Spirit of a Fighter – Chapter 867
मैंने उसे खोला। तहखाने की सीढ़ियों पर खड़े-खड़े मैंने पढ़ा। मीरा ने लालटेन जलाई और मेरे कंधे के पास उसे पकड़ा। उसकी रोशनी में अक्षर साफ़ दिख रहे थे।
"विक्रम, अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं जान गया हूँ कि तू क्या करने वाला है।"
मेरी साँस रुक गई।
"मैंने तुझे अखाड़ा इसलिए नहीं दिया क्योंकि तू इसे जागीर समझता है, सेवा नहीं। रणवीर इसे मिट्टी की तरह रखेगा। तू पत्थर की तरह रखेगा।"
उसके नीचे एक लाइन और थी, और वो लाइन काँपती हुई लिखाई में थी, जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा हो।
"और अगर तू वो बाहर वालों का पानी बेचने लगा है, तो जान ले — वो पानी पहलवान को नहीं, उसके बच्चों को मारता है। मैंने आज तक किसी पहलवान को वो नहीं दिया। और मैं नहीं दूँगा। तू दे रहा है तो तेरा हिसाब तेरे साथ।"
आख़िरी लाइन में सिर्फ़ दो शब्द थे।
"बेटा, लौट आ।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने काग़ज़ अपने सीने से लगा लिया। काग़ज़ की गंध मेरे अंदर तक गई — पुरानी स्याही, सूखी मिट्टी और उसमें मिली उनकी उँगलियों की गंध, जो अब कहीं नहीं थी।
"पिताजी," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी। "आपने मुझे बहुत बड़ी चीज़ दी है। सच। जो आपने खुद सहा।"
मीरा ने मेरे हाथ से काग़ज़ लिया। उसने एक बार पढ़ा। फिर दूसरी बार। फिर उसने काग़ज़ को मोड़कर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो कोर्ट में होती है। "ये काग़ज़ अदालत में सबसे बड़ा सबूत है। इसमें भवानी सिंह खुद कह रहे हैं कि बाहर वालों का पानी पहलवानों के बच्चों तक को मारता है। और ये भी लिखा है कि विक्रम को पता था। इसे पढ़कर कोई भी जज कहेगा कि भैरव ने जानबूझकर ज़हर बेचा।"
कालू काका ने अचानक अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनकी पकड़ कसकर थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फुसफुसाहट थी। "ये काग़ज़ भैरव को नहीं दिखना चाहिए। अगर उसे पता चला कि तेरे पास ये है, तो वो आज रात कुछ भी कर सकता है।"
"काका," मैंने कहा। "वो मेरे पिता का ख़त है।"
"और तेरी जान भी किसी की ख़त है?" कालू काका ने पूछा। उनकी आँखों में पानी आ गया था। "तेरे पिता ने ये ख़त लिखा था, तो ये भी जानते थे कि इसे किसके हाथ में देना है। अभी सही वक़्त नहीं है।"
मैं चुप हो गया।
तभी बाहर से फिर आवाज़ आई। इस बार भैरव की नहीं, किसी और की। "वीर सिंह, तेरे पिता की कब्र आज रात से खाली है।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी फिर खिसकी। कब्र। मेरे पिता की कब्र। भवानी सिंह की कब्र। जिसे मैंने कभी चूमा नहीं, जिसे मैंने कभी नहीं देखा, जिसकी सिर्फ़ गंध मेरी नाक में बसी थी।
मैं दौड़कर सीढ़ियों से ऊपर गया। मीरा मेरे पीछे भागी। टिंकू ने अपनी डिब्बी उठाई और हमारे पीछे आया।
फाटक के पास पहुँचकर मैंने झिरी से बाहर देखा। मशालों की रोशनी में, अखाड़े के बाहर वाले रास्ते पर, जो कब्रों की तरफ़ जाता था, मिट्टी का ढेर दिख रहा था। ताज़ी खोदी गई मिट्टी। और उसके पास एक कुदाल धँसी थी।
मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। मेरे पिता की कब्र। जिन्होंने अपनी आख़िरी साँस में मेरे लिए ख़त लिखा। जिन्होंने अपने शिष्य को बेटा कहा। जिनके दरवाज़े पर कोई चार दिन बाद मरा मिला।
मैंने फाटक का छोटा दरवाज़ा खोला। मीरा ने मेरा बाज़ू पकड़ा। "वीर, रुको। पहले सोचो।"
"नहीं सोचूँगा," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ मुझे अपनी नहीं लगी। "ये मेरे पिता की कब्र है।"
मैं बाहर निकल गया। मशालों की रोशनी मेरी आँखों में पड़ी और मैंने अपनी हथेली आँखों पर रखी। सामने भैरव खड़ा था। उसके पीछे बारह आदमी, लाठियाँ लिए।
भैरव ने मुझे देखा और उसके होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान आई। वो मुस्कान पुरानी थी, जो मैंने अखाड़े में कई बार देखी थी। पर आज उसमें कुछ और था। जैसे कोई जानवर अपने शिकार को देखकर हँस रहा हो।
"आ गया," उसने कहा। "मैं जानता था तू आएगा। तेरे पिता की कब्र तेरे लिए सबसे बड़ी चीज़ है, है ना?"
मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। "तुमने वो क्यों किया?"
"क्या किया?" उसने भोलापन दिखाया।
"कब्र खोदी। मेरे पिता को चैन से क्यों नहीं रहने दिया?"
भैरव हँसा। उसकी हँसी मशालों की आवाज़ से भी ऊँची थी।
"तेरे पिता?" उसने कहा। "वो मेरे पिता थे जितने तेरे थे। शायद ज़्यादा। मैंने उनके साथ बीस साल काटे। उन्होंने मुझे अखाड़े का काम सिखाया। उन्होंने मुझे पानी पीने का तरीका सिखाया।" उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास आ गई। "और फिर उन्होंने मुझे छोड़ दिया। एक काग़ज़ पर दो लाइनें लिखीं और चले गए। तू जानता है वो कಾಗ़ज़ कहाँ गया? मैंने उसे जलाया। जलाया और उसकी राख अपने हाथों में ली।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। "वो काग़ज़ जो मेरे पिता ने तुम्हारे लिए लिखा था?"
"वो काग़ज़ जो तेरे पिता ने मुझे अपने बेटे की जगह से हटाने के लिए लिखा था," भैरव ने कहा। "उन्होंने मुझे 'जागीर' कहा। जागीर! जिस अखाड़े को मैंने अपने खून से सींचा, उसे मैं जागीर समझता था? वो मुझे बता रहे थे कि मैं सेवक हूँ और रणवीर मालिक।"
उसकी आवाज़ में दर्द था। सच्चा दर्द। और मैं उसे देखकर हिल गया। मैंने उसे हमेशा खलनायक समझा था, पर आज उसके दर्द में मुझे अपना दर्द दिखा।
"तुमने उनका ख़त जलाया," मैंने कहा। "तुमने उनकी सलाह नहीं मानी। तुमने बाहर वालों का पानी बेचना शुरू किया।"
"मैंने क्या करना था?" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ ऊँची हो गई। "तेरे पिता ने मुझे कहा कि मैं मिट्टी की तरह रहूँ। मिट्टी की तरह! जिसे कोई भी रौंद दे! मैं मिट्टी नहीं, पत्थर था। और पत्थर को कोई रौंद नहीं सकता। तुझे पता है, तेरे पिता ने मुझे अखाड़े से बाहर निकाल दिया था? उन्होंने मुझे कहा था कि मैं अब पहलवानों को पानी नहीं दूँगा। मुझे अपना काम छोड़ना पड़ा। मुझे अपना नाम छोड़ना पड़ा। मैं भैरव बना।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उनमें आग थी। पर वो आग आज नहीं जली थी। वो बीस साल से जल रही थी।
"तुमने उन्हें मार डाला," मैंने कहा।
भैरव ने अपना सिर हिलाया। "नहीं। मैंने उन्हें नहीं मारा। मैंने तो उन्हें बचाने की कोशिश की। मैंने उन्हें उस पानी से दूर रहने को कहा। पर वो माने नहीं। वो बाहर वालों के पास गए। उन्होंने उनसे लड़ने की कोशिश की। और वो उन्हें मार दिया।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैंने उन्हें उस रात देखा था। मैंने उन्हें मरता देखा था। और मैं कुछ नहीं कर सका।"
तभी मशालों के बीच से एक आवाज़ आई। एक पतली, काँपती हुई आवाज़ जो मुझे पहचानी लगी।
"तू झूठ बोल रहा है, विक्रम।"
सब पलटे। मशालों की रोशनी में, अंधेरे के पीछे से एक औरत आ रही थी। उसके हाथ में लालटेन थी और उसकी साड़ी का पल्लू उसके सिर पर था। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरे पर उम्र की लकीरें गहरी थीं।
गंगा देवी।
भैरव ने उसे देखा और उसका चेहरा बदल गया। मशालों की रोशनी में उसकी आँखें फैल गईं, जैसे किसी ने उसके सामने कोई भूत खड़ा कर दिया हो।
"तू?" उसने कहा। "तू यहाँ क्यों आई?"
गंगा देवी रुकी। उसकी लालटेन काँप रही थी।
"मैं यहाँ इसलिए आई हूँ कि तू आज रात जो करने वाला है, वो मैं नहीं होने दूँगी," उसने कहा। "बीस साल पहले मैंने तेरे पीछे खड़े होकर एक बेटी की जान बचाई थी। आज मैं तेरे सामने खड़ी हूँ।"
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