Spirit of a Fighter876 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 876

7 min read November 5, 2026

"मीरा—"

"नहीं, सुन।" उसने मेरी बात काट दी। "तू मुझे हर बार यही कहता है। 'तू रुक, तू यहाँ रह, ये तेरा काम नहीं।' जब पंचायत में मैंने तेरी तरफ़ से बोला था, तब भी तूने मुझे कहा था — 'तू चुप रह, तेरा नाम खराब होगा।' जब हवेली में आग लगी थी, तब भी तूने मुझे पीछे धकेला था।"

"मैं तुझे बचाने के लिए—"

"मुझे बचाने की ज़रूरत नहीं है!" उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी। गुड़िया नींद में करवट बदलकर माँ से चिपक गई। मीरा ने अपनी आवाज़ नीची की, पर उसमें आग बाकी थी। "मैं तेरे साथ खड़ी हूँ क्योंकि मैं चुनती हूँ, वीर। तेरे पीछे नहीं, तेरे साथ। और तू हर बार मेरी चुनाव को अपने डर से ढक देता है।"

मैं चुप हो गया।

क्योंकि वो सच कह रही थी।

"तू अपने दुख में सबको दूर धकेलता है," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। "यही तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। तू सोचता है कि अकेले लड़कर तू सबको बचा रहा है, पर असल में तू उन्हें तेरे साथ लड़ने से रोक रहा है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बालों में दीये की रोशनी पड़ रही थी, और उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थी।

मैंने कुछ कहना चाहा, पर गला सूखा हुआ था। मैं जानता था वो सच कह रही है। मैं जानता था कि मैं हर बार यही करता हूँ — जब पापा की बात आई, तब भी माँ को दूर किया। जब भवानी का सच खुला, तब भी मीरा से छुपाया। मैं मज़दूर था, और मज़दूर के हाथ सब कुछ उठा सकते हैं, पर कोई उसका हाथ नहीं थाम सकता — यही मैंने अपने दिल में बैठा लिया था।

"ठीक है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ नरम थी। "तू साथ चलेगी।"

मीरा ने आँखें झपकीं, जैसे उसे यक़ीन नहीं हुआ।

"पर एक बात," मैंने कहा। "मेरे पीछे नहीं। मेरे साथ। और अगर मैं कुछ ऐसा करूँ जो तुझे बुरा लगे, तो मुझे रोक देना। चुप मत रहना।"

उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर उसके होंठ हिले — एक छोटी-सी मुस्कान, जो जल्दी ही गायब हो गई।

"यही तो चाहिए था," वो बोली।

कालू काका ने बीच में खाँसा।

"बेटा," वो बोले, "मैं भी चलूँगा। वो रास्ता मैं जानता हूँ। कम-से-कम अंधेरे में तो मैं पत्थर पहचान लूँगा। और मेरी लालटेन तेरे काम आएगी।"

मैंने उनका कंधा थपथपाया।

"अब तू," मैंने नंदकिशोर की तरफ़ मुड़कर कहा, "अपने आदमियों को हटा। हमें जाने दे।"

नंदकिशोर ने शेराज़ की तरफ़ देखा। शेराज़ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा — वो अब भी गंगा देवी को देख रहा था, जैसे उसके भीतर कुछ चल रहा हो।

"शेराज़," नंदकिशोर ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार फुसफुसाहट आई, "इन्हें जाने दे। पर श्मशान की हद में मत आने दे। जो उस पार जाए, वो लौटकर मेरे पास न आए।"

शेराज़ ने सिर हिलाया। फिर वो हट गया, और उसके आदमी भी।

रास्ता खुला।

हम बाहर निकले — मैं, मीरा, कालू काका और गंगा देवी। माँ और गुड़िया हवेली में रह गईं, माँ की आँखों में वो चुप्पी लिए जो हर बार मेरे पीछे लगती है।

हवेली से निकलकर हम पीछे के कुएँ की तरफ़ बढ़े। रात ख़त्म होने को थी, पूरब में आसमान धुँधला-सा खुल रहा था। नहर तक पहुँचने में हमें आधा घंटा लगा — रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, और कालू काका की लालटेन बार-बार हवा में बुझने लगती थी।

नहर के किनारे पहुँचकर मैंने पानी देखा। उसका रंग आज काला नहीं था — सुबह की पहली रोशनी उसमें हल्की-सी उतर रही थी।

और तभी मैंने वो देखा।

पानी के भीतर, किनारे से थोड़ी दूर, कुछ चमका। दीये की तरह नहीं — ठंडी चमक, जैसे पीतल पर रोशनी पड़ी हो।

मैं रुक गया। मीरा मेरे पीछे आ टकराई।

"क्या हुआ?" उसने पूछा।

"वहाँ," मैंने उँगली से इशारा किया। "पानी के अंदर कुछ है।"

कालू काका ने लालटेन उस तरफ़ घुमाई। रोशनी पानी पर पड़ी और चमक फीकी पड़ गई, जैसे वो उजाले से डरती हो।

मैंने धोती ऊपर की और पानी में उतर गया। ठंडक पाँव से सीधे छाती तक गई। मैंने झुककर हाथ आगे बढ़ाया, और मेरी उँगलियों को कुछ ठंडा छुआ।

मैंने उसे उठाया।

पीतल की अंगूठी थी। छोटी, पुरानी, और उस पर धूल की परत जमी थी। मैंने उसे हथेली पर रखकर पानी से बाहर निकाला, और मीरा ने लालटेन की रोशनी उस पर डाली।

अंगूठी के ऊपर कुछ खुदा हुआ था। घिसा हुआ, पर पढ़ा जा सकता था।

"भवानी।"

मेरी साँस रुक गई।

"ये—" मेरी आवाज़ फटी। "ये पापा की अंगूठी है।"

गंगा देवी ने आगे बढ़कर अंगूठी को गौर से देखा, और उनका चेहरा बदल गया। उन्होंने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और अंगूठी को उलट दिया।

उसके भीतर ताज़ी मिट्टी लगी थी। गीली, लाल, और अभी-अभी किसी हाथ से लगी हुई।

"ये अंगूठी मैंने पंद्रह साल पहले भवानी की उँगली से उतारी थी," गंगा देवी ने धीरे से कहा। "और उस दिन मैंने इसे उस संदूक में रख दिया था जो तेरे पिता की हड्डियों के साथ गाड़ा गया था।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरा दिल धक-धक कर रहा था।

"तो ये यहाँ कैसे आई?" मैंने पूछा।

गंगा देवी ने नहर के पार देखा — जहाँ श्मशान था, जहाँ वो कुटिया थी, जहाँ नंदकिशोर की असली ताकत छुपी थी।

"क्योंकि," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो डर था जो अब तक नहीं था, "मेरा भाई तुझे बुला रहा है। वो चाहता है कि तू वहाँ जाए।"

मैंने अंगूठी मुट्ठी में कस ली, और उसके भीतर की मिट्टी मेरी हथेली पर चिपक गई।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, पर उसने कुछ नहीं पूछा। उसने बस अपना हाथ मेरी बाँह पर रख दिया।

और उसकी गर्माहट मेरी ठंडी खाल पर वैसे ही टिकी रही जैसे सुबह की पहली किरण मिट्टी पर टिकती है।

"मेरा भाई?" मैंने कहा। "मतलब… नंदकिशोर?"

गंगा देवी ने सिर हिलाया, पर उनकी आँखें नहर के पार टिकी थीं।

"वो मुझे बुला रहा है, ये तो ठीक है," मैंने कहा, "पर पापा की अंगूठी पानी में क्यों डाली? अगर उसे बुलाना था, तो सीधे आदमी भेज देता।"

"क्योंकि वो जानता है कि तू सीधे बुलाने पर नहीं आता," गंगा देवी ने कहा। "वो तुझे चुनने देता है। जब तक आदमी ख़ुद चलकर न आए, तब तक वो हारता नहीं। ये उसका सबसे पुराना हथकंडा है।"

कालू काका ने लालटेन नीचे की और अपनी आवाज़ धीमी कर दी।

"बेटा, मुझे एक बात याद आ रही है," वो बोले। "जब मैं जवान था, तब एक बार श्मशान के पास से गुज़रा था। रात थी। मैंने वहाँ कुटिया देखी थी — छोटी-सी, टूटी हुई। और उसके अंदर दीया जल रहा था। मैंने सोचा, कोई साधु-वाधू होगा। पर सुबह जब लौटा, तो कुटिया वहीं थी, दीया भी वहीं था — बुझा हुआ, और उसके चारों तरफ़ कोई पैरों के निशान नहीं थे। न अंदर जाने के, न बाहर आने के।"

"तो अंदर कौन था?" मीरा ने पूछा।

कालू काका ने कंधे उठाए। "आज तक नहीं जाना। पर उस रात मैंने एक आवाज़ सुनी थी — कोई नाम जप रहा था। 'भवानी… भवानी…' मैंने सोचा किसी की बेटी का नाम होगा। अब समझ आ रहा है कि वो क्या था।"

मेरी मुट्ठी में अंगूठी और गहरी कस गई। मिट्टी मेरी हथेली की लकीरों में भर गई थी, और उसकी गंध — वो लाल मिट्टी की गंध — मेरे पापा की गंध थी। वो गंध जो उनके कपड़ों से आती थी जब वो अखाड़े से लौटते थे। मैं उसे भूल चुका था। पंद्रह साल में मेरी नाक से वो गंध मिट गई थी। और आज वो मेरी हथेली से उठ रही थी।

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने पलकें झपकीं, पर पानी रुका नहीं।

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