Spirit of a Fighter877 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 877

7 min read November 5, 2026

"वीर।" मीरा ने मेरी बाँह दबाई।

"मैं ठीक हूँ," मैंने कहा, और आवाज़ कड़ी कर ली। "हमें अभी चलना चाहिए। सुबह होने से पहले।"

"रुक।" गंगा देवी ने मेरा रास्ता रोका। "तू ये अंगूठी पहन ले।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो उस पार जाता है, उसे वहाँ कुछ पहचानना पड़ता है। और ये अंगूठी तेरे पिता की है। श्मशान के मुर्दे अपने लोगों की चीज़ नहीं छीनते।"

मैंने अंगूठी अपनी उँगली में डाली। वो ढीली थी — पापा की उँगली मेरी उँगली से मोटी थी। पर जैसे ही मैंने उसे घुमाया, मिट्टी मेरी उँगली से रगड़कर गिर गई और अंगूठी कसकर बैठ गई। ऐसे जैसे उसे वहीं रहना था।

मीरा ने ये देखा और उसका चेहरा कठोर हो गया।

"अब सुन मेरी बात," मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा। "तू माँ और गुड़िया के पास लौट जा। अगर मैं लौटा, तो सबसे पहले तुझे बताऊँगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ सीधी लकीर बन गए थे।

"मैं तेरी बाँदी नहीं हूँ," वो बोली, "जो तू मुझे घर बिठा दे और ख़ुद जाकर शेर से लड़ आए।"

"ये लड़ाई नहीं है—"

"तो क्या है?" उसने मेरी बात काटी। "तू जानता है ना वहाँ क्या है? तुझे कुछ नहीं पता। तेरे पास सिर्फ़ एक अंगूठी है और एक बूढ़े आदमी की लालटेन। और तू मुझे घर भेज रहा है?"

कालू काका ने नज़रें चुरा लीं। गंगा देवी चुप खड़ी रहीं, जैसे उन्हें इस झगड़े की आदत हो।

"मैं तुझे घर इसलिए भेज रहा हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "क्योंकि अगर मुझे कुछ हो गया, तो कोई तो हो जो माँ को सँभाले। गुड़िया को सँभाले।"

"और मैं क्या हूँ?" मीरा की आवाज़ काँपी। "तेरे पीछे की एक परछाईं? जो तेरे जाने के बाद दीवार से चिपकी रहे?"

मैं चुप हो गया।

"तू अपने दुख में सबको दूर धकेलता है," वो बोली, और उसकी आँखें भर आईं। "यही तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है, वीर। तू सोचता है तू अकेले सह लेगा, तो सब बच जाएँगे। पर तू जानता है क्या? जो दूर धकेले जाते हैं, उन्हें कभी पता नहीं चलता कि तेरे साथ क्या हुआ। उन्हें सिर्फ़ इंतज़ार मिलता है। और इंतज़ार सबसे बड़ी सज़ा है।"

मेरे भीतर कुछ टूटा। क्योंकि वो सच कह रही थी। मेरी माँ बीस साल से उसी इंतज़ार में जी रही थी। पापा कभी नहीं लौटे, और माँ आज भी हर आहट पर दरवाज़े की तरफ़ देखती है। मैं वही कर रहा था जो पापा ने किया — अकेले चले जाना, और पीछे एक चुप्पी छोड़ जाना। और मुझे लगता था कि यही बहादुरी है।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे, पर वो रोई नहीं।

"ठीक है," मैंने धीरे से कहा। "पर मेरे पीछे रहना। मेरे आगे नहीं।"

उसने सिर हिलाया, और उसकी आँखों में वो पानी था जो अब बहने को था, पर उसने उसे रोक लिया। फिर उसने मेरी कलाई पकड़ी और मेरी नाड़ी पर अपनी उँगलियाँ टिका दीं।

"तेरी नाड़ी तेज़ चल रही है," वो बोली।

"तेरी भी," मैंने कहा।

नहर पार करनी थी। पानी घुटनों तक था, पर बहाव तेज़ था और तल में पत्थर फिसलते थे। कालू काका पहले उतरे, लालटेन ऊँची उठाए। गंगा देवी उनके पीछे। फिर मैं, और मेरे पीछे मीरा।

आधी नहर पार करते वक़्त मैंने पीछे मुड़कर देखा। हवेली की तरफ़ से कोई आ रहा था — दूर, अंधेरे में, एक परछाईं। शेराज़। वो रुक गया था नहर के किनारे, और उसने हमें जाते देखा। उसने हाथ नहीं उठाया, कुछ नहीं कहा। पर मुझे लगा कि वो हमें जाने दे रहा है — जान-बूझकर।

"वीर, देख!" मीरा की आवाज़ ने मुझे चौंकाया।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो पानी के भीतर झुकी थी, और उसकी आँखें बड़ी हो गई थीं।

"क्या?"

"तेरी अंगूठी," वो बोली। "वो चमक रही है।"

मैंने अपना हाथ पानी से ऊपर उठाया। पीतल की अंगूठी पर भवानी का नाम अब हल्का-सा लाल चमक रहा था, जैसे अंदर कोई ज़रा-सा दीया जल रहा हो।

और तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई। बहुत धीमी, पानी की आवाज़ से भी धीमी। कोई नाम जप रहा था।

"भवानी… भवानी…"

आवाज़ नहर के पार से आ रही थी। श्मशान की तरफ़ से।

मैंने पलटकर देखा, और अंधेरे में, बहुत दूर, पेड़ों के बीच, मुझे एक छोटी-सी पीली रोशनी दिखी। दीये की रोशनी। कुटिया की रोशनी।

और उस रोशनी के सामने, किसी का साया खड़ा था। बैठा नहीं। खड़ा। इंतज़ार कर रहा था।

मेरा हाथ काँपा, और पानी में उस साये ने अपना हाथ धीरे से उठाया। ऐसे जैसे मुझे बुला रहा हो।

॥

पानी में उठा वो हाथ मेरी तरफ़ नहीं, मेरे पीछे किसी को बुला रहा था। मैंने पलटकर देखा तो कालू काका की लालटेन काँप रही थी। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।

“काका?”

“वो हाथ,” उन्होंने धीरे से कहा, “मैंने ये हाथ पहले देखा है। बीस साल पहले। उसी कुटिया के बाहर।”

मीरा ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली। पानी हमारे घुटनों तक था और ठंडा नहीं, बर्फ़ जैसा लग रहा था। मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया जिसमें अंगूठी थी, और उसे नाक के पास लाया।

और मेरे भीतर कुछ ठिठक गया।

“ये अंगूठी अभी फेंकी गई है,” मैंने कहा।

“क्या मतलब?” मीरा ने पूछा।

“इसमें तहखाने की मिट्टी लगी है। वो लाल मिट्टी, जो सिर्फ़ उस कुएँ के नीचे है।” मैंने अंगूठी को करीब लाकर फिर सूंघा। “और इस पर चंदन है। हल्का-सा। गंगा देवी के हाथ का।”

कालू काका ने लालटेन नीची की। “मतलब?”

“मतलब ये कि ये अंगूठी घंटे भर पहले तक किसी के हाथ में थी। किसी ने इसे तहखाने से निकाला, गंगा देवी के हाथों से गुज़ारा, और यहाँ पानी में फेंक दिया।” मैंने मुट्ठी भींची। “ताकि मुझे ये मिले। ताकि मैं यहाँ रुकूँ।”

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो ठंडक आ गई जो मैं पहचानता था — जो तब आती थी जब वो किसी बीमारी की जड़ पकड़ लेती थी।

“वीर, ये जाल है।” उसकी आवाज़ नीची और साफ़ थी। “कोई चाहता है कि तू श्मशान जाए। जो अंगूठी इस तरह पानी में डालता है, वो तुझे बुला रहा है। और जो बुलाता है, वो पहले से तैयार होता है।”

“मुझे पता है,” मैंने कहा।

“तो फिर?”

“तो फिर ये भी पता है कि मुझे जाना है।” मैंने अंगूठी जेब में रखी। “क्योंकि वहाँ जो भी है, उसके पास मेरे पिता की हड्डियाँ हैं। और अगर मैं आज नहीं गया, तो वो कल उन्हें कहीं और ले जाएगा। ऐसी जगह जहाँ मैं कभी नहीं पहुँच पाऊँगा।”

कालू काका ने लालटेन ऊपर की और उसकी रोशनी में मीरा का चेहरा दिखा। उसके होंठ सीधी लाइन में थे, पर उसकी ठुड्डी काँप रही थी।

“मैं तुझे रोकूँगी नहीं,” वो बोली। “पर एक बात याद रखना। वहाँ जो भी मिले — काग़ज़, हड्डी, कोई आदमी — तू अकेला मत लड़ना। हम चार हैं।”

“पाँच,” पीछे से आवाज़ आई।

हम सब पलटे। टिंकू नहर के किनारे खड़ा था, पानी में घुटनों तक, एक हाथ में लालटेन और दूसरे में मिठाई की छोटी डिब्बी। उसके बाल भीगे हुए थे और उसकी टोपी तिरछी हो रही थी।

“तू कब आया?” मैंने पूछा।

“जब तू मीरा से ये कह रहा था कि ‘मेरे पीछे रहना’,” उसने कहा, और डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। “ये बर्फ़ी बची थी। मैंने सोचा, श्मशान जाने से पहले कुछ मीठा खा लें। भूखे आदमी की हिम्मत कम होती है।”

“टिंकू, तू घर जा,” मैंने कहा। “ये तेरे बस का काम नहीं।”

उसने डिब्बी वापस नहीं की। उसने मेरी आँखों में देखा, और उसकी मुस्कान गायब हो गई — शायद पहली बार।

“भाई, मैं तो कल से कसरत शुरू करने वाला था,” उसने कहा। “आज श्मशान में जाना नहीं था। पर एक बात सुन।” उसने टोपी कसकर सिर पर रखी। “तू जहाँ जाएगा, मैं वहाँ जाऊँगा। खीर के बिना मरना भी नहीं, पर तेरे बिना जीना भी नहीं।”

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