Spirit of a Fighter – Chapter 840
"भवानी की मुट्ठी में यही था," रणवीर सिंह ने कहा। "जब मैंने उनकी उँगलियाँ खोलीं। शीशी मैंने निकाल ली थी, पर ये टुकड़ा हाथ में चुभा हुआ था। खून सूख चुका था।"
माँ ने मुँह हाथ से ढक लिया।
मैंने टुकड़ा नाक के पास लाया। पहले जंग और पुरानी धूल। फिर वही कड़वाहट — साफ़, तेज़। और उसके नीचे, बहुत नीचे…
मैं ठिठक गया।
एक और गंध थी। मीठी, पर गुड़ जैसी नहीं। सूखी लकड़ी में पड़ी इलायची जैसी। और सबसे नीचे — एक तीसरी। जिसे मैं जानता था। जिसे मैंने बहुत पहले सूंघा था।
सिर में तेज़ दर्द कौंधा, जैसे किसी ने माथे पर कील ठोंक दी हो। मेरी नाक से कुछ गर्म बहा। उँगली से छुआ — खून।
"छोड़ दे," माँ ने कहा, और आवाज़ में हुक्म था। "छोड़ दे उसे, वीर। अभी।"
मैंने टुकड़ा रख दिया। साँस तेज़ थी। माथा फट रहा था।
"क्या सूंघा?" रणवीर सिंह ने पूछा।
"तीन चीज़ें," मैंने कहा। "कड़वाहट। फिर कुछ मीठा। और फिर…" आवाज़ फुसफुसाती थी। "फिर वो गंध जो मैं जानता हूँ। पर याद नहीं आ रहा कहाँ से।"
"बचपन से?" मीरा ने कहा।
"हाँ। पर कहाँ—"
और तभी याद आया।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। मेरा चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"माँ। वो तेल है। वो तेल जो तू पापा के सिर पर लगाती थी। जब वो बीमार थे। आख़िरी रात।"
माँ की आँखें बंद हो गईं।
"नारियल का तेल," उन्होंने कहा, आवाज़ बहुत धीमी। "जिसमें मैंने इलायची और लौंग डाल दी थी।" उन्होंने आँखें खोलीं। "वो तेल उस शीशी में था?"
"नहीं। वो तेल शीशी के बाहर था। ज़हर के ऊपर। जैसे किसी ने ज़हर वाली बोतल मेरे पापा के सिर के पास रख दी हो।"
मीरा की आँखें तेज़ हो गईं।
"वीर, इसका मतलब ज़हर देने वाला उस वक़्त कमरे में था। तेरे पापा के सिर के पास। जब वो मर रहे थे।"
आँगन में सन्नाटा छा गया।
"माँ," मैंने कहा, आवाज़ रुक-रुक कर आ रही थी। "उस रात कमरे में कौन-कौन था?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो बीस साल से दबा हुआ था।
"मैं। तेरे पापा। रणवीर। और…"
वो रुकीं।
"और?"
"और एक औरत। जिसने मुझे पानी पिलाया। जब मैं रो रही थी। उसने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा — बहन, रो मत। तेरा बेटा बड़ा होगा।"
मेरी नाड़ी तेज़ हो गई।
"कौन थी?"
"चेहरा नहीं देखा। आँखें पानी से भरी थीं। पर उसने मेरे हाथ में कुछ रख दिया।"
माँ ने अपनी गोद में देखा, जैसे आज भी वहाँ कुछ हो।
"एक छोटा सा पत्ता। हरा। तीन कोने। और उसकी गंध तीखी — नींबू जैसी।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदल गया।
"पुदीना?" मैंने कहा।
"ना," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे किसी बंद दरवाज़े की चिटकनी खुल रही हो। "तीन कोने वाला पत्ता, नींबू जैसी गंध — ये बेल का पत्ता है।"
"बेल?" टिंकू ने कहा। "बेल तो मंदिर में चढ़ती है। कोई बेल का पत्ता मरते आदमी के पास क्यों ले जाएगा?"
"कुछ लोगों के यहाँ," मीरा ने कहा, "बेल का पत्ता शांति का निशान माना जाता है। जब कोई बहुत बीमार हो, तो तकिये के नीचे रखते हैं।"
"तो वो औरत भवानी को शांति देना चाहती थी," रणवीर सिंह ने कहा, आवाज़ भारी।
"या वो जानती थी कि वो मर रहे हैं," मीरा ने कहा, "और चाहती थी कि आख़िरी पल में उनके पास कोई सुकून की चीज़ हो।"
मैंने साँस रोक ली।
"ये किसी दुश्मन का काम नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "दुश्मन मरते आदमी को बेल का पत्ता नहीं देता।"
माँ ने सिर उठाया। चेहरे पर एक अजीब सी चमक आई।
"नहीं। वो औरत गुनहगार नहीं थी। वो किसी और की तरफ़ से आई थी।"
"किसकी तरफ़ से?"
"पता नहीं। पर उसकी आवाज़ में करुणा थी। और आँखों में गुस्सा। जैसे वो खुद मजबूर हो।"
टिंकू ने सिर खुजाया।
"मतलब वो औरत भी किसी के डर से आई थी।"
"हो सकता है," मीरा ने कहा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और आँखों में वो चमक थी जो मैं जानता था। "वीर, तेरे पापा ने कहा था कि वो जान जाएगा कि मैंने क्या किया था। मतलब भवानी ने कुछ किया था। और वो चाहते थे कि उनका बेटा वो सच जाने।"
"और सच," रणवीर सिंह ने कहा, "उन्होंने इस टुकड़े में छुपा दिया।"
मैंने टुकड़ा हथेली पर रखा।
"पर ये तो बस काँच है। इसमें कहीं कोई लिखाई नहीं।"
"लिखाई नहीं," मीरा ने कहा, और वो मेरे पास झुकी। "पर गंध है। तीन गंध। कड़वाहट, मीठा, और तेल। वीर, ये तीन चीज़ें मिलकर कुछ बनाती हैं।"
"क्या?"
"पता नहीं। पर मेरे पास दवाओं की किताबें हैं। कुछ गंध ऐसी होती हैं जो मिलकर कुछ और बन जाती हैं। मैं सुबह तक पता लगा लूँगी।"
"तू सच में ये कर सकती है?"
"कोशिश कर सकती हूँ। पर एक शर्त — ये टुकड़ा आज रात मुझे देगा।"
मैंने उसे मुट्ठी में कसकर पकड़ लिया।
"ये मेरे पापा की आख़िरी निशानी है।"
"पता है," मीरा ने कहा, आवाज़ नरम हो गई। "इसीलिए संभालकर रखूँगी। वादा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। और फिर धीरे से टुकड़ा उसकी हथेली पर रख दिया। वो वज़नदार था, वो टुकड़ा। हाथ से जाते ही मेरा हाथ हल्का लगा — और खाली।
रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे की।
"कल का दिन किसी मुकाबले से कम नहीं है। ठाकुर के पास शीशी है, आदमी हैं, और कुछ ऐसा भी है जो मैं नहीं जानता।"
"तो हम क्या करें?" टिंकू ने पूछा।
"आज रात कोई सोएगा नहीं। वीर तहखाने जाएगा। उस मिट्टी में कुछ है — कालू कहता है ताकत है। और आज मुझे वो ताकत चाहिए।"
"मैं साथ चलूँगी," माँ ने कहा।
"नहीं—"
"मैं तेरे साथ चलूँगी," उन्होंने दोहराया, और आवाज़ में वो चीज़ थी जो कोई नहीं तोड़ सकता। "बीस साल मैंने तुझे अकेले लड़ते देखा है। अब नहीं।"
मैं उनकी तरफ़ देखता रहा। फिर सिर हिला दिया।
"ठीक है। पर मेरे पीछे रहेगी।"
"मैं तेरे पीछे नहीं। साथ रहूँगी।"
टिंकू ने अपना डिब्बा बंद किया।
"मैं भी चलूँगा। और अगर तहखाने में कोई भूत निकला, तो उसे लड्डू दे दूँगा। भूत भी मिठाई खाते हैं क्या?"
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ?"
"चुप कर।"
"अच्छा। पर लड्डू मैं ले जाऊँगा।"
मीरा उठी। किताबों का बैग कंधे पर डाला।
"मैं अभी किताबें खोलती हूँ। अगर इन तीन गंधों का कोई मतलब है, तो सुबह तक पता चल जाएगा।"
"मीरा," मैंने कहा, और मैं भी उठ गया।
वो रुकी।
"ध्यान रखना।"
वो मुस्कुराई। थके चेहरे पर वो मुस्कान सूखी ज़मीन पर पहली बारिश जैसी लगी।
"तू अपना ध्यान रख। मैं तो शहर की लड़की हूँ। मुझे क्या होगा?"
और वो चली गई। फाटक के बाहर, अंधेरे में।
मैं उसे देखता रहा जब तक उसकी परछाई नीम के पेड़ के पीछे नहीं छुप गई।
"चलो," मैंने कहा। "तहखाना।"
हम तैयार हो रहे थे। कालू काका कुदाल उठा रहे थे, टिंकू टोपी ठीक कर रहा था, और माँ सिर पर दुपट्टा बाँध रही थीं — वैसे ही जैसे युद्ध के दिन बाँधती थीं।
मैंने अपनी धोती कसी। हाथ अब भी हल्के काँप रहे थे, पर वो कमज़ोरी नहीं थी। कुछ और था — जो पेट से उठकर हाथों तक आ रहा था।
और तभी।
फाटक पर दस्तक हुई।
एक।
मैं रुका।
दो।
रोंगटे खड़े हो गए।
तीन।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। हाथ से दुपट्टा छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। आँखें फैल गई थीं, होंठ काँप रहे थे।
"माँ?"
"ये दस्तक…" उन्होंने फुसफुसाया, जैसे किसी ने गला दबा दिया हो। "वीर, ये वही तीन दस्तक हैं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बीस साल पहले। उस रात भी ऐसे ही तीन दस्तक हुई थीं। ठीक इसी फाटक पर। और उसके बाद तेरे पापा गए, और…"
वो रुक गईं। गला भर आया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno