Spirit of a Fighter – Chapter 851
"आप जानते थे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लगी। "आप जानते थे कि मेरे पिता को मारा गया, और आपने बीस साल तक उस कॉपी में हिसाब भरा।"
"वीर।" मीरा का हाथ मेरी कलाई पर आया। उसकी उँगलियाँ अब ठंडी नहीं थीं। गरम थीं। "वीर, छोड़ो।"
"ये मेरे पिता का सवाल है, मीरा।"
"और यही आदमी तुम्हारा सबसे बड़ा गवाह है।" उसने मेरी मुट्ठी धीरे से खोली। "अगर ये सच बोल रहा है, तो ये हमें नंदकिशोर तक ले जाएगा। और अगर हम इसे अभी तोड़ देंगे, तो सुबह मैदान में हमारे पास सिर्फ़ एक शीशी होगी और कोई गवाह नहीं।"
मैंने मुंशीजी को छोड़ दिया। वो मिट्टी पर गिर पड़े, हाँफते हुए।
कालू काका अब तक सीढ़ियों के पास खड़े थे, एक हाथ दीवार पर टिका हुआ। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
"काका," मैंने कहा, "आपने सुना?"
"सुना," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो बहुत पुराने गुस्से में आती है। "मुझे सिर्फ़ एक बात पूछनी है।" वो मुंशीजी के करीब आए और उनके सामने झुक गए। "चंदन। मेरा बेटा। उसे किसने तेल के गड्ढे में गिराया?"
मुंशीजी ने कराहकर कहा, "भैरव को नंदकिशोर ने हुक्म दिया था। चंदन तहखाने की मिट्टी पर आता था, और नंदकिशोर को डर था कि वो कुछ और खोज निकाले। भैरव ने बोतल दी, और जब वो बेहोश हुआ, तो…"
"बस," कालू काका ने कहा। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। "बस।"
कुछ पल मिट्टी के बीच चुप्पी रही। अखाड़े की दीवार पर चाँद की रोशनी पड़ी थी, और उसमें नीम के पत्तों की परछाइयाँ हिल रही थीं। दूर कहीं कुत्ता भौंका। यही आवाज़ें थीं, बस।
फिर टिंकू ने कहा, "भाई, अब तो पुलिस को बताना चाहिए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ अभी भी लाल निशानों से भरे थे।
"पहले सबूत," मैंने कहा। "फिर पुलिस। अगर हम अभी गए, तो नंदकिशोर को पता चल जाएगा। और वो अपनी बेटी को…"
"मेरी बेटी को कुछ नहीं होगा अगर तुम एक बात मानो," मुंशीजी ने कहा। वो उठने की कोशिश कर रहे थे। मैंने हाथ बढ़ाया। वो मेरे हाथ पर टिककर उठे। "वो मुझे रोज़ छह बजे शाम को शहर के बाहर पुरानी हवेली में बुलाता है। अगर मैं नहीं पहुँचा, तो वो शक करेगा। और अगर मैं पहुँचा, तो तुम मेरे साथ चलो।"
"आप हमें उसके पास ले चलेंगे?" मीरा ने पूछा।
"मैं तुम्हें उसके दरवाज़े तक ले चलूँगा," मुंशीजी ने कहा। "उसके बाद जो तुम्हारी मिट्टी कहेगी।"
उन्होंने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। मुड़ा हुआ, पीला, किनारों से फटा हुआ। उन्होंने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"ये उसके हस्ताक्षर हैं। ठेकेदारी के काग़ज़ों पर, ज़मीन के काग़ज़ों पर, सब पर यही निशान। और नीचे उसका पता। हवेली का पता।"
मैंने काग़ज़ खोला। धुँधली रोशनी में मैंने सिर्फ़ नीचे की लाइन पढ़ी — शहर से बाहर, पुराने कुएँ वाली गली, पीली हवेली। और उसके नीचे एक निशान — दो रेखाएँ जो एक तीर जैसा बनाती थीं।
"ये निशान?" मीरा ने पूछा, उसने मेरे कंधे के ऊपर से देखा।
"उसकी मुहर," मुंशीजी ने कहा। "वो हर काग़ज़ पर लगाता है। कहता है, जो मेरा है, वो मेरे निशान से पहचाना जाएगा।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर कमर में खोंसा। "कल सुबह मैदान में जाने से पहले," मैंने कहा, "आज शाम हम उस हवेली में जाएँगे।"
"भाई," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो वो छिपाने की कोशिश कर रहा था, "तूने सुना नहीं? वो आदमी मरा हुआ माना जाता है। मरे हुए आदमी से लड़ना आसान होता है, क्योंकि उसके पास कुछ खोने को नहीं होता। ये तो ज़िंदा है, यानी इसके पास सब कुछ है।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो हम उससे सब कुछ छीन लेंगे।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अपनी टोपी ठीक की, जो पूरी लड़ाई में टेढ़ी हो गई थी। "ठीक है। पर एक बात पहले से तय है — जब हम वापस आएँगे, तो पहली खीर मैं बनाऊँगा। और इस बार उसमें नमक नहीं डालेगा कोई।"
मुंशीजी ने सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, "मैं शाम को हवेली के पिछले दरवाज़े पर मिलूँगा। अँधेरा होते ही। और वीर बेटा —"
वो दरवाज़े पर रुक गए। उनकी लालटेन की रोशनी से मेरा चेहरा सामने आ गया।
"एक बात और है। वो औरत जो तुमसे तहखाने में मिली। जिसने बेल का पत्ता दिया था तुम्हारे पिता को। जिसने दीवार पर निशान बनाए।"
मैंने साँस रोक ली।
"वो नंदकिशोर की बहन है," मुंशीजी ने कहा। "और वो भैरव की माँ नहीं, बल्कि उसकी मौसी है। कमला देवी नहीं, कमला की बहन — गंगा देवी। और उसने ही तुम्हारी माँ को शेर सिंह को ज़हर देने की सलाह दी थी।"
मेरे पैर जम गए।
"क्या?" मेरी आवाज़ निकली।
"वो अपनी बहन के बेटे को बचाना चाहती थी," मुंशीजी ने कहा। "भैरव को। और उसने सोचा कि अगर शेर सिंह हट जाए, तो भैरव का रास्ता साफ़ हो जाएगा। पर उसे पता नहीं था कि उसका भाई नंदकिशोर उसी रास्ते पर खुद बैठा है।"
मुंशीजी ने लालटेन उठाई और सीढ़ियों पर पहला कदम रखा। फिर वो पलटे, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने किसी बूढ़े आदमी की आँखों में नहीं देखी थी — एक आख़िरी कोशिश।
"वीर बेटा, एक बात याद रखना। नंदकिशोर के पास ताकत नहीं है। उसके पास लोगों के राज़ हैं। वो हर आदमी की वो डोर खींचता है जिससे वो डरता है। तुम्हारी डोर क्या है, वो जानता है। इसलिए वो तुम्हें अपनी माँ से, अपनी बहन से, अपनी मिट्टी से डराएगा।"
वो ऊपर चले गए। उनके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती गई।
कालू काका मेरे पास आए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो नरमी थी जो पहले भी देखी थी — जब उन्होंने मुझे अखाड़े की मिट्टी दी थी।
"वीर," उन्होंने कहा, "मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।"
"काका, आप…"
"मैं बूढ़ा हूँ, पर अंधा नहीं।" उन्होंने कुदाल उठाई। "और अगर उस हवेली में मेरे बेटे की जान की एक भी डोर है, तो वो मैं खुद खींचूँगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।
"क्या सोच रही हो?" मैंने पूछा।
"मैं सोच रही हूँ," उसने धीरे कहा, "कि अब तक हम एक-एक करके राज़ खोल रहे थे। पर ये राज़ सबसे बड़ा है। और इसमें हमारी अपनी माँएँ शामिल हैं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हारी माँ को पता है?"
मैं चुप हो गया। माँ। माँ जिन्होंने कहा था कि उस रात एक औरत ने पानी पिलाया, सिर पर हाथ रखा, बेल का पत्ता दिया। क्या उन्हें पता था कि वो औरत कौन है? क्या उन्होंने कभी सोचा कि वो सलाह किसने दी?
"मैंने आज तक उनसे नहीं पूछा," मैंने कहा। "और अब शायद पूछने का वक़्त नहीं है।"
"पूछ लो," कालू काका ने कहा। "क्योंकि जब तुम उस हवेली से लौटोगे, तो तुम वही नहीं रहोगे जो अभी हो। और माँ के पास जो सच है, वो तुम्हें पहले जानना चाहिए, बाद में नहीं।"
हम अखाड़े से बाहर निकले। सुबह की हवा ठंडी थी, और दूर नहर की तरफ़ से कोहरा उठ रहा था। मैंने अपने घर का रास्ता लिया। मीरा मेरे साथ थी, टिंकू भी। कालू काका अपनी कुदाल के सहारे पीछे-पीछे आ रहे थे।
हमारे आँगन के बाहर पहुँचकर मैं रुक गया। माँ चक्की पर बैठी थीं। सुबह की पहली चक्की। उनके हाथ हिल रहे थे, पर उनकी आँखें दूर थीं — कहीं और। जैसे वो किसी पुरानी रात में बैठी हों।
"माँ," मैंने कहा।
उन्होंने चक्की रोकी। हाथों से आटा झाड़ा। और मेरी तरफ़ देखा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno