Spirit of a Fighter866 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 866

7 min read November 5, 2026

कालू काका ने सिर हिलाया। "मतलब ये कि तेरे पिता ने वो अँगूठी उस आदमी से ली थी। किसी तरह। कभी।" उन्होंने रुककर साँस ली। "और अगर उन्होंने ली थी, तो शायद यही वजह थी कि वो उन्हें मारना चाहते थे।"

मैंने अँगूठी को अपनी हथेली में भींच लिया। धातु ठंडी थी और उसका किनारा मेरी हथेली में गड़ रहा था। ठीक इसी जगह, इसी मिट्टी में, मेरे पिता ने इसे गाड़ा था। उन्होंने जानबूझकर इसे ऐसे रखा था कि जो इसे ढूँढ़े, वो इस निशान तक पहुँचे।

"काका," मैंने कहा। "ये बाहर वाले लोग कौन हैं?"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं और उनके होंठ काँप रहे थे।

"मुझे नाम नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर जब तेरे पिता मरे, तो उनकी लाश के पास एक काग़ज़ मिला था। उस पर सिर्फ़ एक बात लिखी थी — 'अगली बार तेरा बेटा।' पुलिस ने उसे ज़ब्त कर लिया। किसी ने मुझे नहीं दिखाया। पर जिस चौकीदार ने देखा था, उसने मुझे बताया था।"

मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी फिर खिसक गई। अगली बार तेरा बेटा। मतलब वो मेरे लिए आएँगे। मेरे लिए।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो बहुत शांत खड़ी थी, पर उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर नहीं, कुछ और। जैसे वो इस पल का इंतज़ार कर रही हो।

"तुम्हें पता था?" मैंने उससे पूछा। "तुम्हें पता था कि यहाँ ऐसा कुछ है?"

मीरा ने लालटेन नीचे की और उसकी लौ एक पल के लिए झुक गई। "मुझे पता था कि यहाँ कुछ है," उसने कहा। "पर इतना नहीं। मेरे पिता…" वो रुक गई। "मेरे पिता ने भी अपनी आख़िरी रात में कुछ देखा था। उन्होंने मुझसे कहा था, 'मीरा, अगर कभी कोई बाहर से आए और अखाड़े की मिट्टी के बारे में पूछे, तो उसे कालू के पास ले जाना।' मैंने तब समझा नहीं था।"

कालू काका ने अचानक अपना सिर उठाया। "तेरे पिता ने तुझसे ये कहा था? मुकुंद ने?" उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। "तो फिर मुकुंद भी जानता था। वो भी जानता था और उसने मुझसे कुछ नहीं कहा।"

तहखाने में सन्नाटा छा गया। मीरा का हाथ लालटेन पर काँप रहा था और उसकी लौ छोटी हो रही थी। मैंने अँगूठी अपनी जेब में रखी और अपने घुटनों के बल उठकर खड़ा हो गया।

"काका," मैंने कहा। "मुझे वो काग़ज़ चाहिए जो पुलिस ने ज़ब्त किया था।"

"वो पुलिस के पास है, बेटा।"

"तो मैं पुलिस के पास जाऊँगा।"

कालू काका हँसे। वो हँसी अजीब थी, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर हाथ रख दिया हो। "बीस साल पहले भी कोई गया था। तेरे पिता गए थे। और उसके चार दिन बाद वो मरे मिले।"

मैं चुप हो गया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ कसकर थी, जैसे वो मुझे जाने से रोक रही हो।

तभी ऊपर से आवाज़ आई। अखाड़े के दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से थाप पड़ रही थी। किसी का हाथ लकड़ी पर मुक्का मार रहा था — बार-बार, बिना रुके, जैसे कोई पागल हो गया हो।

कालू काका के हाथ से लालटेन छूटने ही वाली थी। उन्होंने उसे किसी तरह संभाला और मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे का रंग उड़ गया था।

"ये…" उन्होंने धीरे से कहा। "ये वो हैं। वो कभी सीधे नहीं आते। वो हमेशा ऐसे ही आते हैं।"

मीरा ने लालटेन उठाई और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गई।

॥

मीरा सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी और मैं उसके पीछे-पीछे। ऊपर से थाप अब भी पड़ रही थी, पर अब वो आवाज़ बदल गई थी। पहले मुक्के की आवाज़ थी, अब किसी चीज़ की। लोहे की। जैसे कोई कुदाल का फल दरवाज़े पर मार रहा हो।

कालू काका मेरे पीछे आ रहे थे। उनकी साँस फूल रही थी। हर सीढ़ी पर वो एक बार रुकते और मेरी पीठ देखते। मुझे उनकी डर भरी आवाज़ पीछे से सुनाई दे रही थी।

"बेटा, वो सीधे नहीं आते। पहले वो दरवाज़ा तोड़ते हैं, फिर बोलते हैं।"

हम सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर पहुँचे। मीरा ने लालटेन नीचे रख दी और अपने हाथ से लौ दबा दी। अँधेरा सब तरफ़ फैल गया। पर बाहर से आती रोशनी झिरी से अंदर आ रही थी। मशालों की रोशनी। लाल और काँपती हुई।

टिंकू की आवाज़ अब साफ़ आई। "जल्दी करो! भैरव के आदमी हैं, दस-बारह होंगे! मशालें लिए खड़े हैं!"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। भैरव। भैरव के आदमी। जिस भैरव को मैं अब विक्रम कहता हूँ, जो मेरे पिता का सबसे प्रिय शिष्य था। वही मेरे दरवाज़े पर था।

मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं। "वीर, अंधेरे से मत निकलो। पहले देखो कि कितने हैं।"

मैंने सिर हिलाया और सीढ़ी के आख़िरी हिस्से से बाहर झाँका। अखाड़े का आँगन खाली था। पर बाहर, फाटक के उस पार, मशालें जल रही थीं। उनकी रोशनी में धुआँ उठ रहा था और उस धुएँ में आदमियों की परछाइयाँ हिल रही थीं। कम से कम बारह। सबके हाथ में लाठी या कुदाल थी।

और उनके बीच में, एक आदमी खड़ा था जिसके हाथ में मशाल नहीं थी। वो शांत खड़ा था। उसकी धोती लाल थी और उसकी छाती पर सोने की चेन चमक रही थी।

भैरव सिंह।

नहीं। विक्रम।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। कालू काका सीढ़ी पर बैठ गए थे। उनके हाथों में अब भी भवानी की डिबिया थी। वो उसे अपनी छाती से लगाए बैठे थे।

"काका," मैंने कहा। "अंदर आओ। तुम बाहर मत जाना।"

कालू काका ने सिर हिलाया। "मैं नहीं जाऊँगा," उन्होंने कहा। "पर बेटा, एक बात सुन। जब तक वो मशाल जलाए खड़ा है, उसके आदमी उसकी आवाज़ सुनते हैं। जिस पल मशाल गिरेगी, उसके आदमियों के हाथ काँपेंगे।"

मैंने उनकी बात सुनी और उनकी आँखों में देखा। उनकी आँखों में डर था, पर उस डर के पीछे कुछ और भी था। बीस साल पुराना गुस्सा।

टिंकू फाटक के पास खड़ा था। मैं दौड़कर उसके पास पहुँचा। उसके हाथ में मिठाई की छोटी डिब्बी थी, जो उसने अब भी नहीं छोड़ी थी। उसकी टोपी कान पर टेढ़ी हो गई थी और उसके माथे पर पसीना था।

"वीर," उसने धीरे से कहा। "मैंने उन्हें पहचाना। सबसे आगे लंगड़ा खड़ा है। और उसके पीछे वो रमेश भी है जो कल हमारे पीछे पड़ा था।"

मैंने फाटक की झिरी से बाहर देखा। भैरव मशालों के बीच खड़ा था। उसने अब भी धोती वही लाल पहनी थी, पर उसके चेहरे पर कुछ बदल गया था। पहले वो हँसता था, मीठी बातें करता था। आज वो हँस नहीं रहा था। उसका चेहरा पत्थर जैसा था।

"वीर सिंह," उसकी आवाज़ आई। बाहर से, मोटी और भारी, जैसे किसी मंदिर का घंटा बजा हो। "मुझे पता है तू अंदर है। निकल बाहर। मेरे आदमी तेरे पीछे नहीं आएँगे। सिर्फ़ मैं आऊँगा।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने अपनी डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पहले ये खा ले," उसने कहा। "अगर बाहर जाना है, तो भूखे पेट क्यों जाना।"

मैंने उसकी डिब्बी खोली। बर्फ़ी थी, ठंडी और सख़्त। मैंने एक टुकड़ा मुँह में डाला। चीनी की मिठास मेरे मुँह में फैल गई और मुझे माँ की याद आई। भूखे पेट की दुआ। मैंने दूसरा टुकड़ा भी खा लिया।

"अब?" टिंकू ने पूछा।

"अब अंदर चलो," मैंने कहा। "और मीरा को साथ लेकर।"

हम तीनों तहखाने की सीढ़ियों की तरफ़ मुड़े। कालू काका वहीं बैठे थे, डिबिया छाती से लगाए।

"काका," मैंने कहा। "तुम्हें भी अंदर आना है।"

कालू काका ने सिर हिलाया और उठे। पर जब वो उठे, तो उन्होंने डिबिया मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "ये तेरे पिता की चीज़ है," उन्होंने कहा। "अब इसे तू रख।"

मैंने डिबिया ली। वो छोटी थी, पीतल की, और उसका ढक्कन थोड़ा कसा हुआ था। उसे खोलने में ज़ोर लगा। जब वो खुला, तो अंदर से एक और काग़ज़ निकला। पहले वाले काग़ज़ से पतला, मोड़ा हुआ और पीला पड़ गया। उस पर भवानी सिंह की लिखाई थी।

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