Spirit of a Fighter884 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 884

7 min read November 5, 2026

"तो भैरव को क्यों नहीं रोका?" मैंने पूछा। "तू जानती थी कि वो क्या कर रहा है।"

"मैं बूढ़ी हूँ, वीर।" उसकी आवाज़ अब पास से आ रही थी। "मेरे पास ताक़त नहीं, बस ज़ुबान है। और ज़ुबान से भैरव जैसे आदमी को नहीं रोका जा सकता। उसे रोकने के लिए हड्डियाँ चाहिए। उसका नाम मिटाना पड़ेगा। पर उसने पहले ही सब संभाल लिया था। मेरे पास बस यही कुवा बचा था। और ये लिखने का काम।"

"लिखने का काम?"

"जो भी नीचे आए, वो पढ़े और लौट जाए," उसने कहा। "तेरे पहले तीन आए थे। तीनों लौट गए। तू पहला है जो आगे बढ़ रहा है।"

मीरा ने मेरा हाथ दबाया।

"वो चूना सच में है?" मीरा ने पूछा।

"है," बुढ़िया बोली। "और सच में जलाता है। पर वो जलन उसी को लगेगी जो डरकर भागेगा। जो ठहरा रहेगा, उसके लिए रास्ता खुला है।"

नीचे का अँधेरा अब हल्का हो रहा था। लालटेन की रोशनी में मुझे एक चबूतरा दिखा, और उस पर बैठी एक बूढ़ी औरत। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, आँखें धँसी हुईं, और गोद में एक पुरानी लोहे की टोकरी रखी थी। टोकरी खाली थी।

"आ," उसने कहा, और अपनी गोद से टोकरी हटाकर बगल में रख दी। "बैठ।"

मैं नहीं बैठा। मैंने टोकरी की तरफ़ देखा।

"वो खाली है," वो बोली, मेरी नज़र पकड़कर। "क्योंकि तेरी हड्डियाँ वहाँ हैं। जो तू लाया है, वो असली हैं। भैरव ने जो टोकरियाँ भेजीं, वो नक़ली थीं — कुत्ते की हड्डियाँ, बकरी की। पर तेरे पास भवानी की असली हड्डियाँ हैं।"

मेरा गला सूख गया।

"तुझे कैसे पता?"

"क्योंकि मैंने उसे खुद दफ़नाया था," वो बोली। "रात को, अकेले, अपने हाथों से। और उस रात भैरव कुएँ के मुँह पर खड़ा था, देख रहा था, और कुछ नहीं बोला।"

मीरा ने मेरी बाँह छोड़ी और एक कदम आगे बढ़ी।

"तो तू हमारी तरफ़ है या उसकी?" उसने सीधा पूछा।

बुढ़िया मुस्कुराई। उसके मुँह में एक भी दाँत नहीं था।

"मैं अपने बेटे की तरफ़ हूँ," उसने कहा। "और भवानी चाहता था कि सच बाहर आए। इसलिए मैंने बीस साल इंतज़ार किया। इसलिए मैंने वो लिखा जो तूने दीवार पर पढ़ा। ताकि जो भी आए, डरे ज़रूर, पर लौटे नहीं।"

वो उठी। उसकी कमर टेढ़ी थी, और वो चलते वक़्त एक तरफ़ झुक रही थी। वो चबूतरे के पीछे गई और वहाँ से एक पुरानी पोटली उठाकर लाई।

"ये भवानी की अंगूठी है," उसने कहा। "और ये उसका निशान है — अखाड़े के काग़ज़ों पर जो निशान लगता था। भैरव ने जो भी काग़ज़ बनाए, वो इस निशान के बिना हैं। जिस दिन तू ये निशान सबके सामने रखेगा, उस दिन भैरव का सच खुद बोलेगा।"

मैंने पोटली ली। उसमें एक भारी अंगूठी थी, और एक छोटी सी मुहर। मुहर पर वही निशान था जो मैंने कई बार काग़ज़ों के कोनों पर देखा था।

"पर एक बात," बुढ़िया ने मेरी आँखों में देखा। "भैरव को पता है कि मैं ज़िंदा हूँ। वो जानता है कि मैंने तुझे कुछ दिया है। अब वो तेरी माँ से बड़ा कुछ माँगेगा।"

मेरी छाती में धक्का लगा।

"माँ?" मैंने कहा। "तू जानती है मेरी माँ कहाँ है?"

"मैं नहीं जानती," उसने कहा। "पर मैं जानती हूँ कि भैरव उसे कहाँ नहीं रखेगा। वो उसे उसी जगह नहीं रखेगा जहाँ पहले रखता था। तेरा कालू वहाँ जाएगा और खाली हाथ लौटेगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो डर था जो मैंने पहली बार देखा था।

"तो वो कहाँ होगी?" मीरा ने पूछा।

बुढ़िया ने अपनी टेढ़ी कमर सीधी करने की कोशिश की और कुएँ की दीवार की तरफ़ देखा।

"भैरव की एक आदत है," वो बोली। "जो चीज़ उसे सबसे प्यारी हो, वो उसे अपने बिस्तर के नीचे रखता है। वो अपने दुश्मन की सबसे कीमती चीज़ अपने सिरहाने रखता है। ताकि जब वो सोए, तो उसे लगे कि वो जीत गया है।"

"तो माँ अखाड़े में है?" मैंने पूछा। "उसके कमरे में?"

"मैं इतना नहीं जानती," उसने कहा। "पर मैं इतना जानती हूँ कि अगर तू जल्दी पहुँचेगा, तो वो उसे वहाँ से हिला भी नहीं पाया होगा।"

मैंने पोटली कमर में बाँधी और सीढ़ियों की तरफ़ मुड़ा। पर बुढ़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ हड्डी जैसी थीं।

"एक बात और," उसने कहा। "जब तू भैरव के सामने जाए, तो उसके आँखों में मत देखना। वो आँखों से ही काम करता है। जो उसकी आँखों में देखता है, वो उसका हो जाता है।"

मैंने सिर हिलाया।

"और बेटा," उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार नरम हुई, "जब तू उसका नाम मिटाए, तो मेरा नाम भी मिटा देना। मैं उसके साथ जाना नहीं चाहती। मैं भवानी के पास जाना चाहती हूँ।"

मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

ऊपर आकर मैंने पत्थर को हटाया और मुँह खुला छोड़ दिया। मीरा मेरे पीछे आई।

"अब?" उसने पूछा।

"अब अखाड़ा," मैंने कहा। "और माँ।"

हम भागे।

॥

हम भागे।

पर भागते हुए मेरे पैर कुएँ की सीढ़ियों से आगे नहीं बढ़ रहे थे। मीरा मेरे बराबर में थी, उसकी साँस मेरी बाँह से टकरा रही थी। ऊपर आकर मैंने पत्थर को कंधे से धकेला और झाँका। हवेली के पिछले आँगन में रोशनी बढ़ गई थी। किसी ने मशालें जला दीं। धुएँ के साथ मिट्टी का तेल भी ऊपर आ रहा था।

"रुक," मैंने मीरा की कलाई पकड़ी। "सीधे मत जाना।"

"माँ?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "सुगंध।"

मैंने आँखें बंद कीं। नीचे से आ रही हवा में तीन अलग-अलग बदबू थीं। एक गीली मिट्टी की — कुएँ की। दूसरी मिट्टी के तेल की और धुएँ की। तीसरी… बादाम के तेल की। वही तेल जो नंदकिशोर के हाथों पर लगा रहता है। पर इस बार उसमें कुछ और मिला हुआ था। कपूर। और… ताज़ी खोदी हुई मिट्टी।

"वो यहाँ है," मैंने आँखें खोलीं। "नंदकिशोर। और वो कुछ खोद रहा है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था।

"तो माँ कहाँ…"

"माँ नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजीब लगी। "वो हड्डियाँ खोद रहा है।"

मीरा एक पल के लिए चुप हो गई। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और कसा।

"तो हम पहले उसे रोकेंगे," उसने कहा। "हड्डियाँ भी और माँ भी। दोनों।"

हम सीढ़ियों से ऊपर निकले और हवेली की पिछली दीवार के साए में रुके। रोशनी कुछ दूर थी। मैंने झाँका। आँगन के बीच में एक गड्ढा खुदा था। दो मज़दूर कुदाल लिए खड़े थे और नंदकिशोर उनके बीच में था, हाथ में लालटेन पकड़े। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी, पर सिर झुका हुआ था। वो कुछ बोल रहा था — धीरे, जैसे कोई कब्र पर मंत्र पढ़ रहा हो।

गड्ढे के किनारे एक चादर बिछी थी। उस पर अभी सिर्फ़ मिट्टी थी। पर मैं देख सकता था कि गड्ढा अभी आधा ही खुदा था। यानी वो पहुँच गया था, पर उसने हड्डियाँ उठाई नहीं थीं।

मेरे भीतर एक अजीब बात हुई। डर भी था और एक तरह का… एक तरह का आराम भी। कि पिता अभी भी उसी जगह हैं। किसी के हाथ में नहीं आए।

"वीर," मीरा ने फुसफुसाया। "पीछे से जाना है या सामने से?"

"सामने से," मैंने कहा। और मैंने खुद भी नहीं सोचा था कि मैं इतनी जल्दी ये कहूँगा। "वो मुझसे डरता है। डरे हुए आदमी के हाथ काँपते हैं, और काँपते हाथ से कुदाल ठीक से नहीं चलती।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसके होठों पर एक हल्की-सी रेखा बनी — वो मुस्कान नहीं थी, पर उससे कम भी नहीं थी।

"तो चल," उसने कहा।

हम दीवार के साए से बाहर निकले। मैं सीधा चला — धीरे, आवाज़ करते हुए, ताकि मेरे पैरों की आवाज़ पहले पहुँचे और मेरा चेहरा बाद में। मुझे यही चाहिए था। नंदकिशोर पहले मेरे कदमों की आवाज़ सुने, फिर मेरी आवाज़ सुने, और आख़िर में मुझे देखे। तीन बार डरे, एक बार में नहीं।

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