दाँव में।"
मेरे आँसू हड्डियों पर गिर रहे थे और उन पर चमक आ रही थी। मैंने उन्हें सीने से और कसा।
तभी मुझे लगा कि मेरी कमर पर कोई हाथ है। मैंने पलटकर देखा। मीरा गड्ढे के किनारे बैठी थी, उसके घुटने मिट्टी में धँसे थे। उसका हाथ मेरी कमर पर था और वो कुछ नहीं बोल रही थी। उसकी आँखें भी गीली थीं। कालू काका गड्ढे के दूसरी तरफ़ खड़े थे, लालटेन ऊपर उठाए, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे वो कोई पुरानी प्रार्थना याद कर रहे हों।
मुझे नहीं पता कि कितनी देर हुई। पर जब मैंने सिर उठाया तो आसमान में तारे दिख रहे थे और मेरी साँस सीधी चल रही थी।
"अब मैं इन्हें अखाड़े की मिट्टी में दफ़नाऊँगा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ बैठी हुई थी, पर साफ़ थी। "जहाँ सब देखें। जहाँ भैरव देखे। जहाँ नंदकिशोर देखे। जहाँ पूरा रामपुर देखे।"
कालू काका ने लालटेन थोड़ी और ऊपर की, और उसकी रोशनी हड्डियों पर पड़ी। तभी उन्होंने कुछ कहा।
"रुक, बेटा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"नीचे कुछ है," उन्होंने कहा। "कपड़े के नीचे।"
मैंने हड्डियों को धीरे से मीरा की तरफ़ बढ़ाया। उसने बिना कुछ कहे उन्हें अपने आँचल में ले लिया — सावधानी से, जैसे कोई नई माँ बच्चे को उठाती हो। मैंने मिट्टी में हाथ डाला और कपड़े के उस कोने को हटाया जो अभी भी गड्ढे की मिट्टी में दबा था।
वहाँ एक डिबिया थी।
पीतल की। छोटी, मुट्ठी भर की। ऊपर से हरी पड़ी हुई, पर जैसे ही मैंने उसे उठाया, उसका ढक्कन हल्का-सा हिला। वो बंद नहीं था। बस रखा हुआ था।
मैंने ढक्कन खोला।
अंदर एक कॉपी थी। छोटी, मोटी, जिल्द चमड़े की — जो अब सख़्त हो चुकी थी। उसके साथ दो नोटों के बंडल थे, जो रबर बैंड से बँधे थे। रबर बैंड सूखकर टूट चुका था, पर नोट चिपके हुए थे।
मैंने कॉपी बाहर निकाली। कवर पर कुछ लिखा नहीं था। मैंने पन्ना उलटा।
अक्षर भरे हुए थे — घसीटे, पर साफ़, जैसे लिखने वाले को जल्दी हो। कहीं-कहीं स्याही फैली थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँपा हो।
"क्या है?" मीरा ने पूछा।
मैंने वो पन्ना उसकी तरफ़ बढ़ाया। मीरा ने लालटेन के पास झुककर पढ़ा। उसके होठ हिले, फिर रुके। फिर वो पीछे हटी और उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे उसने कुछ ऐसा देखा हो जो उसकी समझ से बाहर हो।
"ये…" उसने धीरे से कहा। "ये तो भैरव के हाथ की लिखाई है।"
"क्या?"
"देख," उसने उँगली रखी। "ये 'क' ऐसे ही लिखता है भैरव। मैंने उसकी हिसाब की कॉपी देखी है। ये वही झुकाव है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno