Spirit of a Fighter – Chapter 883
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी सुबह की हवा में हिल रही थी।
"तू कुएँ जा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो चीज़ कुएँ में है, वो सिर्फ़ तेरी है। तेरे पिता ने उसे तेरे लिए रखा था। और अगर तू आज उसे नहीं उठाएगा, तो कल भैरव उसे उठा ले जाएगा — और फिर कभी नहीं मिलेगा।"
"पर माँ—"
"माँ को मैं ढूँढ़ूँगा।" कालू काका की आवाज़ में पक्कापन था। "मैं सत्तर साल से इस गाँव में हूँ, बेटा। मुझे हर कोठरी पता है, हर दरवाज़ा, हर वो जगह जहाँ भैरव किसी को छुपाता है। वो हमेशा उन्हें उसी गोदाम में रखता है — नीम के पेड़ के पास वाला, जहाँ पहले भी रखा था।"
"मैं भी जाऊँगा," टिंकू ने कहा। उसने अपनी टोपी उठाई। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर उसने टोपी सिर पर रखी और सीधा खड़ा हो गया। "कालू काका, मैं आपके साथ चलूँगा। मैं वो गोदाम जानता हूँ। मैं वहाँ की गली-गली जानता हूँ।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो डर रहा था — मैं उसकी आँखों में डर देख सकता था। वो टिंकू था, जो हर बार कहता था कि कल से कसरत शुरू करेगा। जो मिठाई में कभी नमक डाल देता था, कभी शक्कर भूल जाता था। जो कभी किसी से नहीं लड़ा था।
और आज वो खुद कह रहा था कि वो मेरी माँ को ढूँढ़ने जाएगा।
मेरा गला भर आया।
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप गई। मैंने उसका हाथ पकड़ा और उसे अपनी तरफ़ खींचा। "टिंकू, तू मेरी माँ को नहीं, मेरी पूरी दुनिया को लौटाने जा रहा है।"
उसकी टोपी उसके सिर से फिसल गई। वो मेरी गर्दन में मुँह छुपाकर रोने लगा।
"मैं लौटाऊँगा भाई," उसने काँपती आवाज़ में कहा। "मैं लौटाऊँगा। वरना मेरी मिठाई कभी मीठी नहीं लगेगी।"
कालू काका ने हम दोनों को देखा और उनकी आँखें भी भर आईं। पर उन्होंने जल्दी ही हाथ से आँखें साफ़ कीं और अपना सिर झटका।
"अब रोना बंद करो," उन्होंने कहा। "रोने का वक़्त नहीं है। जाओ, अपना काम करो।"
मीरा मेरी तरफ़ आई। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी सी पुड़िया निकाली।
"ये अदरक और काली मिर्च का चूर्ण है," उसने कहा। "अगर चूना लगे तो ये जलन रोकेगा। और ये…" उसने एक और पुड़िया निकाली, "…ये तुलसी और शहद है। साँस फूलने पर जीभ के नीचे रख लेना।"
मैंने पुड़ियाएँ लीं। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने उन्हें कमर में बाँध लिया।
"तू कहाँ जाएगी?" मैंने पूछा।
"मैं तेरे साथ चलूँगी।"
"मीरा, कुएँ में—"
"मुझे पता है कुएँ में क्या है।" उसने मेरी बात काटी। "मुझे पता है कि वहाँ चूना है। और मुझे यह भी पता है कि अगर तू अकेला गया और तुझे कुछ हो गया, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करूँगी।"
उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो पहले दिन अखाड़े के फाटक पर थी। जब उसने मुझे मिट्टी से बाहर धकेला था।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया।
फिर मैं कालू काका के पास गया और उनके पैर छुए। उन्होंने मेरा सिर सहलाया।
"मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "जो इसमें पसीना डालता है, वो इसे पहचानता है। तू इस मिट्टी का है। तू जानता है क्या करना है।"
मैंने सिर हिलाया और पलट गया।
टिंकू और कालू काका एक तरफ़ गए — नीम के पेड़ वाली गली की तरफ़। मैं और मीरा दूसरी तरफ़ — कुएँ की तरफ़।
मैंने पीछे मुड़कर एक बार देखा। टिंकू अपनी टोपी ठीक कर रहा था। उसकी चाल में वो लचक नहीं थी जो हमेशा रहती थी। आज वो सीधा चल रहा था। जैसे कोई आदमी चलता है जिसे पता हो कि पीछे लौटना है।
और मैं आगे बढ़ा।
कुएँ का मुँह अब भी खुला था। जिस पत्थर को कालू काका ने सरकाया था, वो अब भी एक तरफ़ धँसा हुआ था। मैंने नीचे देखा — अँधेरा। पर वो अँधेरा अब पहले जैसा नहीं था। अब मुझे उसमें रास्ता दिख रहा था। क्योंकि मुझे पता था कि नीचे क्या है।
मैंने पहला कदम रखा।
सीढ़ियाँ उसी तरह थीं — पत्थर की, उखड़ी हुईं, ऊपर काई जमी हुई। मैंने हाथ दीवार पर टिकाया। दीवार ठंडी थी और उस पर नमी थी।
और तभी मेरी उँगलियों को कुछ अटका।
मैंने हाथ वहीं रोका। दीवार पर कुछ खुदा हुआ था — ताज़ा खुदा हुआ। अक्षर अभी भी चौकोर थे, किनारों पर पत्थर की धूल बैठी थी।
मैंने लालटेन ऊपर की। मीरा मेरे पीछे आई और उसने भी देखा।
लिखा था —
"अगर तू हड्डियाँ उठाने आया है, तो नीचे पानी नहीं, चूना मिलेगा। और चूने में तेरा भी एक नाम जुड़ जाएगा।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये लिखाई ताज़ी है। किसी ने अभी-अभी लिखी है।"
मैंने अक्षरों को उँगली से छुआ। पत्थर की धूल उँगली पर लगी। और उस धूल के साथ एक गंध आई — बादाम के तेल की। वही गंध जो पहले काग़ज़ों पर थी। वही गंध जो भवानी सिंह की मौत वाली रात मौजूद थी।
मेरा खून ठंडा हो गया।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लग रही थी, "ये लिखने वाला अभी भी यहीं है।"
नीचे से एक हल्की हँसी आई। धीमी। जैसे कोई बूढ़ा अपने आप से बात कर रहा हो।
और फिर एक आवाज़ आई — बुढ़िया की, रूखी, जैसे सूखी लकड़ी चटके।
"आ जा, बेटा। मैं तेरी ही राह देख रही हूँ।"
मेरे पैर सीढ़ी पर जम गए। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी और हल्का सा खींचा — पीछे की तरफ़, ऊपर की तरफ़। पर मैं हिला नहीं।
"वीर," उसने मेरे कान के पास फुसफुसाया, "वो हमें नीचे बुला रही है। मतलब उसे पता है कि हम आए हैं। और उसे फ़र्क भी नहीं पड़ रहा।"
मैंने लालटेन की लौ देखी। वो स्थिर थी, जैसे नीचे से कोई हवा ही नहीं आ रही हो। पर अभी-अभी तो कोई हँसा था।
"बुढ़िया माँ," मैंने नीचे की तरफ़ आवाज़ दी। मेरी आवाज़ सीढ़ियों में गूँज कर पलटी और मेरे ही कानों में वापस आई।
नीचे से चटकती हुई हँसी फिर आई। इस बार लंबी।
"अरे, तू तो मुझे जानता भी है। अच्छा है। बता, तू किस मुँह से मेरा नाम ले रहा है? जिस भवानी सिंह की हड्डियाँ तेरे पास हैं, उसका बेटा होकर?"
मेरी मुट्ठी भींच गई। मेरा दूसरा हाथ दीवार पर था, और नाखून पत्थर में गड़ गए।
"तुझे क्या लगा?" वो बोली। "कि मैंने ये सब शौक़ से किया? भवानी मेरा बेटा था। मेरा। और उसकी हड्डियाँ उस आदमी ने कुएँ में फेंकी थीं।"
"कौन-सा आदमी?" मैंने पूछा। पर मेरे पेट में जवाब पहले से ही था।
"जिसका नाम अब भैरव है," वो बोली। "जिसे मैंने अपने हाथों से खिलाया था। जो भवानी का दोस्त हुआ करता था। जिसने उसी रात कहा था कि भाई, तू सो जा, मैं पहरा देता हूँ।"
मीरा की साँस मेरी गर्दन पर रुक गई।
"तो तूने…" मैंने धीरे से कहा।
"मैंने क्या किया?" बुढ़िया की आवाज़ में अचानक तेज़ी आई, जैसे सूखी लकड़ी में आग लग गई हो। "मैंने तेरे जैसा कुछ नहीं किया। मैंने उसका नाम नहीं मिटाया। मैंने उसकी माँ को नहीं उठाया। मैंने पानी में ज़हर नहीं घोला।"
"पर तूने चूना रखवाया," मीरा बोली। उसकी आवाज़ साफ़ थी, जैसे वो डर को अलग रखकर बोल रही हो। "तूने कुएँ में चूना रखवाया ताकि कोई हड्डियाँ न निकाल सके।"
"मैंने रखवाया," बुढ़िया बोली। "क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि कोई उन्हें छुए। वो मेरे बेटे की हड्डियाँ हैं। उन्हें उसी कुएँ में रहने दो जहाँ वो पिछले बीस साल से हैं। उन्हें कोई टोकरी में डालकर गली-गली घुमाएगा, ये मुझे मंज़ूर नहीं था।"
मैंने सीढ़ी का एक और कदम उतारा। मीरा मेरे साथ चली।
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